भूमिका:
"नमस्ते मित्रों! पिछले भाग में हमने देखा कि देवराज इंद्र और असुरराज विरोचन के बीच एक वैचारिक युद्ध छिड़ा था। विवाद का केंद्र था—क्या विश्वामित्र की व्यक्तिगत 'साधना' श्रेष्ठ है या महर्षि कण्व की लोक-हितकारी 'सेवा'? इसी का निर्णय करने के लिए अप्सरा मेनका को विश्वामित्र के चरित्रबल की परीक्षा लेने हेतु धरा पर भेजा गया है।
आज कहानी के इस दूसरे भाग में हम उसी तपोवन में चलेंगे जहाँ वर्षों से मौन और संयम का राज था। आज परीक्षा है उस विवेक की, जिसे राजर्षि ने अपनी कठिन साधना से सींचा था। क्या साधना का यह सुदृढ़ किला मेनका के मायाजाल के सामने खड़ा रह पाएगा? आइए देखते हैं, इंद्रदेव की वह बात कितनी सत्य सिद्ध होती है कि बिना सेवा भाव के किया गया तप अंततः असुरक्षित ही रहता है।"
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धरती पर भोर की पहली किरण ने दस्तक दी। भगवती उषा का स्वर्णिम साम्राज्य सँवरने लगा और भुवन भास्कर सूर्यदेव प्राची दिशा में अपनी दिव्य आभा के साथ उदित हुए। यह ब्रह्ममुहूर्त का वह दिव्य समय था, जो भगवती गायत्री की आराधना के लिए सर्वोत्कृष्ट माना जाता है। वन के वृक्षों पर ओस की बूंदें मोतियों की भाँति चमक रही थीं और वातावरण में एक अलौकिक शीतलता एवं स्निग्धता व्याप्त थी।
तपस्वी विश्वामित्र अपनी नित्य साधना के कठिन सोपान—आसन, बंध और प्राणायाम समाप्त कर अब जप के लिए स्थिर हो चुके थे। उनके हृदय में वैराग्य की एक निर्मल धारा अहर्निश बहा करती थी, जिसके कारण उन्हें घंटों के ध्यान में भी रंच मात्र कष्ट न होता। बैठते ही उनका चित्त भगवान सविता के दिव्य भर्ग (तेज) से आच्छादित हो गया। ऐसा प्रतीत होता था मानो भगवती गायत्री और राजर्षि विश्वामित्र एकाकार हो गए हों। उनकी बंद आँखों के पीछे जैसे ब्रह्मांड का सारा प्रकाश सिमट आया था। उनकी मुखाकृति से ऐसा ओज फूट रहा था कि वन के हिंसक वन्य जंतु भी अपनी हिंसकता भूलकर उस पावन क्षेत्र में शांत भाव से विचरण करने लगते थे।
उनकी वह गहन शांति और अडिग स्थिरता ऐसी थी कि वायु भी वहाँ से गुजरते समय अपनी गति धीमी कर लेती थी। पक्षियों को भी कलरव करने का साहस न होता; वे टहनियों पर मौन बैठे उस महापुरुष के तेज को निहारने लगते थे, तो उस तेज के सम्मोहन से चहचहाना भूल जाते थे। समस्त चराचर जगत जैसे किसी मौन समाधि में लीन हो जाता था। वन के सिंह तक अपनी दहाड़ भूल जाते; वे केवल दिन के तृतीय प्रहर में ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराते, और वह भी ऋषि विश्वामित्र की प्रसन्नता के लिए, क्योंकि उस समय महर्षि वन-विहार हेतु आश्रम की सीमा छोड़ चुके होते थे। राजर्षि की तपस्या का ऐसा अद्भुत अनुशासन उस तपोवन के एक-एक वृक्ष एवं प्राणियों के हृदय तक में अंकित हो गया था।
अब तक यही उस वन में नित्य का दिव्य वातावरण था, किंतु आज उस नियमित स्तब्धता को चुनौती देने का साहस एक स्त्री ने किया। जिसकी एक चितवन पर संपूर्ण इंद्रपुर दीपक की लौ पर गिरने वाले शलभ (पतंगे) की भाँति मर-मिटने को तत्पर रहता था, आज उस सौंदर्य की अधिष्ठात्री ने अप्रतिम श्रृंगार कर विश्वामित्र के एकांत आश्रम में प्रवेश किया।
अचानक सन्नाटे को चीरती हुई पायल की एक मधुर झंकार से वह प्राण-पूत (पवित्र) वातावरण सिहर उठा। यह झंकार किसी साधारण स्त्री के कदमों की नहीं, बल्कि स्वर्ग की श्रेष्ठ नर्तकी के सधे हुए चरणों की थाप थी। वायु का रुख बदल गया और उसमें 'लोध्र' एवं 'पारिजात' के पुष्पों की तीक्ष्ण और मादक सुगंध तैरने लगी, जिसने आश्रम की सात्विक और सोममय गंध को पूरी तरह ढक लिया। जहाँ अब तक केवल शांति और साधना का कठोर साम्राज्य था, वहाँ देखते ही देखते मादकता और विलास की सूक्ष्म लहरें हिलोरें लेने लगीं।
मेनका वनप्रांत के सुरम्य वातावरण को अपनी पायल से गुंजायमान करने लगी। अद्भुत एवं स्वर्गीय नृत्य था वह। पवन भी रुककर मानो उसके ताल को सुन रही हो। इधर ऋषि के जप और ध्यान में शांत उन्मीलित नेत्रों के पटल को कानों से प्रवेश करने वाली पायल की झंकार ने ऐसे बलपूर्वक उघाड़ दिया, जैसे तीव्र हवा का झोंका पर्दों को सहसा खोल देता है।
ऋषिवर सुध-बुध खोकर उस अद्भुत नृत्य एवं सौंदर्य की देवी को अपलक निहारने लगे। ‘आह! यह अद्भुत रूप, यह मोहिनी दृष्टि और यह मंत्रमुग्ध कर देने वाला नृत्य!’
मेनका के अंगों की थिरकन और उसके वस्त्रों की सरसराहट ने विश्वामित्र के अंतर्मन में सुप्त पड़ी इच्छाओं को झकझोर दिया। देखते ही देखते वर्षों का जप टूट गया, तपस्या की ऊँची दीवारें ढह गईं और एकाग्रता छिन्न-भिन्न हो गई। आश्चर्य तो यह था कि जिस नियम को पालने में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया, वह एक क्षण में विसर्जित हो गया और साधक को इसका आभास तक न हुआ। यह कामदेव का वह अकाट्य प्रहार था, जिसने अपनी सर्वश्रेष्ठ कला के माध्यम से महर्षि के विवेक को न केवल कुंठित कर दिया, बल्कि संयम को बहाकर न जाने कितनी दूर ढकेल दिया।
ऋषिवर ने अपने संयम के प्रतीक—दण्ड और कमण्डलु को एक ओर रख दिया। उनकी स्थिति अब उस कस्तूरी मृग के समान हो गई थी, जो बहेलिये की संगीत-ध्वनि से वशीभूत होकर अपनी मृत्यु की ओर बढ़ पड़ता है, या उस सर्प की भाँति जो वेणु का नाद सुनकर अपनी सुध-बुध खो बैठता है। महर्षि ने अपना सर्वस्व, अपना युगों का अर्जित तेज उस रूपसी अप्सरा के चरणों में न्यौछावर कर दिया। आर्यावर्त के आकाश में जैसे बिजली कौंधी और यह समाचार चारों दिशाओं में फैल गया कि—तपस्या से अजेय विश्वामित्र का तप भंग हो गया है। सविता का अनन्य उपासक, माँ गायत्री का कठोर साधक सहसा ही सौंदर्य की नदी में प्रवाहित हो गया।
ऋषि अपनी साधना को पूर्णतः विस्मृत करके मेनका के प्रेम में आकंठ डूब गए। उन्हें दिवस और रात्रि की अनुभूति भी बिसर गई। ऐसा ही होता है जब साधक के अंदर कहीं-न-कहीं दबी हुई भोग की इच्छा शेष रह जाए, जो मेनका रूपी अवसर पाकर बाढ़ की तीव्रता के समान उमड़ पड़े। निश्चय ही ऋषिवर ने इच्छा को त्याग एवं संयम की कठोर साधना के बल पर बाँधकर दबा तो दिया था, किंतु विचार एवं विवेक से उसका निवारण न कर सके थे; इसीलिए अवसर पाते ही कुचली हुई इच्छा, त्याग एवं तपस्या की सबसे बड़ी शत्रु सिद्ध हुई।
तथापि समय का चक्र अत्यंत तीव्र गति से घूमने लगा। एक दिन, दो दिन, फिर सप्ताह, पक्ष और मास बीतते गए। प्रत्येक बीतते पल के साथ विश्वामित्र का वह संचित तप और मुख का दिव्य तेज धीरे-धीरे स्खलित होता गया। वर्षों का वह अनमोल श्रम, काम के आवेग में दो कौड़ी के दाम बिक गया। तपस्या गई तो उसके पीछे-पीछे उनकी आंतरिक शांति, उनका यश और संचित वैभव भी लेती गई। जिन सिद्धियों के लिए उन्होंने कभी अपना वैभवशाली राजपाट त्याग दिया था, उनके साधनापथ से भ्रष्ट होते ही उन सिद्धियों ने आज उन्हें त्याग दिया था। वे अब केवल एक कामातुर देह बन चुके थे, जो सौंदर्य के उस मायाजाल में पूरी तरह बंदी थी।
ऐसा लगता था मानो बरसों की तपस्या का श्रम काम के अँचल में विश्राम करने बैठ गया हो।
इस प्रकार राजर्षि कहलाने वाले विश्वामित्र काम के वशीभूत होकर अप्सरा मेनका के मायाजाल में ऐसे उलझे कि उन्हें संसार और स्वयं के अस्तित्व का भी विस्मरण हो गया।
‘क्रमशः’
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"जब साधना की ऊँची दीवारें कामदेव के एक ही प्रहार में ढह गईं, तब ऋषिवर ने अपनी ही नजरों में गिर जाने की उस अथाह ग्लानि का सामना कैसे किया? विश्वामित्र कैसे उबरे अपनी साधना की पराजय से और कैसे किया अपनी अद्भुत परीक्षक मेनका का सामना? क्या देवराज इंद्र की यह जीत वास्तव में साधना की परीक्षा सिद्ध हुई या यह एक ऋषि के तप के साथ किया गया भयंकर छल था? आखिर क्या परिणाम निकला मेनका और इंद्र के इस दुस्साहस का, जिसने इतिहास में एक महान साधक के पतन की अद्भुत गाथा लिख दी? और रचा एक ऐसा दृष्टांत जो युगों तक प्रत्येक साधक के लिए एक उदाहरण बन गया।
इन्हीं ज्वलंत प्रश्नों के उत्तर के साथ मिलते हैं अगले अंक में, अर्थात ‘श्रेष्ठता की परीक्षा’ का दूसरा भाग— 'मायाजाल और कटु सत्य'।"
✍️निःशब्द की कलम से💕
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