Tuesday, March 31, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग - ४


पिछली कड़ी में: महाराज सुकर्मादित्य ने रानी की चिंताओं को शांत करते हुए स्पष्ट किया कि कुमार विक्रमादित्य को 'साधारण जीवन' का अनुभव कराना उनके भविष्य के लिए एक अनिवार्य प्रशिक्षण है। अगले दिन शिव-उद्यान में महाराज ने ध्रुवदेव की मेधा की परीक्षा हेतु उनके सम्मुख तीन एक जैसी दिखने वाली स्वर्ण-मूर्तियाँ रखीं। ध्रुवदेव ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से उन मूर्तियों का रहस्य खोज निकाला है और अब वे घास के तिनकों की सहायता से अपनी बात सिद्ध करने वाले हैं।

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         ध्रुवदेव सधे हुए कदमों से चौकी के पास आकर पहली मूर्ति उठाई। उन्होंने एक तिनका हाथ में लिया और बड़े ही सधे हुए ढंग से उसे मूर्ति के कान के सूक्ष्म छिद्र में प्रविष्ट कराने लगे। उस समय रानी और कुमार की सांसें मानो थमी हुई थीं, वे एकटक ध्रुवदेव के हाथों को देख रहे थे; जबकि महाराज सुकर्मादित्य के अधरों पर एक रहस्यमयी मुस्कान खेल रही थी, मानो वे ध्रुवदेव के अगले कदम से पहले ही परिचित हों।
    


    जैसे ही ध्रुवदेव ने पहली मूर्ति के कान में तिनका प्रविष्ट किया, वह पल भर में उसके मुख के छिद्र से बाहर निकल आया। वहाँ एक अर्थपूर्ण सन्नाटा पसर गया। 

ध्रुवदेव ने मूर्ति को वापस चौकी पर रखते हुए शांत स्वर में कहा— "महाराज! यह मूर्ति कलात्मक दृष्टि से भले ही श्रेष्ठ हो, किंतु जीवन-मूल्यों के मापदंड पर यह अत्यंत अल्प मूल्य की है।"

महाराज सुकर्मादित्य ने अपनी भौहें सिकोड़ीं और उत्सुकता से पूछा— "अच्छा ध्रुव! वह कैसे? केवल एक तिनके के मुख से बाहर आने मात्र से तुमने इसका मूल्य इतना कम कैसे आंक लिया?"

ध्रुवदेव के स्वर में गजब का आत्मविश्वास था, वे बोले— "राजन्! यह मूर्ति समाज के उन व्यक्तियों का सटीक प्रतीक है जिनके पास पहुँची कोई भी बात सुरक्षित नहीं रहती। वे जो सुनते हैं, उसे बिना सोचे-समझे, बिना उसका मर्म जाने तुरंत बाहर उगल देते हैं। लोक-भाषा में इन्हें 'वाचाल' या 'चुगलखोर' भी कहा जाता है। गोपनीयता भंग करना और बातों को इधर-उधर फैलाना ही इनका मूल स्वभाव बन जाता है। इसी कारण इन्हें समाज में प्रायः तिरस्कार और अपमान झेलना पड़ता है, किंतु इनके चरित्र की जड़ता ऐसी है कि इन पर किसी लज्जा का प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसे लोग संकट के समय सबसे पहले विश्वासघाती सिद्ध होते हैं। अतः ऐसे खोखले चरित्र की प्रतीक यह मूर्ति निश्चित ही सबसे कम मूल्य की अधिकारी है।"
​महाराज, रानी और कुमार के मुख पर गहरी सहमति और संतोष के भाव उभर आए। ध्रुवदेव ने अब दूसरी मूर्ति उठाई और पुनः वही प्रक्रिया दोहराई। इस बार जब उन्होंने कान में तिनका डाला, तो वह मुख से नहीं, बल्कि मूर्ति के दूसरे कान से बाहर निकल आया।

ध्रुवदेव ने महाराज की ओर देखकर तार्किक स्वर में कहा— "महाराज! यह दूसरी मूर्ति पहली की अपेक्षा कुछ अधिक मूल्य की है। आपने देखा कि इस बार तिनका एक कान से भीतर जाकर दूसरे कान से बाहर निकल गया। अर्थात, यह उन लोगों का प्रतिनिधित्व करती है जो संसार की बातों को सुनते तो हैं, परंतु उन्हें अपने भीतर स्थान नहीं देते। वे सुनी हुई बातों पर न तो विचार करते हैं और न ही उनसे कोई सार ग्रहण करते हैं। समाज इन्हें अक्सर 'लापरवाह' समझकर उपेक्षित कर देता है। वैसे ये किसी का अहित नहीं करते, किंतु कुछ नया सीखते भी नहीं, इसलिए ये जीवन की बड़ी उपलब्धियों से प्रायः वंचित रह जाते हैं। चूँकि ये समाज के लिए प्रत्यक्ष रूप से हानिकारक भी नहीं हैं, इसलिए मैंने इनका मूल्य मध्यम श्रेणी का माना है।" 

इतना कहकर ध्रुवदेव रुक गए और महाराज की अगली प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगे।

महाराज के चेहरे पर एक मंद मुस्कान उभरी, वे बोले— "अद्भुत ध्रुव! तुम्हारी व्याख्या उत्तम और सूक्ष्म है। मैं तुम्हारे तर्क से पूर्णतः सहमत हूँ। अब... अब उस तीसरी मूर्ति का रहस्य खोलो।"

ध्रुवदेव के कदम अब अंतिम मूर्ति की ओर बढ़े। उन्होंने एक नया तृण उठाया और अत्यंत सावधानी से उसे मूर्ति के कान के छिद्र में प्रविष्ट किया। किंतु यह क्या! इस बार तिनका कहीं से भी बाहर नहीं आया। ध्रुवदेव ने एक के बाद एक दो-तीन तिनके और डाले, पर वे सब मूर्ति के भीतर ही कहीं विलीन हो गए।

ध्रुवदेव ने एक गहरी और सम्मानजनक दृष्टि महाराज पर डाली और बोले— "राजन्! यह तीसरी मूर्ति वास्तव में बहुमूल्य और दुर्लभ है। आपने देखा कि इसके भीतर गए तिनके बाहर नहीं आए, क्योंकि यह मूर्ति उन मनुष्यों का प्रतीक है जो गहरे, गंभीर और उच्च चरित्र के स्वामी होते हैं। ऐसे महापुरुष संसार की हर बात सुनते हैं, उसका सार अपने अंतर्मन में ग्रहण करते हैं, किंतु कभी भी किसी की गोपनीयता का दुरुपयोग नहीं करते। वे ज्ञान को अपने भीतर संचित करते हैं और केवल उचित समय पर ही सार्थक शब्द बोलते हैं। ऐसे व्यक्ति समाज के आधार स्तंभ होते हैं, जिन पर हर कोई निडर होकर विश्वास कर सकता है। ये सबके सच्चे हितैषी और विश्वसनीय मित्र होते हैं। संसार में ऐसे गंभीर व्यक्तित्व बहुत कम मिलते हैं, और जो विरल है, वही बहुमूल्य है। ऐसे मनुष्य का सानिध्य पाना किसी सौभाग्य से कम नहीं। अतः मेरे विचार से यही मूर्ति सर्वाधिक मूल्यवान है।"

जैसे ही ध्रुवदेव के शब्द शांत हुए, राजा, रानी और कुमार ने विस्मय के साथ एक-दूसरे को देखा। अचानक, कुमार विक्रमादित्य के भीतर का उत्साह बांध तोड़कर बाहर आ गया। वे अपने आसन से उठ खड़े हुए और तालियाँ बजाते हुए हर्षित स्वर में बोले— "अद्वितीय मित्र! वाह! तुमने निर्जीव धातुओं में जीवन के कितने गहरे सत्य पिरो दिए। तुम्हारी यह व्याख्या अविस्मरणीय है!"

​महाराज सुकर्मादित्य के नेत्रों में गौरव की चमक थी, वे बोले— "सत्य कहा पुत्र! ध्रुवदेव, तुम्हारा मूल्यांकन केवल सटीक ही नहीं, बल्कि सत्य की कसौटी पर पूर्णतः खरा है। तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम्हारी दृष्टि केवल सतह को नहीं, बल्कि मर्म को देखती है।"

​रानी का हृदय वात्सल्य से छलक उठा। वे गरिमा के साथ उठीं और ध्रुवदेव के निकट जाकर अत्यंत स्नेह से उनके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं— "मैं महाराज के वचनों का पूर्ण समर्थन करती हूँ, पुत्र! तुमने मानव स्वभाव का जो सूक्ष्म विश्लेषण किया है, वह तुम्हारी परिपक्व मेधा का प्रमाण है। लो, मेरी ओर से तुम्हारे लिए यह एक छोटा सा आशीर्वाद..."
​यह कहते हुए रानी ने अपने हाथों से एक रत्नजड़ित स्वर्ण बाजूबंद ध्रुवदेव की भुजा पर बाँध दिया। उनकी आँखों में वही ममता थी जो कुमार के लिए रहती थी। 

ध्रुवदेव ने अत्यंत विनम्रता के साथ राजा-रानी के चरण स्पर्श किए, मानो वे बाजूबंद से अधिक उनका ममत्वपूर्ण आशीर्वाद संजोना चाहते हों। रानी के स्नेह और इस सम्मान ने ध्रुवदेव के हृदय को कृतज्ञता से भर दिया। उनकी आँखों में प्रसन्नता की चमक थी।

कुछ क्षणों के सुखद वातावरण के पश्चात महाराज सुकर्मादित्य के चेहरे पर पुनः वही राजसी गंभीरता लौट आई। उन्होंने चर्चा का विषय बदलते हुए ध्रुवदेव को उस गुप्त मिशन की सूक्ष्म जानकारियाँ देनी प्रारंभ कीं। महाराज ने विस्तार से बताया कि कैसे उन्हें अपनी राजसी पहचान को त्यागकर, साधारण नागरिकों की भांति राज्य के सुदूर प्रांतों में रहना होगा। महाराज ने आधिकारिक रूप से ध्रुवदेव को कुमार विक्रमादित्य का मुख्य सहयोगी और रक्षक नियुक्त किया।

​यह सुनते ही ध्रुवदेव का मुखमंडल संकल्प से दीप्त हो उठा। वे बिना किसी संकोच के तत्काल तैयार हो गए। वास्तव में, दोनों ही मित्र इस अज्ञात यात्रा और रोमांचक जीवनशैली की कल्पना मात्र से मन ही मन अत्यंत उत्साहित थे। उनके लिए यह केवल एक राजकीय कार्य नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी को और करीब से जानने का एक स्वर्णिम अवसर था। कुछ देर राजा-रानी, राजकुमार विक्रमादित्य एवं ध्रुवदेव बाग में टहलते वहाँ के सुखद वातावरण का आनंद लेते हुए बातचीत करते रहे। महाराज सुकर्मादित्य ने दोनों को आवश्यक दिशानिर्देश दिए।

फिर ​महाराज ने ध्रुवदेव से वात्सल्यपूर्वक कहा— "ध्रुव! यद्यपि मैंने तुम्हारे पिता को इस योजना की पूर्व सूचना दे दी है और उन्होंने सहर्ष अपनी सहमति भी दी है, किंतु फिर भी मेरा मन कहता है कि तुम्हें एक बार स्वयं घर जाकर अपने माता-पिता से भेंट कर लेनी चाहिए। विदाई का क्षण परिवार के लिए सदैव महत्वपूर्ण होता है।"

​ध्रुवदेव ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया— "महाराज! आपकी आज्ञा मेरे और मेरे परिवार के लिए सर्वोपरि है। सत्य तो यह है कि मेरे जन्मदाता माता-पिता से अधिक आप दोनों ने मुझे वात्सल्य दिया है, मुझे पाला है और मेरी शिक्षा-दीक्षा का भार वहन किया है। मेरे पिता ने सदैव यही कहा है कि महाराज की सेवा ही मेरा प्रथम धर्म है और इसके लिए मुझे कभी अलग से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, एक पुत्र के कर्तव्य के नाते मैं उन्हें इस यात्रा की सूचना देने और उनका आशीर्वाद लेने अवश्य जाऊँगा। यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं कल प्रातः काल ही लौट आऊँ और फिर अपने प्रिय मित्र कुमार के साथ यहीं से इस यात्रा का श्रीगणेश करूँ?"

​महाराज ने उनकी निष्ठा देखकर संतोष से सिर हिलाया और बोले— "अवश्य पुत्र! तुम अभी जाओ और अपने माता-पिता के साथ कुछ समय बिताकर कल लौट आओ क्योंकि तुम दोनों की वापसी का समय अनिश्चित है। परंतु स्मरण रहे, इस यात्रा की गोपनीयता ही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। सूर्यपुर की सीमाओं से बाहर निकलने तक किसी को यह भनक न लगे कि राजकुमार कहाँ और किस भेष में हैं।"

​"जो आज्ञा महाराज! मैं इस बात का पूर्ण ध्यान रखूँगा," ध्रुवदेव ने दृढ़ता से कहा।

​ध्रुवदेव ने कुमार विक्रमादित्य को गले लगाया। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास और आने वाली चुनौतियों के लिए एक चमक थी। राजा-रानी को सविनय प्रणाम करके ध्रुवदेव अपने घर की ओर प्रस्थान कर गए। 

ध्रुवदेव के जाने के बाद, कुमार कुछ समय माता-पिता के साथ उद्यान में ही बैठे रहे और कुछ विशेष बातचीत एवं माता-पिता के स्नेहपूर्ण सान्निध्य के पश्चात अंततः, वे भी भारी मन और नई ऊर्जा के साथ अपने निजी कक्ष की ओर बढ़ गए, जहाँ कल की लंबी यात्रा के लिए उन्हें तैयारी करनी थी।

'क्रमशः'

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अगली कड़ी में: राजसी वैभव और सुरक्षा के घेरे को पीछे छोड़कर, आखिर किस नए रूप में सामने आएंगे कुमार विक्रमादित्य और ध्रुवदेव? क्या वे अपनी पहचान पूरी तरह गुप्त रख पाएंगे? और उस साधारण भेष में छिपे राजकुमार के लिए नियति ने कौन सा पहला पड़ाव तय किया है? 'सुवर्णा' की इस रोमांचक यात्रा का अगला अध्याय मिस न करें!

अगला भाग यहाँ पढ़ें: 

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