20 मार्च: विश्व गौरैया दिवस...🐦
"क्या आपको याद है, आखिरी बार आपने अपने रोशनदान में तिनके कब देखे थे?"
जब मैं गौरैया की बात करती हूँ, तो बचपन के कुछ धुंधले लेकिन बेहद खूबसूरत दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो जाते हैं। हमारे घर में रोज़ सुबह आंगन में चावल के दाने बिखेरे जाते थे। उन नन्हे परिंदों का अच्छा-खासा झुंड इकट्ठा होता, और उनकी वो चहचहाहट ही वजह थी कि मैं भोर होते ही बिस्तर छोड़ देती थी।
ये नन्ही जानें वक्त की कितनी पक्की होती हैं, यह मैंने तभी जान लिया था। दाना डालने वाला भले ही देर कर दे, लेकिन ये 'नन्हे मेहमान' तय समय पर हाज़िर हो जाते। और अगर दाने न डले हों? तो मुंडेर पर बैठकर ऐसी ज़ोरदार 'नारेबाज़ी' शुरू होती कि पूरा घर जाग जाए!
इस झुंड में बुलबुल, धुनियाइन और फाख्ता भी होते थे, पर बहुमत हमेशा गौरैया का ही रहता। पंख फुलाकर रूई के गोलों जैसी इधर-उधर फुदकती ये गौरैया मुझे बेहद दिलचस्प लगतीं। मैं एक तरफ बिना हिले-डुले इस पूरी तस्वीर का हिस्सा बनी रहती ताकि वे डरें नहीं; मैं उनकी आज़ाद दुनिया में बाधा नहीं, बस एक खामोश साथी बनना चाहती थी।
घर के हर कमरे के रोशनदान में गौरैया अपने घोंसले बना लेतीं। पूरे घर में तिनके बिखरे रहते। आलम यह था कि पता ही नहीं चलता था कि अभी झाड़ू लगा भी है या नहीं! हम कभी खीझते, कभी परेशान होते, लेकिन जैसे ही उन घोंसलों से नन्हे बच्चों की 'चीं-चीं' सुनाई देती, ऐसा लगता मानो परिवार में कुछ नए सदस्य जुड़ गए हों।
यूँ तो मैं उन्हें छूने की कोशिश नहीं करती थी, पर कई बार हालात 'इमरजेंसी वार्ड' जैसे हो जाते। अपनी ढीठाई में वे अक्सर चलते हुए सीलिंग-फैन के पास पहुँच जातीं। जैसे ही कोई गौरैया पंखे से टकराकर घायल होती, पूरे घर में 'हाई-अलर्ट' हो जाता। सब दौड़ते पंखे बंद करने और उस नन्ही जान को बचाने।
मुझे आज भी याद है, जब मैं उस घायल गौरैया को अपनी हथेलियों में उठाती, तो वो विवश आँखों से मुझे देखती और खुद को पूरी तरह मेरे भरोसे छोड़ देती। मैं उसकी चोट पर दवा लगाती, उसे पानी पिलाती और किसी गत्ते के डिब्बे में नर्म कपड़ों का बिछौना बनाकर उसे 'क्वारंटाइन' कर देती ताकि वो ठीक होने तक उड़ने की ज़िद न करे। फिर जब वो स्वस्थ हो जाती, तो उड़ने के लिए ऐसी छटपटाती कि मेरी हथेलियों पर चोंच मार-मार कर अपनी आज़ादी माँगने लगती।
उसे आज़ाद होते देख मैं हमेशा सोचती— 'क्या ये मुझे याद रखेगी?' पर दिल के एक कोने में सुकून होता कि मैं उसे बचा सकी।
हथेलियों पर आज भी वो स्पर्श है...
आज ये सब लिखते हुए भी मैं अपनी हथेली पर उन घायल परिंदों के 'मूँगफली के दाने' जितने बड़े दिल की तेज़ धड़कन महसूस कर रही हूँ।
"वो भरोसा परिंदे का मेरी हथेली पर उतरा था एक दिन,
फिर ताउम्र मेरी हथेलियों ने महसूस की नर्मी उसकी।
वो नन्हा सा दिल आज भी थिरकता है मेरी हथेलियों के बीच 'निःशब्द',
और महसूस होती है ज़िंदगी में आज भी गर्मी उसकी।"
✍️'निःशब्द'
आज की शहरी 'चिल्लपों' और हमारा अपराधबोध...
आज की मशीनी दुनिया और शहरी शोर में ये चहचहाहट कहीं दब गई है। हम विकास की अंधी दौड़ में यह महसूस ही नहीं कर पा रहे कि हम क्या खो रहे हैं। यह दुनिया बिना परिंदों के कितनी नीरस और बेरौनक होगी?
जब मानव सभ्यता अन्य प्राणियों की अनदेखी कर उन्हें अपने स्वार्थ की बलि चढ़ाती है, तो मुझे खुद के 'मानव' होने पर गर्व नहीं, बल्कि अपराधबोध होता है। उन्होंने हम पर भरोसा किया और हमने उन्हें बेघर कर दिया।
"छीन कर उसका आशियाँ घर बनाया हमने,
'निःशब्द' ये कैसा अजब साथ निभाया हमने।।"
✍️'निःशब्द'
आज गौरैया, जो जीवन के हर दिन का हिस्सा थी, मात्र कैलेंडर का 'एक दिन' (Event) बनकर रह गई है। शायद अभी बहुत देर नहीं हुई है... गौरैया को अब भी उम्मीद है कि हम उसे वापस घर बुलाएंगे। उसकी चहचहाहट में छिपी वो मासूम उम्मीद मुझे तो सुनाई देती है... क्या आप सुन पा रहे हैं?
धरती पर परिंदे कम हो रहे हैं... उन्हें बुला लीजिए, वरना उनके बिना यह धरती बेजान और खामोश हो जाएगी।
एक कड़वी सच्चाई:
"मैंने आपकी खिड़की पर घोंसला नहीं बनाया साहब, जहाँ आपका मकान है, वहाँ कभी मेरा पेड़ हुआ करता था।"
✍️एक गौरैया.....🐦
अंत में वर्तमान की विडंबना......
"इक परिंदा हर रोज खटखटाता है दर मेरा,
जरूर मेरे दरवाजे में लकड़ी उसके पेड़ की है।"
✍️लेख, अमिता मिश्रा 'निःशब्द'💕
🖌️तस्वीर, जैमिनी एआई की सहायता से तैयार
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