पिछली कड़ी में: मेले की भीड़ में ध्रुवदेव ने 'भाग्य और परिश्रम' की बहस को एक अनोखे प्रयोग से सिद्ध किया, जहाँ एक कीमती अँगूठी धूल में पड़ी रही पर किसी की नज़र उस पर नहीं पड़ी। इस दार्शनिक अनुभव के बाद दोनों मित्र अपनी यात्रा को आगे बढ़ाते हुए रेशमी वस्त्रों के विख्यात नगर 'मनवापुर' पहुँचे हैं। यहाँ उनकी मुलाकात एक ऐसे अहंकारी विद्वान से होने वाली है, जिसे हराना केवल किताबी ज्ञान के बस की बात नहीं है। अब आगे...
<★★★★★★★★★★★★★★>
साधारण नागरिकों का वेश और 'जीवनदास सिंह' व 'मुँहबोला सिंह' जैसे छद्म नाम धारण किए इधर-उधर घूमते हुए, कुमार और ध्रुवदेव सौवीरनगर राज्य के वैभवशाली नगर 'मनवापुर' पहुँचे। यह नगर अपने रेशमी वस्त्रों के व्यापार के लिए विख्यात था। नगर के बाज़ारों में घूमते हुए दोनों मित्रों ने कारीगरों की कड़ी मेहनत और उनकी कलात्मक लगन को बहुत निकट से देखा। उन्होंने बुनकरों की समस्याओं की एक विस्तृत सूची भी तैयार की, ताकि भविष्य में इसे महाराज तक पहुँचाया जा सके।
रात्रि के समय वे एक ऐसे विश्रामालय में रुके जहाँ भोजन और विश्राम की उत्तम व्यवस्था थी। जब वे भोजन के लिए बैठे, तो कुमार अनजाने में ही अपनी थाली का निरीक्षण बड़े सूक्ष्म ढंग से करने लगे—ठीक वैसे ही जैसे राजमहल में मुख्य रसोइया के काम की जाँच कर रहे हों।
ध्रुवदेव ने तुरंत स्थिति भाँपी और धीरे से मेज़ के नीचे से कुमार के पैर पर हल्की ठोकर मारकर फुसफुसाते हुए कहा, "भैया जीवनदास! यहाँ सोने की थाली नहीं मिलेगी और न ही मेवा-मिश्री की जाँच करने वाला कोई सिपाही खड़ा होगा। चुपचाप इस साधारण दाल-भात का आनंद लीजिए, वरना लोग हमें परदेसी नहीं, बल्कि किसी दूसरे ही लोक के जीव समझ लेंगे!"
कुमार ने अपनी गलती समझकर मुस्कुराते हुए भोजन शुरू ही किया था कि तभी पास की मेज़ से कुछ दिलचस्प आवाज़ें उनके कानों में पड़ीं। एक व्यक्ति कह रहा था, "अरे! हम तो पहले ही कह रहे थे सरमन जी कि उनसे न उलझो! अब तक जिसने भी उनसे शर्त लगाई, उसे मुँह की खानी पड़ी। अब भुगतो, लग गई न सौ स्वर्ण मुद्राओं की चपत!"
दूसरा व्यक्ति ठहाका मारकर बोला, "का हो सरमन जी! आपहूँ लुटि गए का?" यह सुनकर आसपास बैठे लोग भी मुस्कुराने लगे।
इस बातचीत ने कुमार और ध्रुवदेव की उत्सुकता बढ़ा दी। कुमार ने अर्थपूर्ण दृष्टि से ध्रुवदेव की ओर देखा। ऐसे मौकों पर अक्सर बातचीत की कमान ध्रुवदेव ही सँभालते थे, ताकि कुमार का विशिष्ट राजसी लहजा उन्हें मुसीबत में न डाल दे। ध्रुवदेव अपनी त्वरित बुद्धि और अभिनय कला से आम लोगों में घुल-मिल जाने में माहिर थे। उन्होंने पहले ही कुमार को आगाह कर रखा था—"आप ठहरे सरल स्वभाव के व्यक्ति; कहीं अपनी असलियत प्रकट कर बैठे तो नाहक हमें असमय ही डेरा कूच करना पड़ जाएगा। इसलिए महाशय, बातचीत का 'ठेका' हमें ही सँभालने दें।" मित्र की इस चुटकी पर कुमार ने भी हँसकर अपनी मौन स्वीकृति दे दी थी।
ध्रुवदेव पास बैठे व्यक्ति की ओर थोड़ा खिसके और बोले, "नमस्कार भइया! हमारा नाम 'मुँहबोला' है और ये हमारे बड़े भाई 'जीवनदास' हैं। मनवापुर आए हमको दो-तीन दिन बीत गया हैं।"
दीनबंधु नामक उस व्यक्ति ने जवाब दिया, "नमस्कार, नमस्कार भइया! तो इहाँ कउनो विशेष काम से आए हो का?"
मुँहबोला (ध्रुवदेव) ने हाथ नचाते हुए बड़ी सहजता से उत्तर दिया, "हाँ भइया! रिश्तेदारी में बहन का बियाह तय हुआ है, तो उसे उपहार देने के लिए साड़ी खरीदने आए थे। सच कहें, तो यहाँ की साड़ियाँ देख के कलेजा ठंडा हो जाए! साफ़-सुथरी बुनाई, जैसे साड़ी न हो, गंगा जी की लहर हो। पर सुना है यहाँ के बुनकर कुछ परेशान हाल हैं, क्या ये सच है?"
दीनबंधु ने एक लंबी सांस लेकर कहा, "सच ही सुना है भइया, कारीगरी तो ऊँची है पर पेट की आग नीची ही रह जाती है। बिचौलिए सारा मलाई मार ले जाते हैं और बुनकर के हाथ बस धागा ही बचता है। खैर, खरीदारी के अलावा घूमे-फिरे की नहीं? हमारे नगर का दुर्गाबाड़ी मंदिर जरूर जाइगा, मातारानी का दर्शन भी हो जाएगा और साथ ही वहाँ हमारे महाराज सुकर्मादित्य का बनवाया भव्य मंदिर और आनंदबाग भी है। क्या ही आनंद की जगह है! नगरसेठ धरमपाल जी ने महाराज के साथ मिलकर मंदिर, सरोवर, धर्मशाला—सब बनवाए हैं। वहाँ आपको ब्याह में देने के लिए चंदनगढ़ से आई चंदन की वह कारीगरी देखने मिलेगी कि जी खुश हो जाएगा। मनवापुर आने वाले वहाँ जरूर जाते हैं।"
कुमार और ध्रुवदेव उस बाग-मंदिर से होकर ही आए थे, सो मुँहबोला बने ध्रुवदेव बोले— "हाँ भइया, हम वहाँ दर्शन कर आए, सच में आनंद की जगह है। खरीदारी भी बहुत बढ़िया हो गई, माल तो सेवकों के हाथ घर भिजवा दिया है। बस हम दोनों भाई थोड़ा और नगर घूमने के लिए रुक गए थे। पर भइया, यह कैसा हार-जीत का चक्कर चल रहा है? कौन है वह जो सबको हरा रहा है?"
दीनबंधु आवाज़ धीमी करते हुए बोले, "अरे भइया! पूछिए मत। नगर में न जाने कहाँ से एक विद्वान आए हैं, नाम है 'शीतलाप्रसाद'। भाई! गजब की भाषा बोलते हैं। संस्कृत, अवधी, मगधी—सब पर उनकी ऐसी पकड़ है कि शब्द धाराप्रवाह बहते हैं! कलाई में सोने का एक भारी कड़ा पहनते हैं और सबकी आँखों के सामने चुनौती देते हैं कि—'हमारी मातृभाषा पता लगा लो तो यह कड़ा तुम्हारा, नहीं तो सौ स्वर्ण मुद्राएँ देनी पड़ेंगी।'"
दीनबंधु ने आगे जोड़ते हुए कहा, "वो विद्वान क्या है भइया, साक्षात चलता-फिरता शब्दकोश है! पर दिल का बड़ा कड़ा और घमंडी है। जब कोई हारता है, तो वे उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं—'किताबें चाटने से ज्ञान नहीं आता, ज्ञान तो रगों में दौड़ना चाहिए।' अपने ये सरमन भइया भी आज जोश-जोश में हार आए। उन्हें तो सबके सामने कह दिया कि जाओ पहले ककहरा सीख के आओ, फिर हमसे टकराना।"
यह सुनकर ध्रुवदेव की आँखों में एक विशेष चमक आ गई। कुमार समझ गए कि मित्र की तीक्ष्ण बुद्धि में 'गुदगुदी' शुरू हो गई है। अहंकारी शीतलाप्रसाद की अगली चुनौती अब ध्रुवदेव की प्रतीक्षा कर रही थी।
<★★★★★★★★★★★★★★>
अगले भाग में: क्या किताबी ज्ञान कभी अनुभव की रगों में दौड़ते हुए 'सत्य' को हरा सकता है? मनवापुर के बाज़ारों में रेशम की चमक के पीछे छिपी है एक ऐसी चुनौती, जहाँ भाषा की पकड़ ही जीत का कड़ा दिलाएगी या फिर सौ स्वर्ण मुद्राओं की हार! चलिए देखते हैं, ध्रुवदेव की 'गुदगुदी' करने वाली बुद्धि इस अहंकारी विद्वान का घमंड कैसे तोड़ती है...।
अगला भाग यहाँ पढ़ें:
https://meetu2nishabd.blogspot.com/2026/03/blog-post_11.html
No comments:
Post a Comment