Wednesday, April 15, 2026

'एक ऐतिहासिक श्राप और आज की आखेटवृत्ति'

एक ऐतिहासिक श्राप और आज की आखेटवृत्ति
"मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥"

अर्थ – "हे निषाद ! तुमको अनंत काल तक (प्रतिष्ठा) शांति न मिले, क्योकि तुमने प्रेम, प्रणय-क्रिया में लीन असावधान क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक की हत्या कर दी।"
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संलग्न तस्वीर मेरी बनाई ड्राइंग है। जब मैं इस तस्वीर को बना रही थी..... इस तस्वीर को बनाते हुए मेरे मन में यही श्लोक घूम रहा था................

और मैं सोच रही थी.... वो ऐसा ही एक क्रोंच का जोड़ा रहा होगा जिनमें से एक की उस दिन उस आखेटक ने हत्या कर दी थी.... और संवेदनशील, सह्रदय ऋषि वाल्मीकि के मुख से उपरोक्त काव्यात्मक पंक्तियां निकलीं, जिसका उन्होंने 'श्लोक' नाम रखा... उस वक्त उन्हें समझ नहीं आया कि इस श्लोक नामक काव्य शैली में किस विषय पर काव्य रचना की जाए, उस समय उन्हें देवर्षि नारद द्वारा सुनाई गई रामकथा का ध्यान ही न था; किंतु बाद में ब्रम्हदेव के सुझाव पर उन्होंने ऐतिहासिक रामायण नामक काव्य की रचना इसी 'श्लोक छंद' में की थी...।

खैर, ये एक ऐतिहासिक घटना थी.... जिसने मानव सभ्यता को न केवल श्लोक नाम संस्कृत पदात्मक काव्य शैली दी बल्कि 'वाल्मीकि रामायण' नामक संस्कृत भाषा में श्लोक बद्ध महाकाव्य भी दिया....।💕

पर मैं सोच रही थी कि क्या निर्मल-निश्छल ऋषि मन से निकला वह श्राप सिर्फ उस आखेटक तक सीमित रहा... मुझे लगता है नहीं... वह तो अनंतकाल तक आखेटवृत्ति रखने वाले सभी नरपशुओं में बंट गया... आज आखेटवृत्ति के अनगिनत स्वरूप हैं, मानव सिर्फ जीवन या धन-संपदा ही नहीं अपितु हर चीज़ जो किसी और के पास है उसे छीन लेना चाहता है, बर्बाद कर देना चाहता है; फिर चाहे वह किसी की छोटी सी मासूम खुशी ही क्यों न हो.... हम्म..... यही तो है आखेटवृत्ति और परिणाम है ऋषि मुख से निकला यह श्राप...।
आखेटवृत्ति के लोगों को लगता है कि सिर्फ छीन लेने भर से चीजें हासिल की जा सकती हैं.... पर ऐसा है नहीं.... सृष्टि का नियम है कि हर चीज़ अपनी कीमत वसूलती ही है और गहरी खुशियाँ तो कभी भी 'रेडी टू ईट' नहीं होतीं... वे धीरे-धीरे पलती हैं, पकती हैं, तैयार होती हैं... कुछ कुछ इस तस्वीर की तरह... इस तस्वीर की कीमत समय है... ये मेरा समय लेकर आई है... ये मेरे कल्पना करते ही तैयार नहीं हो गई.... पकती हुई खुशियों की खुश्बू लेने का समय अब कोई खर्च नहीं करना चाहता, सबको सबकुछ तैयार और 'रेडी टू यूज' चाहिए...।

खैर.... जानते तो सभी हैं पर सोचता कोई नहीं..... जबकि सोचना चाहिए, याद भी रखना चाहिए.... पर सोच कौन रहा है यह सब... मेरे जैसे कुछ फालतू-खाली समय सोचकर बिताने वाले लोग....🤔

यूँ कितनी ही अत्यावश्यक बातें हैं जो भूली नहीं जानी चाहिए थीं क्योंकि उन चीजों-बातों में सच्ची शांति और खुशियाँ छिपी हैं... और उन्हें हमारे पूर्वजों ने बहुत सारा समय खर्च करके बड़े गहरे चिंतन और गहन अनुसंधान से सामाजिक-नैतिक नियमों के रूप में सूक्तियों, कहानियों और कहावतों के रूप में सृजा और सहेजा था... 
वे जानते थे ये नैतिक-सामाजिक मूल्य कालातीत हैं, मानव जाति और मानव समाज को इनकी आवश्यकता सदैव बनी रहेगी... उन्हें एहसास था कि पाषाणकाल से लेकर भविष्यकाल में जबतक मानव समाज रहेगा उसे जीवन की उत्कृष्टता एवं व्यक्तित्व के उत्कर्ष हेतु इन मूल्यों की सदैव आवश्यकता रहेगी... परंतु मानव समाज ने आधुनिकता की रेलपेल और स्वार्थ एवं तात्कालिक सुख के वशीभूत होकर आत्मोत्कर्ष एवं आत्मोत्थान के मार्ग को अनावश्यक एवं असफल जानकर उसे त्याग दिया, उसे लगा कि इन मूल्यों का जीवन में कोई लाभ नहीं, उपयोगिता नहीं और यह व्यर्थ का श्रम एवं तात्कालिक लाभ में रुकावट उत्पन्न करने वाली हैं... इसका परिणाम यह हुआ कि आज का मानव समाज ढ़ेरो व्यक्तिगत, सामाजिक समस्याओं से घिर गया।

आज सबको सबकुछ आननफानन चाहिए.... फिर चाहे वह किसी की जान लेकर मिले या छीनकर या बर्बाद करके........ मिलना चाहिए बस्स.... इस 'चाहिए' शब्द ने ही आज संसार में इतनी तबाही मचा रखी है.... 'चाहिए' ने ही व्याध से उस प्रेमरत क्रौञ्च जोड़े का वध करवा दिया था और पीढ़ियों तक के लिए व्याध जाति श्रापित हो गई.... या यूँ कहें कि आखेटवृत्ति ही आज की श्रापित वृत्ति है...😒

खैर, शायद यही कारण है कि आज सृष्टि-सभ्यता इतनी बुरी तरह अशांत हैं... प्रतिष्ठा(शांति) कहीं नहीं है.... मानो ऋषिवर का श्राप शाश्वत हो गया है... सनातन हो गया है.... अनंतकाल तक के लिए स्थिर हो गया है.....😔

बस यह सब सोचकर अनायास ही मन उदास हो उठा....मेरी दृष्टि में ऋषिवर की वह करुणा एक आध्यात्मिक आयाम है जो उन्होंने स्नेहिल क्रौञ्च जोड़े को देखकर अनुभूति की थी और जो उस जोड़े के नष्ट होने पर क्रोध में बदल गई.... श्राप में ढल गई...।

       मेरी दृष्टि में जहाँ ह्रदय से स्नेह छलकता है वहीं वास्तविक आध्यात्मिकता का आरंभ होता है... आध्यात्मिकता ही है जो प्राणिमात्र में आत्मानुभूति कराती है.... वसुधैव कुटुम्बकम की रचना करती है...।।
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✍️'निःशब्द' की कलम से
🖌️तस्वीर जैमिनी की सहायता से निर्मित
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