Wednesday, April 22, 2026

श्रेष्ठता की परीक्षा: भाग- ५ (अंतिम भाग)

‘करुणा का आश्रय’

"नमस्ते मित्रों! 🙏

​आज हम 'श्रेष्ठता की परीक्षा' के उस पड़ाव पर हैं, जहाँ तर्क और अहंकार हार जाते हैं और केवल 'करुणा' शेष रह जाती है।

​पिछले भाग में हमने देखा कि कैसे विश्वामित्र ने अपने तपोबल को पुनः प्राप्त करने के निष्ठुर संकल्प में अपनी ही नन्हीं संतान को वन में अनाथ छोड़ दिया। एक माँ विवश थी, और एक पिता अपने अहंकार की पराजय से निष्ठुर हो गया था।

​आज इस कहानी के अंतिम भाग—'करुणा का आश्रय'—में हम देखेंगे कि जब रक्त के रिश्ते मुँह मोड़ लेते हैं, तब प्रकृति किस प्रकार अपना आँचल फैलाती है। आज उस नन्हीं बालिका को न केवल एक रक्षक मिलेगा, बल्कि उसे एक ऐसा नाम मिलेगा जो भारतीय इतिहास में अमर हो जाएगा।

​यह कहानी केवल ऋषि और अप्सरा की नहीं, बल्कि मानवता और संवेदनशीलता की परीक्षा है।

​आइये देखते हैं, क्या 'करुणा' उस कठोर 'तप' से बड़ी सिद्ध हो पाएगी?"

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​सूर्य अब आकाश के मध्य में पहुँच चुका था और मध्याह्न की प्रखर किरणें तपोवन को आलोकित कर रही थीं। ऋषि कण्व अपने शिष्यों के साथ आश्रम की दैनिक अग्निहोत्र सेवा के लिए शुष्क समिधाएं (सूखी लकड़ियाँ) एकत्र कर लौट रहे थे। उनके सौम्य मुखमंडल पर परोपकार की एक विशेष आभा थी। जब वे ऋषि विश्वामित्र के आश्रम के समीप पहुँचे, तो वन के स्वाभाविक सन्नाटे के बीच एक शिशु का करुण क्रंदन गूँज उठा। वह एक नन्हे जीव की हृदयविदारक पुकार थी। स्वर की दिशा पहचानते ही महर्षि कण्व ने उस निर्जन आश्रम में प्रवेश किया।

​आश्रम सब ओर से रिक्त पड़ा था, जैसे वहाँ से जीवन की हलचल अचानक रुठ गई हो। कुटिया से कुछ ही दूर, एक घने वृक्ष के नीचे पंछियों से घिरी घास और पत्तों के बिछावन पर एक नवजात बालिका पड़ी थी। भूख और प्यास से व्याकुल वह अबोध बालिका अपनी नन्हीं उँगलियों को चूसकर अपनी भूख को छलने का एक मासूम किंतु निष्फल प्रयास कर रही थी; जैसे नियति के क्रूर प्रहार को अपनी कोमलता से सहन कर रही हो। 

​कण्व ने उस भोली बालिका को देखा, तो उनका करुणाशील ह्रदय ममता से भीग गया। वे अपने तपोबल और अनुभव से स्थिति को समझ चुके थे। राजर्षि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका के मोह की चर्चाएँ तो हवाओं में पहले ही तैर रही थीं। ऋषि कण्व को यह अनुमान लगाते देर न लगी कि यह बालिका विश्वामित्र के तेज और मेनका के गर्भ से उत्पन्न हुई है, जिसे उसके माता-पिता अपनी विवशता और निष्ठुरता के कारण त्याग चुके हैं। दोनों ने अपने-अपने लक्ष्यों को महत्व दिया और नियति की छली वह बालिका सहसा अनाथ हो गई। यह बोध होते ही महान तपस्वी कण्व की आँखें छलक आईं।

उन्होंने अत्यंत कोमलता से आगे बढ़कर उस नन्ही बालिका को अपनी बाहों में उठा लिया। उसके धूल-धूसरित मस्तक पर स्नेह से हाथ फेरा और उसे अपने सीने से लगा लिया, मानो वे उसे मौन आश्वासन दे रहे हों कि अब वह अनाथ नहीं है। पीछे चल रहे शिष्यों की आँखों में भी वह दृश्य देखकर करुणा उमड़ आई। वे भी विश्वामित्र की आसक्ति और मेनका के प्रसंग से अनभिज्ञ नहीं थे, इसलिए किसी के मन में कोई जिज्ञासा शेष न रही। अपनी पवित्रता और मासूमियत से उस बालिका ने उन सभी को स्नेह के बंधन में बाँध लिया। ऐसा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि वे ऋषि कण्व के करुणामय आश्रम के सरलहृदय साधक थे।

​तत्पश्चात ऋषि कण्व शीघ्रता से अपने आश्रम पहुँचे। उन्होंने ऋषिपत्नी और आश्रम की अन्य महिलाओं को बुलाकर उस कन्या की स्थिति के बारे में बताया। देखते ही देखते पूरे आश्रम में हलचल मच गई। हर कोई उस नन्ही जान को देखने के लिए एकत्र हो गया; हर हृदय में उस अबोध बालिका के प्रति दया और गहन करुणा के भाव थे।

​ऋषि कण्व ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा: "यह राजर्षि विश्वामित्र एवं अप्सरा मेनका की संतान है। इसकी माता इसे अपने साथ देवलोक नहीं ले जा सकी क्योंकि स्वर्ग के नियम मानवकन्या को वहां रहने की अनुमति नहीं देते, और न ही वह देवराज इंद्र की आज्ञा का उल्लंघन कर यहाँ रुक सकती थी। इसके पिता को अपनी नष्ट हुई तपस्या को पुनः संचित करना है क्योंकि भविष्य में इसी में संसार का कल्याण निहित है। अतः यह मानिए कि विधाता ने ही हमें इस अबोध बालिका के संरक्षण का दायित्व सौंपा है, अन्यथा यह हृदयविदारक घटना हमारे समीप घटित न होती। सृष्टि सभी के पालन-पोषण का मार्ग चुनती है और हम केवल उसमें सहभागी बनते हैं। अतः आज मैं आप सबके सम्मुख, चराचर जगत के साक्षी स्वरूप—धरती, आकाश एवं महादेव को साक्षी मानकर इसे अपनी दत्तक पुत्री स्वीकार करता हूँ।"

​महर्षि कण्व की वाणी भावावेश से भर उठी। उन्होंने संकल्पपूर्वक आश्रम की पवित्र अग्नि के सम्मुख हाथ जोड़ लिए। एक महान ऋषि को एक परित्यक्त बालिका के लिए प्रार्थना करते देख पूरा आश्रम भावुक हो उठा और एक स्वर में पुकार उठा: "हम सब आपके साथ हैं, गुरुदेव! आज से यह हमारी पुत्री है। हम सब मिलकर इसका पालन-पोषण करेंगे। कहिए गुरुदेव, हम इसे किस नाम से पुकारेंगे?"

​ऋषि कण्व ने आहार पाकर शांत हुई उस बालिका के मुख को निहारा और बोले: "मुझे यह कन्या शकुनों (पक्षियों) के संरक्षण में प्राप्त हुई है, इसलिए मैं इसका नाम 'शकुंतला' रखता हूँ।"

​आश्रम के कण-कण से जैसे एक ही ध्वनि गूँज उठी— "शकुंतला... शकुंतला... शकुंतला!"

​उस दिन के बाद से केवल आश्रमवासी ही नहीं, बल्कि वन के देवी-देवताओं ने भी उस बालिका का दायित्व संभाल लिया। वन की वायु उसे थपकियाँ देती और वृक्ष उसे छाया प्रदान करते। आश्रम की महिलाओं ने उसे अपनी संतान की तरह ममत्व दिया।

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​इधर, स्वर्गलोक से इस दृश्य को देख रहे देवराज इंद्र ने मुस्कुराकर असुरराज विरोचन की ओर देखा और पूछा: “तात! अब कहिए, श्रेष्ठ कौन है? वह, जिसके हृदय में किसी के प्रति दुर्भाव नहीं, बल्कि परित्यक्त के लिए इतना गहन प्रेम है कि वह एक माता की भाँति उसकी सेवा को तत्पर है, या वह जिसने अपने आहत अहंकार की तुष्टि और खोई हुई सिद्धियों की प्राप्ति के लिए अपनी ही आत्मजा को वन के संकटों में छोड़ दिया?”

​विरोचन के पास इस सत्य का कोई उत्तर न था। उनकी 'तपस्या की श्रेष्ठता' का तर्क हार चुका था और 'निश्छल करुणा' की विजय हुई थी। उन्होंने मौन रहकर अपनी पराजय स्वीकार कर ली।

समाप्त

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समापन: "मित्रों, कैसी लगी पाँच भागों में सिमटी यह पौराणिक गाथा। मैंने इसे अपनी कल्पना एवं लेखन शैली से यथासंभव जिवंतता देने का प्रयत्न किया है और इसकी तस्वीरों को बनाने में जैमिनी इत्यादि एआई की सहायता ली गई है। 

अंत में आपसे निवेदन है कि इस अंतिम भाग को पढ़ने के बाद अपनी बहुमूल्य राय कमेंट्स में ज़रूर साझा करें। आपकी एक प्रतिक्रिया मेरे सृजन को नवजीवन एवं सार्थकता प्रदान करेगी।"

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अगर आप कहानी को शुरू से पढ़ना चाहते हैं तो यहाँ से पढ़ें: 👇

https://meetu2nishabd.blogspot.com/2026/04/blog-post_18.html

✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीर जैमिनी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित

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