'जहाँ चाह, वहाँ राह'
पिछले भाग में: आपने पढ़ा कि कैसे एक ग्रामीण परिवार से मिली अधूरी जानकारी ने कुमार विक्रमादित्य के मन में चंदनगढ़ की राजकुमारी 'सुवर्णा' के प्रति गहरी जिज्ञासा जगा दी।
क्या ध्रुवदेव महाराज को मनाने की कोई तरकीब निकाल पाएंगे? या कुमार विक्रमादित्य पिता की आज्ञा के विरुद्ध जाकर चंदनगढ़ की ओर प्रस्थान करेंगे? क्या सुवर्णपुर की वह स्वर्णमयी आभा कुमार के जीवन में भी कोई नवीन रंग घोलेगी? और सबसे बड़ा सवाल— क्या गुल खिलाएगी कुमार की यह जिज्ञासा? अब आगे.....
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कुमार और ध्रुवदेव ने चंदनगढ़ जाने की योजना पर काफी माथापच्ची की।
ध्रुवदेव बोले, "कुमार, कृपा कर यह राजहठ त्याग दें। मुझे समझ नहीं आ रहा कि हम महाराज से क्या कहकर अनुमति लेंगे, जबकि वे पहले ही हमें वापस लौटने का आदेश दे चुके हैं। मेरी मानिए तो आप महल लौट चलिए; चंदनगढ़ का समाचार मैं ले आऊँगा। आपको बस महाराज के सम्मुख मेरे लिए कोई छोटा-मोटा बहाना बनाना होगा।"
कुमार ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब जब राजहठ कर ही लिया है, तो उसे बीच में क्यों छोड़ूँ? रही बात अनुमति की, तो तुम्हारी यह 'संकटमोचक' बुद्धि आखिर कब काम आएगी?"
ध्रुवदेव ने नाटकीय ढंग से आह भरी, "हाय! जब से घर से चले हैं, बुद्धि ही घिस रहे हैं। अब तो यह बुद्धि खुद रानी माँ के हाथों के बने बादाम के लड्डू माँग रही है। किंतु आपको क्या... आपको तो चंदनगढ़ की झरबेरी खानी है!"
जब ध्रुवदेव ने रोनी सूरत बनाई, तो कुमार ठहाका मारकर हँस पड़े। तभी बाहर से आते शोर-शराबे को सुनकर उनकी हँसी एकाएक रुक गई। बाहर लोग उत्तेजित होकर ऊँचे स्वर में बातें कर रहे थे। दोनों मित्र तुरंत बाहर निकले।
वहाँ कुछ लोग एकत्रित होकर गंभीर चर्चा कर रहे थे— ‘बहुत बुरा हुआ’, ‘महाराज के दरबार में स्वयं अर्जी देनी चाहिए’, ‘ऐसे तो खेती चौपट हो जाएगी’, ‘अरे, सुमेर की बछिया भी उठा ले गया!’ ऐसे शब्द सुनकर कुमार और ध्रुवदेव उनके निकट जा पहुँचे। पूछताछ करने पर पता चला कि ये लोग सौवीरनगर के सीमावर्ती क्षेत्र से आए हैं, जो चंदनगढ़ से लगा हुआ वनप्रदेश है। वहाँ जंगली पशुओं ने भारी उत्पात मचा रखा है। एक ओर शाकाहारी पशु फसलों को नष्ट कर रहे हैं, तो दूसरी ओर हिंसक वन्यजीव मवेशियों और मनुष्यों पर हमला कर रहे हैं। क्षेत्रीय अधिकारियों ने राजा तक सूचना तो भिजवाई है, किंतु अत्यधिक दूरी के कारण अभी तक कोई सहायता प्राप्त नहीं हुई है।
यह सब सुनकर कुमार और ध्रुवदेव गहन चिंतन में पड़ गए। वे वापस अपने कक्ष में आए और स्थिति पर पुनर्विचार करने लगे।
ध्रुवदेव बोले, "लगता है प्रजा की समस्या और आपकी 'ज़िद' का हल एक साथ ही मिल गया है।"
कुमार ने सहमति जताई, "हाँ, यही उचित मार्ग है। हम पिताजी को पत्र लिखेंगे। हमारा पत्र कर्णसिंह जी के माध्यम से सीधा उन तक पहुँच जाएगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि हमें अनुमति मिल जाएगी। जब प्रजा संकट में हो, तो हम मुँह मोड़कर नहीं लौट सकते।"
ध्रुवदेव ने सिर हिलाया— "तो विलंब कैसा? आप तत्काल पत्र लिखिए, मैं अभी कर्णसिंह के संदेशवाहक के माध्यम से इसे रवाना करवाता हूँ।"
कुमार तत्काल पत्र लिखने बैठ गए और ध्रुवदेव ने उसे हाथों-हाथ रवाना कर दिया। इसके पश्चात दोनों निश्चिंत होकर भोजन और चर्चाओं के बीच निद्रा की गोद में चले गए।
यद्यपि उन्होंने कर्णसिंह को स्पष्ट कुछ नहीं बताया था, किंतु कर्णसिंह जैसे अनुभवी व्यक्ति को अंदेशा हो गया था। उन्होंने गौर किया कि महाराज का आदेश मिलने के बाद भी कुमार वापसी में टालमटोल कर रहे हैं। उन्हें संदेह हुआ कि दोनों मित्र कुछ छिपा रहे हैं, अतः उन्होंने अपने एक विश्वसनीय सेवक को उन पर गुप्त दृष्टि रखने का आदेश दिया और स्वयं पत्र लेकर महाराज की ओर प्रस्थान कर गए।
महल के एक विशेष कक्ष में महाराज को कुमार का पत्र सौंपकर कर्णसिंह यथोचित आसन पर बैठ गए।
महाराज ने पत्र खोला और गंभीरता से पढ़ने लगे: कुमार का पत्र.......
“सेवा में,
परम पूज्य पिताश्री महाराज के श्रीचरणों में सादर चरण वंदना।
पिताजी, आपके आज्ञा-पत्र के अनुपालन में हम राजधानी वापसी हेतु उद्यत थे, किंतु मार्ग में हमें सीमांत क्षेत्रों की विषम स्थिति का भान हुआ है। ज्ञात हुआ है कि निकटवर्ती वनों में हिंसक पशुओं की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, जिससे कृषकों की खड़ी फसलें नष्ट हो रही हैं और जनसामान्य में भय व्याप्त है। प्रजा के इन कष्टों का निवारण करना एक राजकुमार के नाते हमारा प्राथमिक धर्म है।
अतः, ध्रुवदेव और मैं आपसे विनम्र निवेदन करते हैं कि हमें कुछ सप्ताह इन सीमांत वनों में 'अज्ञात' रहकर आखेट और सैन्य अभ्यास की अनुमति प्रदान की जाए। इस गुप्त प्रवास से हमें न केवल सीमावर्ती प्रदेशों की जनसमस्याओं का वास्तविक ज्ञान होगा, बल्कि हमारी धनुर्विद्या का अभ्यास भी सुदृढ़ होगा।
यदि आप यह अनुमति प्रदान करते हैं, तो आदरणीय कर्णसिंह जी के माध्यम से हमें एक विशेष राजकीय अनुमति-पत्र भिजवा दें, जिसमें हमें नकली नाम ‘जीवनदास सिंह’ और ‘मुँहबोला सिंह’ के रूप में संबोधित किया गया हो। हम कुछ समय इसी छद्म परिचय से सीमांत वनों की सुरक्षा करेंगे। अन्य समाचार आपको कर्णसिंह जी के द्वारा प्राप्त हो जाएंगे। पूज्य माताजी को हमारा प्रणाम कहिएगा। उनसे कहिएगा कि हम अपना दायित्व पूर्ण कर शीघ्र उनके सम्मुख उपस्थित होंगे।
आपका आज्ञाकारी पुत्र,
विक्रमादित्य”
महाराज ने शांत भाव से पत्र पढ़ा और कर्णसिंह से बोले, "कुमार ने सीमांत वनों में प्रवास और आखेट की अनुमति माँगी है। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं। मैं उत्तर लिख देता हूँ, आप साथ ले जाइएगा।" फिर कर्णसिंह की आँखों में झाँकते हुए उन्होंने पूछा, "आप कुछ कहना चाहते हैं, कर्णसिंह?"
कर्णसिंह बोले, "जी महाराज! कुमार एवं ध्रुवदेव के व्यवहार से मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि वे हमसे कुछ छिपा रहे हैं। मैं अभी तक उनके वास्तविक मंतव्य का पता नहीं लगा सका हूँ। आपका क्या आदेश है?"
महाराज मुस्कुराए, "हूँ... वे जो करना चाहते हैं, उन्हें करने दें। पत्र का उत्तर देने के पश्चात आप गुप्त रूप से उन पर दृष्टि रखिए। मुझे आप पर और उन दोनों के सामर्थ्य पर पूर्ण विश्वास है।"
महाराज का उत्तर लेकर कर्णसिंह वापस लौट गए। उन्होंने महाराज का प्रत्युत्तर और ‘जीवनदास सिंह’ एवं ‘मुँहबोला सिंह’ के नाम का विशेष आज्ञा-पत्र कुमार को सौंप दिया। इसके बाद वे स्वयं ओझल होकर उन दोनों पर इस प्रकार दृष्टि रखने लगे कि उन्हें आभास तक न हुआ।
कर्णसिंह के जाने के बाद कुमार ने उत्सुकता से महाराज का पत्र खोला: महाराज का पत्र......
”आयुष्मान भव: पुत्र विक्रमादित्य!
तुम्हारा पत्र प्राप्त हुआ। प्रजा के प्रति तुम्हारी संवेदनशीलता और उनके कष्टों के निवारण हेतु तुम्हारी तत्परता देखकर हमें संतोष हुआ है। एक भावी राजा के लिए अपनी प्रजा की रक्षा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है।
अतः, हम तुम्हें और ध्रुवदेव को सीमांत वनों में रुककर सैन्य अभ्यास की सहर्ष अनुमति प्रदान करते हैं। किंतु सावधान रहना पुत्र! सीमाओं के सघन वन जितने सौंदर्यपूर्ण हैं, उतने ही अनिश्चित भी। अपनी सुरक्षा के प्रति तनिक भी असावधान न होना। ध्रुवदेव को भी हमारा शुभाशीष कहना। हमें तुम्हारी गौरवपूर्ण वापसी की प्रतीक्षा रहेगी।
शुभकामनाओं सहित,
महाराज, सौवीरनगर”
पत्र पढ़कर कुमार ने उसे ध्रुवदेव की ओर बढ़ा दिया। महाराज की अनुमति ने उन दोनों का मार्ग निष्कंटक कर दिया था।
ध्रुवदेव मुस्कुराते हुए बोले, "लीजिए, अब तो आपका मार्ग प्रशस्त हो गया। अब क्या विचार है?"
कुमार ने धीमी हँसी के साथ कहा, "अब क्या? पथिक के वेश में हम यह मार्ग तय करेंगे। मुझे तो सुवर्णपुर की वह स्वर्णिम आभा देखनी है।"
ध्रुवदेव ने चुटकी ली, "हाँ, और साथ में राजकुमारी स्वर्णप्रभा की आभा भी देख लीजिएगा!"
दोनों मित्र ठहाका लगाकर हँसते हुए अपनी तैयारी में जुट गए।
'क्रमशः'
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अगली कड़ी में: कुमार और ध्रुवदेव तो 'जीवनदास' और 'मुँहबोला' बनकर रहस्य की खोज में निकल पड़े हैं, किंतु जिस 'राजकुमारी सुवर्णा' के लिए उन्होंने यह जोखिम उठाया है, उसका अतीत क्या है? कैसा है चंदनगढ़? और कैसी है सुवर्णा और उसका बचपन? जानने के लिए पढ़िए अगला भाग— 'एक पुरानी स्मृति, एक अनजाना डर'।
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