जैसे ही राजकुमार विक्रमादित्य की पदचाप कक्ष से ओझल हुई, रानी के चेहरे पर छाई मुस्कान चिंता की लकीरों में बदल गई।
उन्होंने व्याकुल होकर राजा की ओर देखा और उनके स्वर में एक ममतामयी अधीरता घुली थी— "आर्य! यह कैसा निर्णय है? क्या आपने अपने इकलौते पुत्र को वह कार्य सौंपा है जिसे हमारे सामान्य गुप्तचर भी सरलता से कर लेते? राजकुमार को इस प्रकार राजप्रासाद के वैभवपूर्ण सुरक्षा से दूर, किसी अज्ञात गुप्त निवास में साधारण जीवन जीने के लिए भेजने की क्या विवशता है? क्या राज्य की सीमाओं पर कोई संकट है या हमारे विश्वासपात्रों की निष्ठा डगमगा रही है? स्वामी, कृपया मेरी दुविधा का अंत करें, मेरा मन किसी अनहोनी की आशंका से कांप रहा है।"
महाराज सुकर्मादित्य ने गहरी श्वास ली और रानी के निकट आकर शांत भाव से बोले— "देवी! आपकी व्याकुलता स्वाभाविक है, किंतु आपने तो जिज्ञासावश प्रश्नों की पूरी झड़ी ही लगा दी। धैर्य धरें, न तो राज्य की सुरक्षा को कोई खतरा है और न ही हमारे गुप्तचरों की निष्ठा पर कोई प्रश्नचिह्न। सत्य तो यह है कि मैंने कुमार के लिए एक ऐसे प्रशिक्षण की योजना बनाई है, जो किसी गुरु के आश्रम में संभव नहीं था।"
"प्रशिक्षण? कैसा प्रशिक्षण, महाराज?" रानी ने चकित होकर पूछा।
राजा के नेत्रों में एक भविष्यदर्शी चमक उभरी। वे बोले— "देवी, यह आयु अदम्य ऊर्जा और असीमित जिज्ञासा की होती है। विक्रमादित्य केवल एक राजकुमार नहीं, बल्कि सूर्यपुर का भविष्य हैं। मैं चाहता हूँ कि सिंहासन की औपचारिकता और उत्तरदायित्व के मुकुट के भार तले दबने से पहले, वे उस 'मिट्टी की गंध' को पहचानें जिस पर उन्हें शासन करना है। महलों के झरोखों से प्रजा का दुख स्पष्ट नहीं दिखता, रानी! जब वे एक साधारण नागरिक बनकर गलियों में घूमेंगे, आम जनजीवन को निकटता से देखेंगे और उनकी समस्याओं एवं अभावों के बीच रहेंगे, तभी वे न्याय और करुणा का वास्तविक मूल्य समझ पाएंगे। यह अनुभव उन्हें केवल एक राजा नहीं, बल्कि एक 'लोकप्रिय शासक' बनाएगा। और विश्वास रखें, उनकी सुरक्षा के लिए अदृश्य साये सदैव उनके इर्द-गिर्द रहेंगे।"
रानी के अधरों पर एक आश्वस्त मुस्कान तैर गई। वे मधुर स्वर में बोलीं— "राजन्! सत्य तो यह है कि सुरक्षा की चिंता तो मुझे क्षण भर के लिए भी नहीं हुई, क्योंकि आपकी स्वाभाविक सजग बुद्धि पर मुझे स्वयं से अधिक विश्वास है। मैं आपके राजकीय उत्तरदायित्व बोध और पुत्र के प्रति आपकी सतर्कता से भी भलीभांति अवगत हूँ, मैं तो बस इस अनूठे निर्णय के पीछे छिपे मर्म को समझना चाहती थी। अब जब आपने स्थिति स्पष्ट कर दी है, तो मुझे कोई संकोच नहीं। विशेषकर तब, जब उनके साथ ध्रुवदेव जैसा अत्यंत सुह्रद एवं आत्मिक मित्र भी है, जो मेरे लिए विक्रम के समान ही प्रिय और अटूट विश्वसनीय है।"
राजा ने गंभीर मुस्कान के साथ रानी की ओर देखा। कक्ष में संध्या की सुनहरी धूप फैल रही थी।रानी ने कुछ रुककर अपनी उत्सुकता को स्वर दिया— "किंतु राजन्! कल आप ध्रुवदेव की कैसी परीक्षा लेने वाले हैं? मेरा हृदय कहता है कि वह आपकी अपेक्षाओं पर पूर्णतः खरा उतरेगा।"
महाराज की हँसी कक्ष में गूंज उठी— "भरोसा तो मुझे भी है प्रिये! किंतु यह परीक्षा नहीं, बल्कि उसके भविष्य के लिए एक छोटी सी जीवन-शिक्षा है। वह दृश्य कल आपके समक्ष ही होगा, तो धैर्य रखें। अब विदा दें, संध्या वंदन का समय हो रहा है। आप अपना ध्यान रखिएगा, देवी।"
यह कहते हुए राजा ने प्रेम और सम्मान के साथ रानी के कपोलों को छुआ। रानी की आँखों में उनके प्रति अगाध आदर उमड़ आया। उन्होंने धीरे से कहा— "आप भी अपना ध्यान रखें, आर्य!"
अगले दिन की स्वर्ण रश्मियाँ अभी राजप्रासाद के कंगूरों को छू ही रही थीं, जब कुमार विक्रमादित्य अपने कक्ष के वातायन के निकट खड़े होकर सुदूर अपने नगर सूर्यपुर को निहार रहे थे।
तभी महाराज के एक विश्वासपात्र सेवक ने विनम्रतापूर्वक प्रवेश किया और संदेश दिया— "कुमार, महाराज ने आपको शिव-उद्यान में तत्काल स्मरण किया है।"
कुमार के अधरों पर एक सहज मुस्कान उभर आई। वे समझ गए कि पिताजी ने उन्हें क्यों बुलाया है। वे बिना विलंब किए शिव-उद्यान की ओर चल दिए। उद्यान के द्वार पर उन्होंने देखा कि उनके अभिन्न मित्र ध्रुवदेव भी ठीक उसी क्षण वहाँ पहुँचे हैं। कल की मंत्रणा के बाद दोनों के मन में उत्साह और जिज्ञासा का ज्वार था। दोनों की आँखें मिलीं, वे मुस्कुराए और प्रेमवश गले लगकर एक साथ उद्यान के भीतर प्रविष्ट हुए।यह महाराज और महारानी के निजी विचरण के लिए निर्मित एक भव्य उद्यान था। इसके एक ओर नक्काशीदार शिव मंदिर था, जहाँ राज-दंपति संध्या-पूजन किया करते थे। फूलों की लदी क्यारियों के मध्य एक विशाल वटवृक्ष, पीपल के साथ सटकर गर्व से खड़ा था। वृक्ष की सघन छाया में संगमरमर की एक ऊँची चौकी बनी थी, जिसके चारों ओर बैठने हेतु अत्यंत सुंदर और कलात्मक सिंहासन रखे थे। उद्यान का वातावरण पुष्पों की सुगंध और प्रातःकालीन शीतल समीर से अत्यंत सुखद हो रहा था; पक्षियों का कलरव कानों को प्रिय और मन को मोह लेने वाला था।
महाराज सुकर्मादित्य और महारानी अपने सिंहासनों पर विराजमान थे। उनके मुख-मंडल पर एक विशेष तेज और गंभीरता थी। दोनों मित्रों ने आगे बढ़कर आदरपूर्वक उनके चरण स्पर्श किए। राजा-रानी ने स्नेहिल आशीष देते हुए उन्हें अपने समीप बैठने का संकेत किया। उस समय उद्यान की प्राचीर के भीतर उन चारों के अतिरिक्त अन्य कोई उपस्थित न था।
जब वे चारों अपने आसनों पर आसीन हुए, तब कुमार और ध्रुवदेव का ध्यान अचानक मध्य में रखी संगमरमर की चौकी की ओर गया। वहाँ मखमल के लाल वस्त्र पर तीन स्वर्ण मूर्तियाँ रखी थीं, जो प्रातःकालीन प्रभा में एक समान चमक रही थीं।
कुमार की जिज्ञासा बढ़ गई, उन्होंने विस्मय से पूछा— "पिताजी! ये मूर्तियाँ कैसी हैं? इनकी कलाकृति अत्यंत अद्भुत और मनमोहक है... किंतु ये तीन एक जैसी मूर्तियाँ एक साथ यहाँ रखने का प्रयोजन? क्या ये किसी विशेष धातु या कला का दुर्लभ नमूना हैं?"
महाराज ने अपनी गंभीर दृष्टि ध्रुवदेव पर टिकाई और मंद स्वर में बोले— "पुत्र! यही इन मूर्तियों का सबसे बड़ा रहस्य है। ये तीनों मूर्तियाँ न केवल रूप-रंग में एक समान हैं, बल्कि एक ही धातु-मिश्रण से ढली हैं और इनका भार भी रत्ती भर कम-ज्यादा नहीं है। फिर भी, संसार के बाज़ार में इनका मूल्य एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न है। इनमें से एक साधारण मूल्य की है, दूसरी मध्यम श्रेणी की, और तीसरी... तीसरी मूर्ति सर्वाधिक मूल्यवान है। ध्रुवदेव! अब तुम्हारी सूक्ष्म दृष्टि और मेधा की परीक्षा है। क्या तुम हमें बताओगे कि ऐसा क्यों है? किस आधार पर इनके मूल्य में इतना बड़ा अंतर है?"
कुमार समझ गए कि महाराज, ध्रुवदेव की बुद्धि और तर्कशक्ति को परख रहे हैं, अतः वे एक शांत दर्शक की भांति कौतूहलवश देखने लगे।
ध्रुवदेव के माथे पर क्षण भर के लिए विचार की लकीरें उभरीं, फिर उन्होंने पूर्ण विनम्रता से महाराज की ओर देखा और अनुमति माँगी— "जो आज्ञा महाराज! किंतु क्या इन मूर्तियों के सूक्ष्म परीक्षण हेतु मुझे इन्हें स्पर्श करने और उठाकर देखने की अनुमति है?"
महाराज के चेहरे पर संतोष का भाव उभरा, वे बोले— "अवश्य ध्रुव! तुम अपने विवेक के अनुसार इन्हें जैसे चाहो परख सकते हो।"
"अनुग्रह महाराज!" ध्रुवदेव ने कहा और अपने स्थान से उठकर चौकी के निकट आए।अब ध्रुवदेव पूरी तरह मूर्तियों के विश्लेषण में डूब गए थे। वे कभी पहली मूर्ति को हाथों में उठाकर उसका भार हथेलियों पर तौलते, तो कभी उसकी बनावट की बारीकियाँ जाँचते। उन्होंने प्रत्येक मूर्ति के अंग-प्रत्यंग का गहन अवलोकन किया। अंत में, वे उन्हें ऊँचा उठाकर सूर्य के प्रकाश में कुछ विशेष खोजने लगे। कुछ पल ठहरकर, अचानक ध्रुवदेव की आँखों में एक विलक्षण चमक कौंधी, मानो उन्होंने उस अदृश्य रहस्य की परतें खोल दी हों। उन्होंने एक विजयी मुस्कान के साथ राजा, रानी और कुमार की ओर देखा, जो बड़ी उत्सुकता से उनकी हर गतिविधि का अवलोकन कर रहे थे।
ध्रुवदेव ने महाराज के सम्मुख आकर आदरपूर्वक कहा— "महाराज! मैंने इन मूर्तियों के मूल्य का गुप्त आधार जान लिया है। अपनी बात को प्रमाण सहित सिद्ध करने के लिए मुझे एक वस्तु की आवश्यकता है। यदि आज्ञा हो तो मैं उसे ले आऊं?"
महाराज ने सहमति में सिर हिलाया— "निश्चित ही ध्रुव! तुम्हें जिसकी आवश्यकता हो, ले आओ।"
अनुमति पाते ही ध्रुवदेव बाग में कुछ ढूँढने लगे और कुछ ही क्षणों में वापस लौटे; किंतु इस बार उनके हाथों में घास के कुछ सूखे और पतले तिनके (तृण) थे।
यह देखकर रानी और कुमार के मन में आश्चर्य और बढ़ गया कि इन साधारण तिनकों का इन श्रेष्ठ स्वर्ण-मूर्तियों से क्या संबंध हो सकता है?
'क्रमशः'
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अगली कड़ी में: आखिर उन बहुमूल्य स्वर्ण-मूर्तियों और घास के इन साधारण तिनकों के बीच क्या संबंध है? क्या ध्रुवदेव अपनी तार्किक मेधा से उस गुप्त रहस्य को उजागर कर पाएंगे जो महाराज ने उनके सामने रखा है? जानने के लिए पढ़ते रहिए 'सुवर्णा' का अगला भाग!
भाग- ४ यहाँ पढ़े.
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