Tuesday, April 21, 2026

श्रेष्ठता की परीक्षा: भाग- ४

'विवशता और निष्ठुर संकल्प'

पिछले भाग में:"नमस्ते मित्रों! पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे वर्षों की साधना का अहंकार मेनका के एक सत्य के सामने मिट्टी में मिल गया। ग्लानि और अपमान से भरे विश्वामित्र ने मेनका को तो निर्वासित कर दिया, पर असली परीक्षा तो अभी शुरू होनी थी।

​आज 'श्रेष्ठता की परीक्षा' के इस चौथे भाग में हम देखेंगे 'विवशता और निष्ठुर संकल्प'

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आश्रम से निष्कासित मेनका के कदम आहत मन के भारी बोझ से शिथिल थे। शरीर प्रसव की पीड़ा से टूट रहा था और हृदय अपमान के बोझ से व्यथित था। दैवयोग से आश्रम से कुछ ही दूर, घने कुंजों के बीच उसने एक अत्यंत सुंदर कन्या को जन्म दिया। उस नवजात मानवकन्या की कोमल किलकारियाँ सुनकर एक पल को मेनका का मातृत्व जाग उठा, वह उसे हृदय से लगा लेना चाहती थी। किंतु अगले ही क्षण उसे देवराज की आज्ञा और अपनी नियति का स्मरण हो आया। वह जानती थी कि स्वर्ग के नियमों के अनुसार वह एक मानवकन्या को जीवित एवं सशरीर अपने साथ देवलोक नहीं ले जा सकती। अपनी विवशता और असमर्थता की अग्नि में जलती हुई, भारी मन से उसने उस नन्ही सी जान को अपने पीत उत्तरीय में लपेटकर उसके मस्तक को स्नेह से चूमा और कुछ क्षण सबकुछ भूलकर उस कन्या के भोले मुख को निहारती रही। 

वह उसे निहारते हुए संभवतः सदियाँ काट देती किंतु हठात पंछियों के कलरव ने उसे ममता के नम आकाश से वास्तविकता के शुष्क एवं कठोर धरातल पर बलपूर्वक उतार दिया। 

मेनका ने पुनः कन्या का मुख चूमा उसके मस्तक पर स्नेह एवं आषीश का हाथ फेरा फिर उसे वहीं धरती पर लिटाकर बोली: “क्षमा करना पुत्री! मैं तुम्हें बस इतनी ही ममता प्रदान कर सकती थी, किंतु मेरा आशीर्वाद सदैव तुमपर रहेगा।” ( फिर शून्य मे हाथ जोड़कर बोली) 

“हे वनदेवी! आपसे एक मां अपनी संतान की रक्षा की अपेक्षा करती है। मेरी इस संतान को अपने अँचल में सुरक्षित रखना जब तक यह किसी महान ह्रदय की सुरक्षा न प्राप्त कर ले।” ये कहते हुए अप्सरा ने हाथ जोड़कर शून्य मे स्थित वनदेवी को प्रणाम किया और एक भरपूर दृष्टि कन्या पर डालकर उसे वहीं वन्यदेवी के संरक्षण में सौंपकर अश्रुपूरित नेत्रों के साथ बादलों की ओट में ओझल हो गई।

​उधर, मेनका को आश्रम से निर्वासित करने के पश्चात, ऋषि विश्वामित्र के भीतर का तूफ़ान अभी भी शांत नहीं हुआ था। वे किसी को इस सारे प्रकरण का दंड देना चाहते थे किंतु किसे? आखिर वे शून्य ह्रदय लिए ड्योढ़ी पर बैठ गए और अपना सिर थाम लिया। पश्चाताप और ग्लानि की ज्वाला उनके रोम-रोम को जला रही थी।

​वे जो हुआ उसपर विचार करने लगे: 'ओह, यह मैंने क्या कर दिया? क्यों मैं इस जगतनिंदित काम से सावधान न रह सका? देवराज इंद्र का स्वार्थ और शंकापूर्ण दुस्साहस तो जगत विदित है किंतु मैं स्वयं भी तो देवराज को दोष देने के योग्य नहीं क्योंकि उन्होंने तो मात्र मुझे परखा लेकिन मेरा पतन तो मेरे ही अहंकार एवं प्रमाद ने किया है। इसीलिए आज मैं किसी को दोषी ठहराने योग्य नहीं हूँ बल्कि मैं स्वयं अपनी ही चूक पर लज्जित हो रहा हूँ। ओह, निश्चय ही तपस्या से अधिक विकट एवं आवश्यक कार्य है उसकी रक्षा करना। आह, मेरा वर्षों का श्रम ऐसे लज्जापूर्ण ढंग से नष्ट हो गया। अब मैं किस प्रकार संसार का सामना करुँगा? देवराज और देवी मेनका को दोष देकर मैं स्वयं को निर्दोष सिद्ध नहीं कर सकता। चूक अपनी है, हानि भी अपनी है, किंतु मैं राजर्षि विश्वामित्र हूँ, मैं कदापि हार नहीं मान सकता न ही इस लज्जा के साथ संसार का सामना कर सकूँगा कि इतना वैभवपूर्ण तप और सिद्धियों से सुसज्जित राजर्षि विश्वामित्र पलक झपकते एक अप्सरा के सौंदर्य पर लहालोट हो गए और अपना समस्त तेज उसके चरणों में न्योछावर कर दिया और आज अति मूल्यवान सिद्धियों को कौड़ियों के भाव लुटाकर रिक्त हो गए। नहीं... नहीं... यह मुझसे सहन न होगा।'

ग्लानि अब एक भीषण संकल्प में बदल चुकी थी। ऋषिवर ने कांपते हाथों से कमंडल उठाया और हथेली में जल लेकर अत्यंत ओजपूर्ण और दृढ़ वाणी में बोल उठे: "हे भगवती गायत्री! हे माता, मुझ अपराधी को क्षमा करो! आपका यह पुत्र लज्जित है और स्वयं से पराजित होकर आपसे क्षमा याचना करता है। मैं आपके चरणों की सौगंध के साथ शपथ लेता हूँ कि आज और अभी से पुनः आपकी तपस्या में स्वयं को न्योछावर कर दूँगा। मैं विश्वामित्र—अग्नि, जल, धरा, वायु एवं आकाश को साक्षी मानकर संकल्प लेता हूँ कि अपनी सम्पूर्ण सिद्धियाँ, सम्पूर्ण तपबल और तेज पुनः एवं पहले से अधिक कठोर तप के द्वारा अर्जित करूँगा और जब तक ऐसा नहीं कर लेता, संसार एवं सांसारिकता से मेरा कोई संबंध नहीं होगा।"

​ये कहते हुए उन्होंने जल को भूमि पर छोड़ दिया, मानो अपने पिछले मोह को सदा के लिए विसर्जित कर दिया हो। उनके मुखमंडल पर अब संकल्प का वह दपदपाता तेज था जो किसी भी बाधा को भस्म कर दे। वे इसी संकल्पबल से तमतमाते हुए उस आश्रम को सदा के लिए त्याग कर निकल पड़े।

​विश्वामित्र आश्रम की सीमा से कुछ ही दूर पहुँचे थे कि अचानक वन के सन्नाटे को चीरती हुई एक हृदयविदारक शिशु-रुदन की आवाज़ उनके कानों में पड़ी। उनके पैर जहाँ के तहाँ जम गए। उन्होंने गर्दन घुमाकर देखा—सामने एक विशाल वृक्ष के नीचे, शकुनों(पंक्षी) से घिरी और घास के बिस्तर पर एक नवजात कन्या दिव्य वस्त्रों में लिपटी अनाथ की भाँति पड़ी थी। उन वस्त्रों की दिव्यता देखते ही विश्वामित्र को सत्य का भान हो गया। यह उन्हीं की कन्या थी, जो मेनका की कोख से जन्मी थी। उनके वर्षों के योग का यह सजीव परिणाम आज असहाय पड़ा था। जब उन्होंने उस बिलखती आत्मजा के पास मेनका को नहीं देखा, तो उनकी देह क्रोध से पुनः जलने लगी। वे समझ गए कि मेनका इसे छोड़कर स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर चुकी है।

​किंतु, उस रोती-बिलखती मासूम कन्या को देखकर भी विश्वामित्र का पत्थर जैसा हृदय नहीं पसीजा। पाप उन्होंने किया था और पश्चाताप की अग्नि में वे स्वयं जल रहे थे, पर उनकी आँखों पर प्रतिशोध का पर्दा पड़ा था और उनके पैरों को संकल्प की निष्ठुर बेड़ियों ने जकड़ लिया था। फिर ऐसे आहत एवं क्रोध के वशीभूत समय में मनुष्य का विवेक इतना स्थिर कहाँ रह जाता है कि वह अपनी भूलों को सुधार सके या अपनी आने वाली पीढ़ी को संरक्षण दे सके। 

विश्वामित्र को केवल अपने 'आत्म-कल्याण' की चिंता थी। उनके मन में स्थित विगत सिद्धि एवं सम्मान के पुर्नप्राप्ति के हठ ने उनके ह्रदय की स्निग्धता का बलात् अपहरण कर लिया था। उन्हें इतनी भी करुणा नहीं आई कि उस नन्ही बालिका को बाहों में उठाकर उसके लिए जल या दूध की व्यवस्था करते। या उसके लिए कोई संरक्षण ढ़ूढते, उनके भीतर का 'पिता' उनके अंदर के 'तपस्वी' के पराजित अहंकार के नीचे दब चुका था। वे उस निरीह बालिका को वहीं बिलखता छोड़कर, बिना पीछे मुड़े, वन की गहराईयों में विलीन हो गए।

क्रमशः

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अगले भाग में: ​"एक नवजात कन्या, जिसे माता ने विवशता में छोड़ा और पिता ने अहंकार में ठुकरा दिया... क्या वन के शकुन (पक्षी) ही अब उसके रक्षक बनेंगे? आखिर कौन थामेगा इस नन्ही जान का हाथ, जिसका अपना कोई नहीं? 

​जानने के लिए इंतज़ार कीजिए अगले और अंतिम अंक का 'करुणा का आश्रय'।"

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✍️‘निःशब्द’ की कलम से

🖌️तस्वीर जैमिनी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित




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