सुवर्णा और आग का भय
पिछले भाग में: आपने पढ़ा चंदनगढ़ के बारे में और उसकी राजधानी स्वर्णपुर में जन्मी राजकुमारी स्वर्णप्रभा के बारे में। साथ ही आपने पढ़ा कि राजकुमारी को अग्नि से भय लगता है। अब आगे....
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उस दिन राजकुमारी का सत्रहवाँ जन्मदिन था। हर वर्ष की भाँति महल में धूमधाम से उत्सव मनाया जाना था। प्रातःकाल उठते ही उसकी प्रिय सखी चंदा और अन्य सखियाँ उसे श्रृंगार के पश्चात नगर के प्रसिद्ध शिव-मंदिर ले गईं, जहाँ उसके माता-पिता और अन्य गणमान्य अतिथि भी उपस्थित थे। उसने माता-पिता के साथ मंदिर के पुजारी के निर्देशानुसार विधि-विधान से शिव-पूजन किया और उपस्थित प्रजाननों का आशीर्वाद प्राप्त किया। दिनभर महल में उत्सव का माहौल रहा; गरीबों को यथायोग्य दान, भोजन और वस्त्र वितरित किए गए।
शाम ढलते ही भोजन आदि से निवृत्त होकर सभी सखियाँ राजकुमारी के कक्ष में एकत्रित हुईं और हँसी-मज़ाक शुरू हो गया।
तभी कुमारी की एक सखी, भामा, जरा बनावटी मुँह लटकाकर बैठ गई। माधवी उसे टोकते हुए बोली, "अरी भामा! तू किस सोच में मुँह लटकाए बैठी है?"
भामा ने थोड़ा और उदास होने का अभिनय करते हुए कहा, "मुँह क्या लटकाऊँ, मुझे तो रोना आ रहा है।"
चंदा ने तपाक से कहा, "मारूँगी एक! अगर आज के दिन रोई तो... आज हमारी प्रिय सखी का जन्मोत्सव है और इसे रोना सूझ रहा है। क्या भोजन में पूरियाँ कम पड़ गईं तुझे?"
कुमारी ने पास आकर भामा का हाथ थाम लिया और चिंतित होकर बोली, "तेरा स्वास्थ्य तो ठीक है न? बता, क्या वैद्यजी को बुलाऊँ? तू रोने की बात क्यों कर रही है? क्या मुझसे कोई भूल हो गई?"
भामा ने सिर पर हाथ रखकर कहा, "दैया रे! ज़रा मुँह भी नहीं लटकाने देतीं... अरे, मैं तो हिसाब जोड़ रही थी कि हमारी प्यारी सखी सत्रह की हो गई है, अब तो जल्द ही दूल्हा आएगा और आपको अपने साथ ससुराल ले जाएगा। तो मैं बस विदाई में रोने का अभ्यास करने लगी... वरना आपको तो पता ही है न, मुझे तो बिना बात पर भी हँसी आ जाती है!" यह कहकर उसने दाँत निकाल दिए।
बस फिर क्या था, चंदा और अन्य सखियाँ चिढ़कर उस पर झपटीं— "मरी! तुझे अभी ही रोने का अभ्यास करना है? रुक, हम कराते हैं तुझे रोने का अभ्यास!" चंदा भामा को पकड़ने दौड़ी और भामा उसे जीभ दिखाकर भागी।
यह सब देखकर कुमारी खिलखिलाकर हँस पड़ी और पूरा कक्ष सखियों के ठहाकों से गूँज उठा।
अकस्मात की इस आपाधापी में सखियों का ध्यान ही नहीं रहा कि कोने में रखा ऊँचा रजत दीपस्तंभ डगमगा रहा है। अचानक भामा का पल्ला उससे उलझा और भारी दीपस्तंभ सीधे खिड़की के झीने रेशमी परदों पर जा गिरा। पलक झपकते ही आग लग गई। यद्यपि आग बहुत विकराल नहीं थी, किंतु अचानक आग सामने देखकर कुमारी मानो सदमे से जड़ हो गईं।
सखियाँ तो पानी और चादरें लेकर आग बुझाने दौड़ीं, परंतु सुवर्णा... सुवर्णा का शरीर तो मानो पत्थर का हो गया। उसकी आँखों के सामने उस जलते परदे की जगह 'धधकता अलाव' नाचने लगा। उसे लगा जैसे हवा में पंखों के जलने की गंध है। उसे कानों में पंछियों की दर्दभरी चीख सुनाई दी– जो उसके ह्रदय को बींध गई। उसके गले से आवाज़ नहीं निकली, बस वह अपनी आँखों को हाथों से ढँककर वहीं ज़मीन पर ढह गई।
सखियों ने फुर्ती दिखाते हुए पानी डालकर आग तो बुझा दी, किंतु हलचल सुनकर रानीमाँ वहाँ आ पहुँचीं। उन्होंने सखियों को डपटकर शांत किया और सहमी हुई कुमारी को हृदय से लगा लिया। सखियाँ भी ग्लानि से भर गईं कि अनजाने में ही उन्होंने अपनी प्रिय सखी को इतना भयभीत कर दिया था।
तब तक कुमारी ने स्वयं को संयत कर लिया था और यथासंभव मुस्कुराकर माँ को समझाने लगीं, "माँ, आप शांत हो जाइए। मैं ठीक हूँ, बस ज़रा सा डर गई थी। आप मेरी सखियों को कुछ न कहें, इनकी कोई गलती नहीं है। ये तो बस मेरा मन बहला रही थीं और मुझे भी इनके साथ बहुत आनंद आ रहा था। मेरी सखियों ने आज मेरा दिन बना दिया है; अब अगर आप इन्हें डाँटेंगी, तो मुझे बहुत दुख होगा।" यह कहकर कुमारी ने उदास होने का स्वाँग किया।
कुमारी को उदास होते देख रानीमाँ पिघल गईं और बोलीं, "अरी लाडो! मैं तुम्हारी सखियों को कुछ नहीं कह रही। मैं तो बस तुम्हारे लिए डर गई थी। तुम्हारे पिताजी महाराज सुनेंगे तो रुष्ट होंगे, पर मैं उन्हें समझा लूँगी।" फिर सखियों की ओर मुड़कर उन्होंने ममता से कहा, "तुम सब खेलो-कूदो, पर ज़रा सावधानी भी बरतो। सिर्फ सुवर्णा ही नहीं, तुम सब भी मेरी बेटियों जैसी हो। बचपन से मेरे सामने ही पली-बढ़ी हो, तुम्हें डाँटना मुझे भी अच्छा नहीं लगता।"
चंदा और अन्य सखियाँ रानीमाँ के समीप आकर बैठ गईं। चंदा बोली, "हमें क्षमा कर दीजिए रानीमाँ! हमें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि ऐसा कुछ हो जाएगा। आगे से हम पूरा ध्यान रखेंगी।"
भामा ने भावुक होकर कहा, "और आपकी डाँट हमें कभी बुरी लग ही नहीं सकती, क्योंकि आप हमें कभी अपनी माँ से अलग लगी ही नहीं। हम चुहलबाज़ी में जरा असावधान हो गई थीं, भविष्य में सचेत रहेंगी।"
रानीमाँ ने प्रेमपूर्वक सखियों के सिर पर हाथ रखा और बोलीं, "अच्छा-अच्छा... अब बहुत खेल चुकीं तुम सब। देखो, रात्रि अधिक हो गई है, अब तुम सब घर जाओ और कुमारी को भी विश्राम करने दो। बाकी किलोलें अब कल करना।"
"जैसा आप कहें रानीमाँ!" सखियों ने हामी भरी और बारी-बारी से कुमारी के गले लगकर अपने घरों की ओर प्रस्थान किया।
'क्रमशः'
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अगली कड़ी में: सत्रहवें जन्मदिन की उस नन्हीं सी चिंगारी ने सुवर्णा के मन में किस पुराने भय को पुनर्जीवित कर दिया? क्या परिणाम होगा सुवर्णा के इस बढ़ते 'अग्नि-भय' का? और आखिर वह कौन सी 'प्रेरणा' या 'विवशता' होगी, जिसके कारण सुवर्णा अपनी आँखों पर पट्टी बाँधने जैसा कठोर निर्णय लेगी? सुवर्णा के इस रहस्यमयी सफर का अगला अध्याय पढ़ना न भूलें!
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