"नमस्कार दोस्तों! कहानी के पिछले भाग में आपने देखा कि कैसे पक्षियों के एक जोड़े ने अपने वृक्ष के नीचे ठहरे एक पथिक के अतिथि-सत्कार एवं प्राणरक्षा के लिए अपने स्वयं के प्राणों की आहुति दे दी। अब कहानी को आगे बढ़ाते हैं...।"
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जंगल में घटी उस अद्भुत घटना के कुछ वर्षों बाद, सौवीर नगर के राजमहल में एक रात……....
महल में अजब सी बेचैनी भरी नीरवता थी। महल के एक हिस्से से प्रसव-पीड़ा की सिसकियों और किसी स्त्री के कराहने की आवाज़ आ रही थी।
उस कक्ष से थोड़ी ही दूर पर एक अन्य कक्ष में सौवीर नगर के राजा सुकर्मादित्य बेचैनी से कमर के पीछे हाथ बाँधे इधर से उधर टहल रहे थे। वे थककर कुछ देर बैठ जाते और फिर बेचैनी से उठकर पूर्व की भाँति टहलने लगते।
तभी कक्ष के खुले द्वार से एक सेविका ने प्रवेश किया, उसके चेहरे से प्रसन्नता फूटी पड़ रही थी। वह चहक कर बोली— "महाराज की जय हो! महाराज, महारानी ने पुत्र को जन्म दिया है। बधाई हो महाराज!"
ऐसे कर्णप्रिय वचन सुनकर राजा कुछ क्षण के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ से हो गए। आज वर्षों बाद संतान प्राप्ति की उनकी प्रतीक्षा पूर्ण हुई थी। उनके हृदय से प्रसन्नता फूट पड़ने को थी, किंतु उन्होंने स्वयं को संयत करते हुए पूछा— "और महारानी कैसी हैं?"
जवाब दिया एक अन्य आगंतुक सेविका ने— "महाराज की जय हो! महारानी स्वस्थ हैं, महाराज! माता और पुत्र दोनों ही स्वस्थ हैं। हमारी कामना है कि वे सदैव स्वस्थ रहें एवं दीर्घायु हों। आप दोनों को हमारी एवं समस्त प्रजाजनों की ओर से बहुत-बहुत बधाइयाँ एवं मंगलकामनाएं, राजन्!"
सेविकाओं के मुख से यह मंगलमय समाचार सुनकर राजा के हृदय को अपूर्व शांति मिली। भावविह्वल होकर उन्होंने तत्काल अपने शरीर पर धारण की हुई मोती-माणिक की बहुमूल्य मालाएं उतारकर सेविकाओं को नेग स्वरूप प्रदान कर दीं।
बहुत जल्द यह सुसमाचार पूरे राज्य में फैल गया। राजकुमार के जन्म की खुशी में पूरे राज्य में उत्सव मनाया जाने लगा। राजा ने इस अवसर पर प्रजा के कर (tax) माफ कर दिए, उन्हें भोजन, वस्त्र और अन्य उपहारों से तृप्त किया, ताकि राजकुमार को प्रजा का आशीर्वाद प्राप्त हो सके। राजा सुकर्मादित्य अत्यंत कुशल एवं न्यायप्रिय थे; उनकी प्रजा उनसे अगाध प्रेम करती थी, इसलिए प्रजाजनों ने यह जन्मोत्सव ऐसे मनाया मानो उनके अपने घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई हो।
नामकरण का समय आने पर राजपरिवार के कुलगुरु ने नवजात को 'विक्रमादित्य' नाम दिया। उन्होंने भविष्यवाणी की कि राजकुमार वीर, दयालु, विद्यावान और बुद्धिमान होने के साथ-साथ सभी सद्गुणों से युक्त एक सफल राजा बनेगा।
इस प्रकार सौवीर नगर का वह राजकुमार महल में खेलते-कूदते बड़ा होने लगा। उचित आयु होने पर राजा-रानी ने उसे शिक्षा एवं शस्त्र प्रशिक्षण हेतु गुरुकुल भेज दिया। वहाँ उसने गुरुजनों से शस्त्र एवं शास्त्र का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया। अपनी तीव्र बुद्धि, सरल व्यवहार और वीरता के कारण वह गुरुकुल में गुरुओं का प्रिय शिष्य और सहपाठियों का प्रिय मित्र बन गया।
गुरुकुल में राजकुमार विक्रमादित्य की मित्रता अपने ही राज्य के मंत्रीपुत्र ध्रुवदेव से हुई। दोनों में मित्रता ऐसी थी जैसे शरीर और उसकी छाया। दोनों मित्र साथ पढ़ते, खेलते, खाते और रहते थे। राजकुमार विक्रमादित्य को अपने मित्र पर अटूट प्रेम एवं विश्वास था। दोनों एक-दूसरे के मन की बात जानने, समझने और मदद करने वाले थे।
कुछ सालों तक गुरुकुल में सभी शिक्षाएं प्राप्त कर राजकुमार अपने मित्र के साथ महल लौट आए और पिता के दिशा-निर्देश में राजकीय कुशलता सीखने लगे। राजा सुकर्मादित्य अपने मंत्रियों एवं परिजनों के साथ पुत्र को नीति एवं प्रजापालन के गुण सिखाने लगे, जिसमें मंत्रीपुत्र ध्रुवदेव भी सम्मिलित रहा। राजा और राजकुमार समेत सभी ध्रुवदेव में एक भावी मंत्री की छवि देखते थे।
एक दिन राजा-रानी अपने निजी कक्ष में बैठे थे, जब राजकुमार विक्रमादित्य ने अनुमति लेकर वहाँ प्रवेश किया। कुमार ने अपने माता-पिता का अभिवादन किया और उनका आशीर्वाद एवं अनुमति लेकर बैठ गए।
रानी ने अपने प्रिय पुत्र को गले लगाते हुए मुस्कुरा कर कहा— "आज अकस्मात हमारे अतिव्यस्त पुत्र को हमारे पास आने की क्या आवश्यकता पड़ गई? आप तो अपने पिता से भी अधिक व्यस्त रहने लगे हो।"
इससे पहले कि कुमार कुछ बोलते, राजा बोल पड़े— "पुत्र, यह व्यंग्य बाण तो सीधा मुझ पर संधान किया गया था।" फिर दोनों पिता-पुत्र हँस दिए।
रानी ने भी मुस्कुरा कर कनखियों से पति की ओर देखा, किंतु कुछ बोली नहीं।
राजा बोले— "देवी, मैंने ही कुमार को यहाँ बुलाया है। अस्तु, यह स्वयं भी नहीं जानते कि ये यहाँ क्यों हैं।"
विक्रमादित्य भी संकोच के साथ बोले— "माँ, आपसे तो नित्य ही मिलता हूँ न… बस अधिक अवकाश न होने से हम तीनों एक साथ ज्यादा देर नहीं बैठ पाते हैं। क्या करें, हमारे राजकीय दायित्व ही ऐसे हैं।"
राजा-रानी के मुख पर पुत्र के दायित्वबोध से संतोष झलक आया।
राजा मुस्कुरा कर बोले— "पुत्र, तुम्हारी बात सच है और हम दोनों यह समझते भी हैं। तुम्हारी माता तो बस अवसर पाकर ठिठोली कर रही थीं।"
कुमार ने देखा माँ मुस्कुरा रही हैं, तो वे भी मुस्कुरा दिए।
राजा बोले— "पुत्र, मैंने तुम्हारे लिए कुछ आवश्यक कार्य सोचा है, जिसे मेरी आज्ञा मानकर तुम्हें अवश्य ही करना चाहिए। कंठाहार और मुकुट के भार से परे, तुम्हें अपनी मिट्टी की गंध पहचाननी होगी पुत्र।"
विक्रमादित्य बोले— "अवश्य पिताजी, बताइए मुझे क्या करना है?"
राजा बोले— "तुम्हें भेष बदलकर राज्य में अज्ञात बनकर रहना है और मेरे लिए प्रजाजनों की आवश्यकताओं एवं उनके सुख-दुख का पता करना है।" (यह सुनते ही रानी कुछ कहने को हुईं, पर राजा ने इशारे से उन्हें शांत रहने को कहा)। राजा आगे बोले— "इस बीच तुम आम नागरिक की तरह राज्य के निकट एवं सुदूर प्रांतों में जाकर रहोगे और वहाँ रहकर मुझे सूचनाएँ भेजोगे। सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए मैंने कुछ अत्यंत विश्वासी लोगों को चुना है। तो कहो, यह कार्य करोगे मेरे लिए?"
विक्रमादित्य ने प्रसन्न मन से कहा— "अवश्य, यह तो अत्यंत रोचक एवं रोमांचक कार्य है! मैं अवश्य करूँगा, किंतु मेरा एक अनुरोध है।"
राजा मुस्कुराते हुए बोले— "मैं जानता हूँ, तुम अपने मित्र ध्रुवदेव को साथ ले जाना चाहते हो।"
विक्रमादित्य मुस्कुरा कर बोले— "जी, क्या मुझे इसकी अनुमति है?"
राजा बोले— "पुत्र, तुम आवश्यक तैयारी करके कल अपने मित्र को लेकर यहाँ आओ। मैं ध्रुवदेव की एक छोटी सी परीक्षा लेना चाहता हूँ, फिर तुम उसे भी साथ ले जा सकते हो। और हाँ, स्मरण रहे कि यह सारी योजना गोपनीय है।"
विक्रमादित्य बोले— "जैसी आपकी इच्छा, पिताजी! क्या मैं अब जा सकता हूँ? मैंने अपने मित्रों के साथ झील में नौकाविहार की योजना बनाई है, वे सब प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"
"अवश्य पुत्र, अब तुम जा सकते हो," राजा बोले।
विक्रमादित्य ने माता-पिता का अभिवादन किया और चले गए।"
'क्रमशः'
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अगली कड़ी में: महाराज सुकर्मादित्य, ध्रुवदेव की कौन सी 'अनोखी परीक्षा' लेने वाले हैं? क्या ध्रुवदेव उस रहस्यमयी चुनौती को पार कर पाएंगे? और आखिर क्यों महाराज ने अपने पुत्र के लिए महलों के सुख त्यागकर साधारण जीवन जीने का यह कठिन मार्ग चुना? जानने के लिए पढ़िए 'सुवर्णा' का अगला रोमांचक भाग !
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