Tuesday, April 21, 2026

श्रेष्ठता की परीक्षा: भाग- ३

'मायाजाल और कटु सत्य'

पिछले भाग में: "नमस्ते मित्रों! पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे स्वर्ग की सुंदरी मेनका ने महर्षि विश्वामित्र के तप के सुदृढ़ दुर्ग को अपनी पायल की झंकार से ढहा दिया। वर्षों की साधना एक क्षण के आवेग में बह गई।

​आज कहानी के इस तीसरे और निर्णायक भाग में हम उस सुबह की ओर चलेंगे, जहाँ वासना का कुहासा छँटता है और सामने खड़ा होता है—कठोर सत्य। क्या विश्वामित्र अपनी वर्षों की हानि को स्वीकार कर पाएंगे? क्या होगा जब उन्हें पता चलेगा कि जिसे वे अपनी नियति मान बैठे थे, वह केवल इंद्र का एक षड्यंत्र था? आइए देखते हैं, एक साधक के पतन और फिर जागते हुए विवेक की यह मर्मस्पर्शी गाथा।"

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​लम्बे अंतराल तक ऋषिवर समय की गति से पूर्णतः अनभिज्ञ रहे। उनके लिए दिन और रात का अंतर मिट चुका था और ऋतुओं का बदलना महज़ एक धुंधली परछाईं बनकर रह गया था। तपोवन की वह अनुशासित दिनचर्या अब विलास की चादर तले दबी पड़ी थी। किंतु, एक प्रातः जब सविता की तीखी किरण उनकी आँखों पर पड़ी, तो वर्षों से सुप्त पड़ा साधना का संस्कार अकस्मात जाग उठा। उन्हें सहसा अपने उस 'संध्या वंदन' का स्मरण हो आया, जो कभी उनके जीवन का आधार हुआ करता था।


​वे अकस्मात बोले: "अहो, देवी! तुम्हारे सौंदर्यरस का पान करने से मुझे तृप्ति नहीं होती किंतु अभी मुझे संध्या करने हेतु जाना ही होगा। नियम अनिवार्य है। मैं नित्य नियमोपरांत पुनः तुम्हारे पास आता हूँ।"

​विश्वामित्र के मुख से 'नियम' शब्द सुनकर मेनका की आँखों में आश्चर्य की चमक कौंधी। वह खिलखिलाकर हँस पड़ी, उसकी हँसी में व्यंग्य की एक ऐसी धार थी जो विश्वामित्र के हृदय को चीर गई। उसने अपनी अलकों को सँवारते हुए कहा: "अरे-अरे! कैसा नियम आर्य? आज अकस्मात आपको संध्या का नियम कैसे स्मरण हो आया? क्या आज मेरे श्रृंगार में कोई कमी रह गई या आज कुछ विशेष है?"

​ऋषि चौंके, उनके चेहरे पर छाई भ्रांति गहरी होने लगी। उन्होंने अपनी जटाओं को सँभाला, जो अब पहले जैसी सलीके से संभाली हुई नहीं थीं। वे अविश्वास के साथ बोले: "आज? देवी! क्या अर्थ है तुम्हारे इस आज का? यह मेरा दैनिक नियम है, तपश्चर्या और साधना के बल से ही तो मैं तप और सिद्धि की श्रेष्ठता के शिखर पर हूँ।"


मेनका के चेहरे पर अब एक गंभीर और रहस्यमयी मुस्कान थी। वह धीरे से उठी और विश्वामित्र के समीप आकर खड़ी हो गई। और एक हाथ उनके कंधे पर टिकाकर बड़ी मोहक चितवन से उनकी ओर देखती हुई बोली: "कैसा तप? कौन सी सिद्धियां? देव! किस नियम की बात कर रहे हैं आप? वर्षों के अंतराल में मैंने तो आपको कभी तप और नियम की चर्चा करते नहीं सुना। कब से तो आपके लिए मैं ही देवी और काम ही तपस्या है, और इसमें आपने मुझे ही सर्वस्व मानकर अपना समस्त तेज मुझपर ही तो समर्पित कर दिया।" मेनका की वाणी में अब सत्य का प्रहार था।

​ऋषि के पैरों तले जैसे धरती खिसक गई। वे कुछ कहते, उससे पहले ही मेनका उनके सम्मुख आकर खड़ी हो गई और उनकी आँखों में आँखें डालकर देखने लगी। उसके नेत्रों में अब वह चंचलता नहीं बल्कि तीक्ष्णता थी। 


वह ओजपूर्ण किंतु शांत स्वर में बोली: "क्षमा करें, ऋषिवर! आपको मेरे साथ रमण करते वर्ष बीत गए, आज तक आप मेरे सौंदर्य एवं मोह में ऐसा लिप्त थे कि आपको समय का भी भान न रहा। देवराज ने मुझे आपके तपनिष्ठा की परीक्षा करने भेजा था और मेरी दृष्टि में आप मेरी परिक्षा में असफल रहे। आर्य! आप तो अपने तप के अहंकार में इतने चूर थे कि कामदेव से अपनी तपस्या की रक्षा करने का अपना महती कर्तव्य भी भूल गए। पूर्व में निश्चय ही आपने कठोर तप किया होगा, किंतु अंहकार के वशीभूत एवं प्रमादवश तपश्चर्या और साधना की निरंतरता को तो आप बनाए न रख सके। क्षमा करें, ऋषिवर! कहना नहीं चाहती थी किंतु कह रही हूँ कि आपको मेरे साथ रमण करने के लिए तपश्चरण को त्यागने की आवश्यकता न थी, आप एक गृहस्थ की भांति काम एवं त्याग का संतुलित सेवन कर सकते थे किंतु आपको अपने तपश्चचर्या पर अहंकार था। आपने स्वयं को पूर्ण तपस्वी मान लिया था और प्रमाद में फँस गए। जबकि मैं मानती हूँ कि तपस्या में पूर्णता नहीं निरंतरता महत्त्वपूर्ण है।" इतना कहकर मेनका मौन हो गई।

इधर ​ऋषिवर के तन-मन में जैसे बिजलियाँ कौंध गईं। सहसा उन्हें वास्तविकता का भान हो आया और मानो उन पर घड़ों पानी पड़ चुका था। उनकी बंद आँखों के सामने वर्षों का वह श्रम, वह कठिन तप और वह संचित तेज एक क्षण में रेत के महल की तरह ढहता हुआ दिखाई दिया। एक ओर उस महान हानि का दुख था, तो दूसरी ओर मेनका के शब्द-बाण और भविष्य में होने वाले जग-हंसाई का डर। उनका शेष बचा अहंकार अपमान की आग में फनफना उठा।

​किंतु, उस क्रोध के बीच भी उनके भीतर का 'साधक' जाग चुका था। उन्हें बोध हो गया था कि इस पतन के लिए वे स्वयं ही अधिक उत्तरदायी हैं; चूक उन्हीं से हुई है। किंतु उनके अंदर का पुरुष अहं एक स्त्री के सम्मुख हार कैसे स्वीकारता, अतः वे मेनका को क्रोध और घृणा की मिली-जुली दृष्टि से घूरते रहे। तभी उनकी दृष्टि मेनका की देह पर पड़ी—उन्हें आभास था कि मेनका गर्भवती हैं। एक ओर मेनका का गर्भ उनके स्खलित तप का प्रत्यक्ष प्रमाण दे रहा था तो दूसरी ओर मेनका का प्रत्येक शब्द सत्य होते हुए भी भयंकर बाणों की भांति उन्हें बींध रहा था किंतु वे चाहकर भी उन्हें दंड नहीं दे सकते थे। इसके अलावा उस स्वर्ग निवासिनी अप्सरा के लिए अभी भी उनके ह्रदय में कोमलता शेष थी, जिसके साथ उन्होंने लम्बे समय का कामसुख भोगा था, जिसे उनके ह्रदय ने प्रेयसी स्वीकारा था और जिसने उनके लम्बे तपश्चर्य से थके ह्रदय को अपने सानिध्य में प्रेम की शीतलता प्रदान की थी उसपर सहसा उनका क्रोध बरसने से संकोच कर रहा था। इसके अतिरिक्त उनकी दृष्टि में उनके पतन के लिए वह अप्सरा पूर्ण और अकेली दोषी भी नहीं थी।

यद्यपि उनके अंदर का अहंकार उनके कानों में फुसफुसा कर उन्हें इंद्रदेव एवं मेनका के विरुद्ध उकसा रहा था किंतु साधक का विवेक पूर्णतः मरा नहीं था अतः उन्होंने अपने अंदर उठते क्रोध के ज्वार को बलपूर्वक रोकते हुए मेनका की ओर तीक्ष्ण दृष्टि से देखकर क्रोध से कांपती आवाज़ में कहा: "मेनके! मैं जान गया हूँ तुम यहाँ देवराज की आज्ञा से बँधकर आई थीं और तुमने मेरी परिक्षा के बहाने मेरा सर्वनाश भी कर दिया। तथापि मैं तुम्हें पूर्णतः दोष नहीं देता, तुमने सत्य कहा मेरे पतन में मेरा स्वयं का अहंकार और प्रमाद ही अधिक दोषी है। तथापि मैं इस वक्त पराजय एवं क्रोध से व्यथित हूँ किंतु मैं तुम्हें किसी प्रकार की क्षति भी नहीं पहुचा सकता, इसलिए इससे पहले कि मैं तुम्हें अपने शेष तपबल से श्राप दे दूँ और मेरा क्रोध किसी भी प्रकार तुम्हारा अहित करे, अभी के अभी चली जाओ यहाँ से। लौट जाओ देवी! अपने स्वर्ग के सुख में, जाओ देवी, चली जाओ यहाँ से…।" अंतिम शब्द बोलते-बोलते ऋषि को वाणी भावावेग से काँपती हुई भी क्रोध से दहाड़ उठी।

​विश्वामित्र का शरीर क्रोध और ग्लानि से जल रहा था। उनकी आँखों में वही पुराना तपस्वी तेज अब विनाशकारी अग्नि बनकर दपदपा रहा था। उस गर्जना और फटकार सुनकर मेनका एक पल को भीतर तक सिहर उठी। वह समझ गई कि अब तर्क या रुकने का समय बीत चुका है। वह काँपते हाथों से अपने गर्भ को सँभालती हुई, अपनी आँखों में उमड़ते दुख और आहत मन के आँसू पोंछती हुई, उस आश्रम से स्वर्ग के लिए निकल पड़ी।

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अगले भाग में: "प्रेम और परीक्षा के पाटों के मध्य आहत मेनका चली गई, परंतु ऋषि विश्वामित्र के पास क्या बचा? क्या एक बार खंडित हुई साधना दोबारा शून्य से शुरू हो सकती है? और सबसे बड़ा प्रश्न—इंद्र और विरोचन की उस बहस का अब क्या होगा? क्या कण्व ऋषि की 'लोक-सेवा' अब विश्वामित्र के इस व्यक्तिगत 'अहंकार' पर भारी पड़ेगी?

​इन्हीं सवालों के जवाब मिलेंगे अगले अंक में— ''विवशता और निष्ठुर संकल्प"

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अगला भाग यहाँ पढ़ें:

http://meetu2nishabd.blogspot.com/2026/04/blog-post_84.html

✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीर जैमिनी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित

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