पिछले भाग में आपने पढ़ा: राजकुमार विक्रमादित्य और ध्रुवदेव सौवीरनगर की राजधानी सूर्यपुर का महल छोड़कर अज्ञातवास में अपने ही राज्य में नगरों, गाँवों, गलियों से परिचय बढ़ाते घूम रहे थे कि उन्हें एक भव्य वार्षिक मेले का समाचार मिलता है। बचपन की यादों और जलेबियों की मिठास के आकर्षण में, दोनों मित्र उत्साह के साथ मेले की भीड़ में शामिल होने निकल पड़े हैं। अब आगे...
<◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆>
मेले में अच्छी-खासी भीड़ थी। कर्णसिंह की चतुराई का ही परिणाम था कि कुमार के चेहरे पर बना बनावटी चोट का निशान और ध्रुवदेव के चेहरे पर लगा नकली मस्सा ने उनके रूप को पूरी तरह बदल दिया था। कर्णसिंह ने न केवल उनका भेष बदला, बल्कि समय-समय पर उसे सुधारने की बारीकियां भी सिखा दी थीं। साथ ही, उनके सुझाव पर दोनों ने अपनी दाढ़ी भी बढ़ा ली थी, जिससे वे अपनी वास्तविक आयु से कुछ अधिक उम्र के प्रतीत हो रहे थे।
चलते-चलते उनकी नज़र अपने आगे चल रहे एक निर्धन परिवार पर पड़ी, जो बड़े उत्साह से मेला देखने जा रहा था। उनके पहनावे और व्यवहार से स्पष्ट था कि वे पति-पत्नी और उनका छोटा बच्चा हैं। बच्चे की तुतली और मीठी बातों का आनंद लेते हुए दोनों मित्र भी उनके पीछे-पीछे चलने लगे।
उन्होंने मेले में पहुँच कर शिव मंदिर में दर्शन पूजन किया और फिर मेले की चहल-पहल और लोगों को खरीदारी करते देखने लगे। कुमार ने गौर किया कि लोगों के भीतर का उत्साह केवल सुविधाओं से नहीं, बल्कि उनके आपसी प्रेम से उपज रहा था। जब उन्होंने लोगों को अपनी मेहनत की कमाई से छोटी-छोटी चीज़ें खरीदते और महंगी वस्तुओं के लिए भविष्य की योजनाएँ बनाते देखा, तो उन्हें एक बड़ा बोध हुआ। कुमार ने समझा कि उपहार में मिली खैरात के बजाय अपनी मेहनत से अर्जित सुख-सुविधाएँ लोगों को अधिक संतोष और गौरव प्रदान करती हैं। शासन की असली सफलता राज्य में बस एक सुरक्षित वातावरण और समान अवसर उपलब्ध कराने में है, ताकि प्रजा स्वयं अपना भाग्य लिख सके।
खैर, दोनों मित्रों ने एक हलवाई की दुकान पर डेरा डाला और डटकर जलेबियों का आनंद लिया। ध्रुवदेव तो कुमार से दुगनी जलेबियाँ चट कर गए! अंत में एक तृप्त डकार लेते हुए वे मुस्कुराकर बोले— “हुँह! अब जाकर आप मुझसे ऋणमुक्त हुए हैं... हालाँकि यह तो बस पुराना ब्याज था, मूल हिसाब की जलेबियाँ तो अभी मैंने छुई तक नहीं हैं।”
कुमार ठहाका मारते हुए बोले— “वह तो मैं खिलाऊँगा भी नहीं! मुझे तो आपका 'रूठी रानी' जैसा फूला हुआ मुँह देखकर ही बड़ा आनंद आता है।”
ध्रुवदेव ने उन्हें बनावटी गुस्से से घूरा, तो कुमार फिर हँस दिए। इसी तरह थोड़ी देर और मेले में मटरगश्ती करने के बाद दोनों मित्र अपनी मंज़िल की ओर लौट पड़े।
वापस लौटते समय कुमार आते-जाते लोगों के चहकते चेहरे देखकर बोले— “मित्र, आज मुझे इन साधारण लोगों से ईर्ष्या हो रही है। देखो तो, ये जीवन की बुनियादी सुविधाओं के बीच कितने निश्चिंत और प्रसन्न हैं! आज मैंने इनके परिश्रम को देखा और जाना कि वास्तव में श्रम ही प्रसन्नता की जननी है।” यह कहते हुए कुमार की आवाज़ में एक हल्की उदासी तैर गई।
ध्रुवदेव ने तर्क दिया— “श्रम तो है ही, किंतु भाग्य की भूमिका भी कम नहीं। आपने देखा नहीं, जब दो लोग एक ही वस्त्र खरीदने पहुँचे और दोनों के पास परिश्रम की कमाई थी, तब भाग्य ने जिसे पहले दुकान पर पहुँचाया, वस्त्र उसे ही मिला। आखिर भाग्य ही तो है जिसने आपको राजमहल और मुझे मंत्री के घर जन्म दिया; यह हमारे पूर्वजन्मों के संचित कर्मों का फल ही तो है।”
कुमार ने बीच में टोकते हुए कहा— “तुम्हारी बात में किंचित सत्य हो सकता है, किंतु भाग्य का निर्माण भी तो श्रम से ही होता है।”
ध्रुवदेव मुस्कुराए— “अवश्य, किंतु जब भाग्य प्रबल हो तो वह श्रम की दिशा ही बदल देता है। जैसा कि हमने अभी देखा, दोनों मित्र वस्त्र की ओर बढ़े थे, पर एक के भाग्य ने उसे पहले सब्जी खरीदने के लिए प्रेरित कर दिया और जब तक वह दुकान पहुँचा, वह वस्त्र किसी और का हो चुका था।”
कुमार की जिज्ञासा बढ़ गई, वे बोले— “सिद्ध कर सको तो मानूँ!”
ध्रुवदेव ने चुनौती स्वीकार की— “अवश्य सिद्ध कर दूँगा! आप तनिक अपनी यह रत्नजटित स्वर्ण मुद्रा (अँगूठी) मुझे दीजिए।”
कुमार ने अपनी उंगली से सोने की वह साधारण सी अँगूठी उतारकर ध्रुवदेव को थमा दी, जिसमें एक छोटा सा नगीना जड़ा था। वे दोनों मार्ग के किनारे एक विशाल वृक्ष की ओट में खड़े थे। ध्रुवदेव ने उचककर देखा, वही निर्धन परिवार मेले से लौटता हुआ दिखाई दिया, जिसके पीछे-पीछे चलकर वे मेले तक पहुँचे थे।
ध्रुवदेव फुर्ती से रास्ते के बीचों-बीच गए, अँगूठी ज़मीन पर गिराई और वापस आकर कुमार के पास छिपकर खड़े हो गए। कुमार बड़े कौतूहल से यह सब देख रहे थे। वह परिवार अब बिल्कुल निकट आ चुका था। बच्चा रोते हुए झूला झूलने की ज़िद कर रहा था और उसकी माँ उसे पुचकारते हुए समझा रही थी— “अभी तो इतना झूले हो लल्ला, अब मुरैना गाँव के मेले में फिर झुला देंगे।” पर बच्चा शांत न हुआ।
तब उसके पिता ने युक्ति निकाली— “अच्छा ठीक है, हम 'अँखमुनवा' (आँखमिचौली) खेलेंगे। अगर हमने आँखें बंद करके मुन्ना को पकड़ लिया, तो झोले की सारी रेवड़ियाँ हम खाएँगे, और अगर हार गए तो सब मुन्ना की!”
बस, माता-पिता दोनों आँखें मूँदकर हाथ फैलाए बच्चे को पकड़ने दौड़े। बच्चा अपनी ज़िद भूलकर खिलखिलाता हुआ उनसे बचने लगा। यह सारा खेल ठीक उसी जगह हो रहा था जहाँ वह कीमती अँगूठी पड़ी थी। कुमार और ध्रुवदेव ने विस्मय से देखा कि वह पूरा परिवार और उनके बाद गुजरने वाले कई अन्य राहगीर उस अँगूठी के ऊपर से धूल उड़ाते निकल गए, पर किसी की दृष्टि उस चमकते रत्न पर नहीं पड़ी।
ध्रुवदेव ने विजयी मुस्कान के साथ कुमार की ओर देखा, जाकर धूल से अँगूठी उठाई और उसे साफ़ कर कुमार के हाथ में रख दी। उनकी बात सिद्ध हो चुकी थी।
कुमार ने अचंभित होकर पूछा— “तुम्हें यह कैसे ज्ञात था कि कोई इसे नहीं उठाएगा?”
ध्रुवदेव ने बड़े मज़े से जवाब दिया— “मुझे ज्ञात नहीं था मित्र, मैं तो बस जुआ खेल रहा था!”
अब कुमार के पास घूरने के सिवा कोई चारा न था, और ध्रुवदेव की हँसी थमने का नाम नहीं ले रही थी।
'क्रमशः'
<◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆>
अगले भाग में: कुमार और ध्रुवदेव का अज्ञातवास तो रोमांच और मनोरंजन के साथ कहानी में नवीन अनुभवों को भी जोड़ता जा रहा है। आगे हमारे नायक अपनी इस रोमांचक यात्रा में कौन से नवीन प्रयोग या अनुभव जोड़ने वाले हैं? और क्या ये नवीन प्रयोग उन्हें किसी अनचाही चुनौती की ओर ले जाएँगे? जानने के लिए अगला भाग अवश्य पढ़ें।
अगला भाग यहाँ पढ़ें:
https://meetu2nishabd.blogspot.com/2026/03/blog-post_11.html
No comments:
Post a Comment