Friday, April 10, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- ८

मनवापुर की रोचक चुनौती

पिछली कड़ी में: कुमार विक्रमादित्य और ध्रुवदेव अपनी यात्रा के दौरान रेशमी वस्त्रों के विख्यात नगर 'मनवापुर' पहुँचे हैं। वहाँ उन्हें 'शीतलाप्रसाद' नामक एक अत्यंत विद्वान किंतु अहंकारी व्यक्ति के बारे में पता चलता है, जो अपनी मातृभाषा पहचानने की चुनौती देकर लोगों को आर्थिक और मानसिक रूप से पराजित कर रहा है। ध्रुवदेव, जो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और हाजिरजवाबी के लिए जाने जाते हैं, इस चुनौती को स्वीकार करने का मन बना चुके हैं। अब देखना यह है कि क्या ध्रुवदेव शब्दों के इस जाल को काटकर उस अहंकारी विद्वान का घमंड तोड़ पाएंगे?
(अगर आपने पिछला भाग नहीं पढ़ा तो भाग- ७ यहाँ पढ़े)
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कुमार (जीवनदास) बीच में बोल पड़े, "वे महाशय कैसे भी विद्वान क्यों न हों, हमारा दावा है कि यदि वे हमारे भाई 'मुँहबोला' से शर्त लगा लें, तो उन्हें मुँह की खानी पड़ेगी।"

​दीनबंधु चौंककर बोले, "अरे ऐसा न कहिए भइया! आपने अभी उन्हें देखा नहीं है, इसलिए ऐसा कह रहे हैं।"

​कुमार आत्मविश्वास से मुस्कुराए, "क्षमा करें बंधु! शायद आप 'मुँहबोला' की प्रतिभा से परिचित नहीं हैं। यह जन्म के बाद आठ वर्षों तक एक शब्द नहीं बोला, और जब पहली बार मुँह खोला, तो सीधे शुद्ध संस्कृत श्लोक का उच्चारण किया! तभी तो इसका नाम मुँहबोला पड़ा। जो समस्या कोई न सुलझा पाए, यह उसे चुटकियों में हल कर देता है।"
​धीरे-धीरे आसपास भीड़ जुटने लगी और लोगों का उत्साह बढ़ने लगा। सरमन जी, जो अपनी हार से दुखी थे, जोश में आकर बोले, "जीवनदास भाई! अगर आपका भाई उस घमंडी को हरा दे, तो पचास मुद्राएँ हम अपनी तरफ से इनाम देंगे। बस, उस आदमी का अहंकार टूटना चाहिए।"

​मुँहबोला (ध्रुवदेव) ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर कहा, "भाइयों! हमें धन का कोई लोभ नहीं है, पर किसी का अहंकार तोड़ने में आनंद ज़रूर आएगा। आप बस हमारी उनसे भेंट करवा दीजिए।"

​भीड़ में से वही व्यक्ति, जो पहले सरमन जी को चिढ़ा रहा था, उत्साहित होकर बोला, "यह कौन सी बड़ी बात है? शीतलाप्रसाद जी अपनी जीत के नशे में आजकल इतने चूर हैं कि चुनौती की एक आवाज़ पर ही खिंचे चले आएँगे।" फिर उसने पास खड़े एक व्यक्ति से कहा, "सखाराव जी, आप तो शीतलाप्रसाद जी के करीब हैं, आप ही यह काम कीजिए। जाकर कहिए कि सराय में आए एक राहगीर उनसे शास्त्रार्थ करने को उत्सुक हैं और उनकी विद्वत्ता की परीक्षा लेना चाहते हैं। इतना सुनना भर होगा, वे स्वयं ही दौड़े चले आएँगे।"

सखाराव मुस्कुराते हुए तुरंत निकल पड़े और न जाने शीतलाप्रसाद को क्या पट्टी पढ़ाई कि थोड़ी ही देर में वे साक्षात् उपस्थित हो गए। पहले औपचारिक परिचय और कुशलक्षेम हुआ, फिर शीतलाप्रसाद और 'मुँहबोला' के बीच विभिन्न भाषाओं में संवाद शुरू हुआ। कुछ ही देर में कुमार (जो स्वयं गुरुकुल में अनेक भाषाएँ सीख चुके थे) और ध्रुवदेव ताड़ गए कि शीतलाप्रसाद केवल किताबी कीड़ा नहीं, बल्कि वास्तव में महापंडित हैं, पर उनका अहंकार उनकी विद्वत्ता से भी बड़ा था।
शीतलाप्रसाद रह-रहकर उनका उपहास उड़ा रहे थे, दर्शक भी एक पल के लिए घबराने लगे कि कहीं इस बार 'मुँहबोला' का दांव उलटा न पड़ जाए। तभी मुँहबोला ने एक लंबी जंभाई ली और शरीर को ऐसे ऐंठा, मानो बैठे-बैठे थक गए हों।

​वे बोले, "भाई मान गए शीतलाप्रसाद जी! आपकी विद्वत्ता अद्भुत है, अब आपकी शर्त स्वीकार कर ही ली है तो आपकी मातृभाषा का रहस्य तो मैं सुलझा ही लूँगा, बस इस समय भोजन के पश्चात मेरा शरीर कुछ अकड़ गया है। यदि आपको आपत्ति न हो, तो चलिए भोजनालय के बाहर तनिक चार कदम टहल लेते हैं; ताजी हवा से मेरी बुद्धि भी प्रखर हो जाएगी।"

​शीतलाप्रसाद ने व्यंग्य किया, "क्यों नहीं बंधुवर! हमें तो चुनौतियाँ प्रिय हैं। वैसे हमारी बुद्धि तो शास्त्रों के अध्ययन से प्रखर होती है, आपकी शायद हवा खाने से होती होगी। हम तो स्वयं उस घड़ी की प्रतीक्षा में हैं, जब हमारे हाथों का यह बोझ (स्वर्ण कड़ा दिखाते हुए) उतर जाए। आइए, चलते हैं।"

​मुँहबोला मुस्कुराए, "अवश्य, चलिए!"

​कुमार और बाकी लोग भी उत्सुकता में उनके पीछे हो लिए। मुँहबोला सबसे आगे चल रहे थे। सराय की देहरी लाँघते समय वे अचानक इस तरह फिसले कि शीतलाप्रसाद को साथ लपेटते हुए सीधे एक सेवक पर जा गिरे। 
सेवक के हाथ में मसालों वाली रसेदार सब्जी का बड़ा पात्र था, जो अब पूरी तरह शीतलाप्रसाद के धवल वस्त्रों पर बिखर चुका था। मुँहबोला और सेवक तो हक्के-बक्के खड़े थे, पर शीतलाप्रसाद का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वे आपे से बाहर होकर ठेठ अवधी गालियों का 'प्रसाद' दनादन उस सेवक पर बरसाने लगे— "रउवा बिल्कुल आँधर हउवें का? चले क सहूर ना हवे अ चलल हउवें शरत जीतै। दहिजरू, हमार उजर कुर्ता पीयर पच्च कइ डारे। तुहार मउत होई जाए!"

​'मौत' शब्द सुनकर कुमार की आँखें क्रोध से लाल हो गईं, पर इससे पहले कि वे कुछ कहते, ध्रुवदेव का ठहाका गूँज उठा। शीतलाप्रसाद की गालियाँ और उनका बिगड़ा हुआ हुलिया देखकर पूरी भीड़ हँसी के फुहारों में भीग गई। 

शीतलाप्रसाद जब तमतमाते हुए जाने लगे, तब मुँहबोला ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोले, "ठहरिए महाराज! यह बोझ लेकर कहाँ जा रहे हैं? अब इसे हमें सौंप दीजिए। आपकी मातृभाषा 'अवधी' है, जिसमें अभी आप धाराप्रवाह संवाद कर रहे थे। शांति के समय व्यक्ति कोई भी भाषा ओढ़ सकता है, पर संकट या क्रोध के समय वही भाषा फूटती है जो उसने अपनी माँ की गोद में सीखी होती है। अब अपनी विद्वत्ता की सौगंध खाकर कहिए, क्या मैं गलत हूँ?"

​शीतलाप्रसाद निरुत्तर रह गए। बात सोलह आने सच थी। उन्होंने कुछ पल सिर झुकाया, फिर मुस्कुराते हुए बोले, "झूठी कसम नहीं खाऊँगा। आप जीत गए मुँहबोला जी! आज आपने सिद्ध कर दिया कि मुँह की भाषा सीखी जा सकती है, पर मन की नहीं। शब्द मस्तिष्क से निकलते हैं, पर सत्य भावनाओं से।"
​इतना सुनते ही लोग खुशी से झूम उठे और मुँहबोला को कंधों पर उठा लिया। कुमार दूर खड़े मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। देखते ही देखते कड़े ध्रुवदेव की कलाई में थे। अगली सुबह होने तक नगर में इसी चमत्कार की चर्चा रही, पर सूरज उगते ही दोनों मित्र अपनी अगली मंज़िल की ओर कूच कर चुके थे।

'क्रमशः'
    
    अगले भाग में: कैसी लगी हमारे नायकों की चतुराई और बुद्धमत्ता? कमेंट में अवश्य बताएं। 
    अब आगे हमारे नायक और कौन से अनुभव प्राप्त करेंगे या क्या उनकी यात्रा किसी नवीन मोड़ से मुड़ेगी? कौन है हमारी कहानी की नायिका 'राजकुमारी सुवर्णा' और कहां है वह? क्या हमारे नायकों की यह रोमांचक यात्रा अब एक नए और कोमल मोड़ की ओर मुड़ने वाली है? जानने के लिए अगला भाग अवश्य पढ़ें।

अगला भाग-९ यहाँ पढ़ें.

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