पिछली कड़ी में: शिव-उद्यान में ध्रुवदेव ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से तीन स्वर्ण-मूर्तियों का अद्भुत रहस्य उजागर किया, जिससे प्रसन्न होकर महारानी ने उन्हें रत्नजड़ित बाजूबंद भेंट किया। महाराज ने ध्रुवदेव को आधिकारिक रूप से राजकुमार का मुख्य सहयोगी नियुक्त कर गुप्त मिशन की रूपरेखा समझाई। अपनी जड़ों को जानने के उत्साह में दोनों मित्र राजसी पहचान त्यागकर अज्ञातवास पर जाने को तैयार हैं। ध्रुवदेव अपने माता-पिता से आशीर्वाद लेने घर गए हैं, जबकि कुमार अपनी जीवन की सबसे बड़ी यात्रा की तैयारी में जुट गए हैं।
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अगले दिन एक विशेष कक्ष में राजा-रानी, कुमार विक्रमादित्य, ध्रुवदेव, महामंत्री (ध्रुवदेव के पिता) और एक अन्य अजनबी व्यक्ति एकत्रित हुए। इसी कक्ष से एक गुप्त मार्ग महल से दूर कहीं खुलता था। महाराज के कहने पर कुमार और ध्रुवदेव ने पास के कक्ष में जाकर साधारण नागरिक जैसी वेशभूषा धारण कर ली। दोनों से उनकी कीमती रत्नजड़ित तलवारें लेकर उन्हें साधारण दिखने वाली, किंतु मज़बूत धातु की तलवारें दे दी गईं। वहाँ मौजूद अज्ञात व्यक्ति ने रूप बदलने आदि में उनकी बड़ी सहायता की, उन्होंने उनके चेहरे में विशेष परिवर्तन के लिए राजकुमार के माथे पर एक नकली चोट का निशान बना दिया और ध्रुवदेव की ठुड्डी पर एक मस्सा भी लगा दिया ताकि दोनों अलग दिखें, साथ ही उन्हें सुझाव दिया कि कुछ समय के लिए वे अपनी दाढ़ी-मूँछ बढ़ा लें ताकि न केवल अलग दिखें बल्कि उम्र से कुछ अधिक ही दिखें, दोनों ने उनका यह सुझाव सहर्ष स्वीकार कर लिया।
खैर, जब दोनों वस्त्रादि बदलकर तैयार हुए तो वे बिल्कुल आम लोगों जैसे दिख रहे थे, साधारण धोती-कुर्ता, गले में साधारण चांदी का आभूषण, कानों में चांदी के कुंडल, साधारण पगड़ी, कमर पर लपेटने को आम सा कपड़े का कमरबंद, और कंधे पर साधारण सी चादर तह करके रख ली ताकि रास्ते में ओढ़ने-बिछाने के काम आए और पैरों में आम लोगों द्वारा पहने जाने वाले जूते, कुल मिलाकर अब वे आम प्रजा के बीच घुलमिलकर रखने लायक हो गए थे। राजा ने उन्हें राहखर्च के लिए साधारण बटुए में रखकर मुद्राएँ दी और आवश्यकता पड़ने पर उनतक और मुद्राएं भिजवाने का आश्वासन भी दिया।
महाराज बोले, "कुमार! अब यहाँ से तुम दोनों गुप्त प्रवास के लिए प्रस्थान करोगे। इस बीच ये (राजा ने अज्ञात व्यक्ति की ओर इशारा किया) 'कर्णसिंह' तुम्हारी सहायता करेंगे। ये सदैव तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे, किंतु आवश्यकता पड़ने पर और मेरे पास तुम्हारे संदेश लाने-ले जाने के लिए उपस्थित रहेंगे। ये अपना कार्य कैसे करेंगे, यह इन पर ही निर्भर है। तुम लोग इन्हें पहली बार देख रहे हो क्योंकि ये सामान्य रूप से महल में नहीं आते। जब भी आते हैं, गुप्त मार्ग से ही आते हैं और इनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। इन्हें मेरे ही समान समझना। जो मैंने कहा है, उसे याद रखना। हम सबकी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ हैं।"
कुमार और ध्रुवदेव ने महाराज और रानी माँ के चरण स्पर्श किए। रानी ने दोनों को उठाकर गले लगाया, उनके सिर पर हाथ फेरकर आशीर्वाद दिया और बलाएँ लीं। विदाई के इस अवसर पर रानी भावुक होकर कुछ कह नहीं पा रही थीं। उन्होंने बस इतना ही कहा, "पुत्रों! मेरे हृदय का संपूर्ण आशीर्वाद तुम्हें मिले। अपना और एक-दूसरे का ध्यान रखना। न जाने फिर कब मैं तुम दोनों को देखकर सुख का अनुभव करूँगी।" इतना कहकर रानी रुँधे हुए गले से मौन हो गईं।
कुमार बोले, "माँ! आप चिंता मत कीजिए, हम अपने राज्य में ही तो हैं। और देखा जाए तो अपने घर में ही हैं। हम शीघ्र लौटेंगे।"
ध्रुवदेव आगे बढ़े और रानी के करीब आकर बोले, "रानी माँ! आप चिंता न करें, हम साथ ही तो हैं। आप तो बस आशीर्वाद दें..." (फिर रानी माँ के कान के पास धीरे से बोले ताकि कोई और सुन न सके) "...क्या पता हम आपके लिए बहू लेकर लौटें!"
यह सुनकर रानी हौले से हँस पड़ीं और स्नेहासिक्त झूठे क्रोध से ध्रुवदेव को देखा। ध्रुवदेव भोली सूरत बनाकर खड़े रहे। रानी ने उन्हें एक स्नेहभरी चपत लगा दी।
महाराज, कुमार और अन्य कोई भी कुछ समझ न सका। महाराज ने प्रश्नवाचक दृष्टि से रानी को देखा। रानी बोलीं, "यह हम माँ-बेटे की बात है, आप ऐसे न देखें।"
फिर किसी ने कुछ न कहा। सभी गंभीर हो गए। ध्रुवदेव ने अपने पिता से भी विदा ली। फिर महाराज ने कक्ष की एक अलमारी में हाथ डालकर कुछ क्रिया की, तो दीवार पर लगी एक तस्वीर सरक गई और मार्ग बन गया। ध्रुवदेव, विक्रमादित्य और कर्णसिंह उसी मार्ग में प्रवेश कर ओझल हो गए। महाराज ने द्वार पुनः बंद कर दिया और सभी उस कक्ष से मुख्य महल में लौट आए।
उस गुप्त मार्ग से होते हुए वे तीनों बहुत दूर, घने जंगलों के बीच एक छिपी हुई गुफा के मुहाने पर निकले। कर्णसिंह जंगल की सीमा तक उनके साथ आए। वहाँ एक स्थानीय बाज़ार में उन्होंने दोनों मित्रों को आगे के सफर के लिए कुछ ज़रूरी बातें समझाईं और अपने सेवक द्वारा मँगवाए दो स्वस्थ और बलशाली घोड़े उन्हें सौंपकर विदा ली।
ध्रुवदेव और विक्रमादित्य अब साधारण नागरिकों के भेष में थे। वे एक नगर से दूसरे नगर, एक गाँव से दूसरे गाँव भ्रमण करने लगे। इस दौरान वे आम लोगों के बीच बैठते, उनकी समस्याएँ सुनते और शासन की कमियों को गहराई से समझते। उन्होंने देखा कि जहाँ कुछ अधिकारी जनता के प्रति संवेदनशील थे, वहीं कुछ का व्यवहार बेहद क्रूर था। वे अपने इन सभी अनुभवों और गुप्त सूचनाओं को पत्रों में दर्ज करते जाते, जिन्हें कर्णसिंह समय-समय पर आकर महाराज तक पहुँचा देते।
कुमार ने पहली बार सामान्य नागरिकों के बीच रहकर उनके संघर्षपूर्ण जीवन को महसूस किया। कभी-कभी वे सीमित संसाधनों में भी लोगों के चेहरे पर संतोष देखकर अचंभित रह जाते। उन्होंने करीब से देखा कि कैसे साधारण लोग छोटी-छोटी खुशियों में भी जीवन का बड़ा आनंद ढूँढ लेते हैं।
एक दिन दोनों मित्र चर्चा करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने देखा कि लोग सज-धजकर एक विशेष दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। पूछताछ करने पर ज्ञात हुआ कि निकट ही प्राचीन शिव मंदिर में वार्षिक मेला लगा है।
कुमार की आँखों में चमक आ गई, बोले— "मित्र, तुम्हें स्मरण है? बाल्यकाल में हम गुरुजी के साथ गुरुकुल के पास वाले मेले में गए थे।"
ध्रुवदेव ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा— "भला कैसे भूल सकता हूँ! उस दिन आपने यह कहकर मेरे हिस्से की आधी जलेबियाँ चट कर दी थीं कि आप उन पर बैठी चींटियाँ हटा रहे हैं।"
कुमार ठहाका मारकर हँस पड़े— "ओहो, आप तो अभी तक रूठे हैं मित्र! चलिए, आज मैं आपको जी भरकर मेले की जलेबियाँ खिलाता हूँ। याद रखेंगे आप भी!"
ध्रुवदेव मुस्कुराए— "हाँ, याद तो मैं अभी भी कर ही रहा हूँ! (दो क्षण रुककर) खैर चलिए, जलेबियाँ तो आज मैं खाकर ही रहूँगा। आखिर हिसाब भी तो बराबर करना है! कल को आप राजा बन गए, तो मेरी जलेबियाँ तो गई पानी में। चलिए-चलिए... अब तो हवा में जलेबियों की सोंधी महक भी घुलने लगी है। वह देखिए, मेले का झूला भी दिखने लगा और लोगों का शोर भी सुनाई दे रहा है।"
कुमार जानते थे कि बात जब मीठे की हो, तो ध्रुवदेव का सब्र जवाब दे जाता है। सो, वे मुस्कुराते हुए मेले की ओर बढ़ चले।
'क्रमशः'
अगली कड़ी में: मेले की चकाचौंध और जलेबियों की मिठास के बीच, क्या विक्रमादित्य और ध्रुवदेव कैसे विशेष अनुभव हुए? आगे क्या हुआ? लोगों के बीच रहकर उन्होंने और कैसे अनुभव और अनुभूतियों का सामना किया? जानने के लिए अगला भाग पढ़ें।
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