Monday, April 13, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- ९

कुमार की जिज्ञासा


पिछले भाग में: अब तक आपने कुमार और ध्रुवदेव की अज्ञातवास की यात्रा के पड़ावों को पढ़ा, आपने पढ़ा कि किस तरह एक तरफ ध्रुवदेव की चतुराई ने शीतलाप्रसाद का अहंकार तोड़ा तो दूसरी तरफ कुमार भी अपने राजसुख को भूलकर आमजीवन की छोटी-छोटी खुशियों एवं अनुभवों को संजो रहे हैं।

   अब आगे: दोस्तों! अब समय आ गया है कि कहानी में हमारी नायिका 'स्वर्णप्रभा' का प्रवेश हो। यदि आप सोच रहे हैं कि यह स्वर्णप्रभा कौन है, तो जान लीजिए कि जो नगर के गलियारों में अपनी स्वर्ण सी आभा के लिए 'राजकुमारी स्वर्णप्रभा' के नाम से विख्यात थी, वही राजमहल की प्राचीरों के भीतर अपने माता-पिता के हृदय की धड़कन 'सुवर्णा' थी। तो आइए, सुवर्णा के उस रहस्यमयी संसार की ओर बढ़ते हैं...
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    कुमार एवं ध्रुवदेव को महल छोड़े कई महीने बीत चुके थे। महाराज की ओर से आए अंतिम पत्र में उन्हें शीघ्र लौटने का आदेश दिया गया था, किंतु नियति को कुछ और ही स्वीकार था।

​एक दिन दोनों मित्र राहगीरों के वेश में एक शांत गाँव से गुजर रहे थे। घोड़ों की रास थामे वे पैदल चलते हुए ग्रामीण सौंदर्य को निहार रहे थे। तभी अचानक एक छोटी बालिका सब्जियों की टोकरी लिए तेज़ी से भागती हुई आई और घर के बाहर रखे सामान से टकराकर गिर पड़ी। एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ मिट्टी के मटके फूट गए और टोकरी से सब्जियाँ चारों ओर बिखर गईं।

​शोर सुनकर बालिका की माँ भीतर से झल्लाती हुई निकली, "अरे करमजली! क्या कभी ढंग से नहीं चल सकती? जब देखो गिरती-पड़ती रहती है। राजकुमारी स्वर्णप्रभा की तरह आँखों पर पट्टी बाँध रखी है क्या, जो तुझे कुछ सुझाई नहीं देता?"

​वह स्त्री क्रोध में बुदबुदाती रही, किंतु कुमार विक्रमादित्य के कान तो 'राजकुमारी स्वर्णप्रभा' और 'आँखों की पट्टी' जैसे शब्दों पर अटक गए थे। वे जड़वत खड़े उस हड़बड़ाई हुई बालिका को अपना सामान समेटते देखते रहे।

​जब ध्रुवदेव ने कुमार को इस तरह खोया हुआ पाया, तो उनके कंधे हिलाकर उनका ध्यान खींचा। कुमार ने 'कुछ नहीं' का संकेत किया और उस स्त्री की ओर बढ़ गए। ध्रुवदेव भी असमंजस में उनके पीछे हो लिए।

​स्त्री के निकट पहुँचकर कुमार ने हाथ जोड़कर कहा, "नमस्कार बहन! हम राहगीर हैं और वर्ण से क्षत्रिय। मेरा नाम जीवनदास सिंह और ये हमारे बंधू मुँहबोला सिंह हैं। बहन हम प्यासे हैं, क्या हमें तनिक जल मिल सकता है? आपकी बड़ी कृपा होगी।"

​स्त्री ने पलटकर देखा तो सामने दो तेजस्वी युवक खड़े थे, जिनका व्यक्तित्व किसी संभ्रांत परिवार का आभास दे रहा था। वह तत्काल स्वर बदलकर बोली, "क्यों नहीं भैया! आइए, इस चौकी पर विराजिये, मैं अभी जल लाती हूँ।" फिर वह अपनी बेटी को हिदायत देते हुए बोली, "यह सब रसोई में रख आ... और सँभाल कर जाना, कहीं फिर मत गिर पड़ना!"

​थोड़ी देर में वह स्त्री लौटी, तो उसके हाथ में जल से भरा पात्र था और बालिका के हाथ में मिट्टी के सकोरे में गुड़। उसने गुड़ कुमार की ओर बढ़ाते हुए कहा, "भैया! पहले थोड़ा गुड़ ग्रहण करें, फिर जल पीजिएगा। गला सूख रहा होगा। यदि भूख लगी हो तो मैं कुछ बना लाऊँ? या यदि आप स्वयं बनाना चाहें, तो मैं 'सीधा' (कच्चा राशन) निकाल देती हूँ। मेरे पति अभी खेत पर गए हैं, बस आते ही होंगे। आप उनके साथ ही भोजन कर लीजिएगा। आप किसी भले घर के प्रतीत होते हैं... कहाँ से आ रहे हैं?"

​कुमार ने गुड़ ग्रहण कर जल पिया। इस बीच ध्रुवदेव ने उत्तर दिया, "बहन! हम कंचनपुर से आ रहे हैं। गोपनगर में हमारा कुछ आवश्यक कार्य था।"
​स्त्री चहककर बोली, "अच्छा-अच्छा! वह तो यहाँ से अधिक दूर नहीं है।"

कुमार और ध्रुवदेव, दोनों ने जलपान किया। फिर कुमार झिझकते हुए बोले, "बहन! यदि आप अन्यथा न लें, तो एक बात पूछूँ?"
​स्त्री ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "भला भाई की बात का क्या बुरा मानना! निसंकोच पूछो, क्या पूछना है? तुम तो बहुत सुलझे हुए व्यक्ति लगते हो।"

​जब कुमार थोड़ा सकुचाए, तो स्त्री हँस पड़ी, "मुझसे संकोच हो रहा है? तो वह देखिए, मेरे पति आ गए हैं। जो पूछना है, उन्हीं से पूछ लीजिए। उनसे तो लज्जा नहीं आएगी न?" यह कहकर वह हँसती हुई अपने पति की ओर बढ़ गई। उनके हाथ से सामान लेते हुए वह कुमार और ध्रुवदेव का परिचय देने लगी, "ये दोनों राहगीर हैं, क्षत्रिय हैं। कंचनपुर से आए हैं और गोपनगर जाना है। प्यासे थे तो मैंने जल पिलाया। कुछ पूछना चाहते हैं, पर संकोच कर रहे हैं। आप ही पूछ लीजिएगा। मुझे बहन तो मान लिया, पर भोजन के लिए मना कर रहे हैं। लंबी यात्रा से आए हैं, भूखे अवश्य होंगे... आप ही आग्रह कीजिए इनसे।"

​मानसिंह मुस्कुराते हुए कुमार और ध्रुवदेव की ओर बढ़ा और बोला, "अच्छा-अच्छा, मैं सब बता दूँगा! तू अब जल्दी भोजन की व्यवस्था कर, मुझे भी भूख लगी है। इनके लिए भी परोस दे, हम साथ ही भोजन करेंगे।" फिर उनकी ओर मुड़कर हाथ जोड़ते हुए कहा, "नमस्कार! मैं मानसिंह हूँ, जाति से मैं भी क्षत्रिय हूँ। इसकी बातों का बुरा न मानिएगा, यह पगली एक बार बोलना शुरू करती है तो रुकती ही नहीं। आप भोजन करके ही जाइएगा, कृपया विराजिये।"

​कुमार और ध्रुवदेव बैठ गए। मानसिंह पुनः बोला, "आपको कुछ पूछना था? यदि बात लंबी हो, तो क्या मैं तनिक स्नान कर लूँ? फिर विस्तार से चर्चा करेंगे।" कुमार ने सहमति में सिर हिलाया। वे समझ गए थे कि इस स्नेही दंपत्ति का प्रेमपूर्वक किया गया आग्रह टालना अब संभव नहीं है।

​मानसिंह शीघ्र ही स्नान करके लौटा और उनके निकट बैठकर बोला, "अब कहिए, क्या जिज्ञासा थी आपके मन में?"

​इतनी देर में ध्रुवदेव कुमार के मन की दुविधा भाँप चुके थे। अतः वे ही बोले, "भाई मानसिंह! अन्यथा न लीजिएगा, किंतु हमने बहन के मुख से राजकुमारी स्वर्णप्रभा और उनकी आँखों पर बँधी पट्टी की बात सुनी, तो मन में उत्सुकता जाग उठी। आखिर यह माजरा क्या है? बस यही जानना चाह रहे थे।"

​मानसिंह गंभीर होकर बोला, "अच्छा-अच्छा, यह बात है! प्रतीत होता है आप लोगों ने अब तक चंदनगढ़ की राजकुमारी के बारे में नहीं सुना। खैर, अब तो धीरे-धीरे यह चर्चा चारों ओर फैलने लगी है। यहाँ के लोग भी अब जान गए हैं कि चंदनगढ़ की राजकुमारी स्वर्णप्रभा ने अचानक अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है।"

​ध्रुवदेव कुछ और पूछने को आतुर हुए ही थे कि मानसिंह की पुत्री दौड़ती हुई आई और बोली, "बापू! माँ भोजन के लिए बुला रही हैं। उन्होंने कहा है कि शीघ्र आइए, अन्यथा भोजन ठंडा हो जाएगा।"

​मानसिंह ने कहा, "आइए भाइयों! पहले भोजन कर लें, बाकी बातें वहीं विस्तार से करेंगे।"
'क्रमशः'
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    ​अगली कड़ी में: आखिर एक राजकुमारी को अपनी आँखों पर पट्टी बाँधने की क्या आवश्यकता पड़ी? क्या यह कोई कठिन प्रतिज्ञा है या चंदनगढ़ की राजकुमारी के जीवन का कोई गहरा रहस्य? क्या मानसिंह की जानकारी इस गुत्थी को सुलझा पाएगी, या कुमार और ध्रुवदेव को इस सत्य की खोज में और भी कठिन रास्तों से गुज़रना होगा? इस अनसुलझे रहस्य का अगला पड़ाव जानने के लिए पढ़िए 'सुवर्णा' का अगला रोमांचक भाग!

अगला भाग यहाँ पढ़ें: 

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