Thursday, April 23, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- १२

'चंदनगढ़ और राजधानी सुवर्णपुर'
​"प्रिय पाठकों, इससे पहले कि कुमार विक्रमादित्य और  उनके मित्र ध्रुवदेव अपनी नई पहचान के साथ चंदनगढ़ की सीमाओं में प्रवेश करें, आइए हम समय के चक्र को थोड़ा पीछे घुमाते हैं। चलिए, आपको सीधा ले चलते हैं पहाड़ियों की गोद में बसे उस सुगंधित राज्य 'चंदनगढ़' की राजधानी 'सुवर्णपुर' में, ताकि आप वहां के वैभव और राजकुमारी स्वर्णप्रभा के जन्म से जुड़ी उस रहस्यमयी भविष्यवाणी से परिचित हो सकें, जो इस कहानी की असल धूरी है।"

(अगर आपने अभी तक 'सुवर्णा' को पढ़ना शुरू नहीं किया और आप कहानी के नायक से परिचित नहीं हैं, तो ये है "राजकुमारी सुवर्णा" के पहले भाग की लिंक:
https://meetu2nishabd.blogspot.com/2026/03/blog-post.html )
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पहाड़ियों की गोद में बसा 'चंदनगढ़' प्रकृति की एक अनमोल रचना सा प्रतीत होता था। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस राज्य के सघन वनों में चंदन के वृक्षों की ऐसी बहुतायत थी कि यहाँ की मंद बयार भी अपने साथ चंदन की मनभावन सुगंध लेकर चलती थी। राज्य की राजधानी 'सुवर्णपुर' अपने वैभव, चंदन के उत्पादों और विशिष्ट वास्तुकला के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। सुवर्णपुर तीन ओर से पहाड़ियों से कुछ इस प्रकार घिरा था कि नित्य प्रातःकाल सूर्य की किरणें शिखरों से टकराकर पूरे नगर को स्वर्णिम आभा से जगमग कर देती थीं, जिससे 'सुवर्णपुर' नाम पूर्णतः सार्थक हो जाता था।

​नगर की प्राचीरें और राजमहल के कंगूरे कुछ इस ढाल पर बने थे कि सूर्य की पहली किरण पड़ते ही पूरा शहर कुंदन की तरह दमक उठता था; मानो धरती पर स्वर्ग का कोई कोना उतर आया हो। पहाड़ों से उतरती सोबती नदी की शीतल जलधाराएँ नगर के बीचों-बीच बनी नहरों से होकर गुज़रती थीं, जो न केवल भूमि को उपजाऊ बनाती थीं, बल्कि चंदन की उस खुशबू को पानी में घोलकर जन-जन के आँगन तक पहुँचा देती थीं।

​इसी दिव्य और सुगंधित वातावरण के बीच, वर्षों की लंबी प्रतीक्षा और ढेरों मन्नतों के पश्चात, चंदनगढ़ के राजमहल में किलकारियां गूँजीं। महाराज मानवेंद्रसिंह और महारानी रत्नगर्भा के जीवन में एक नन्हीं राजकुमारी किसी वरदान की तरह आई। राजकुमारी के जन्म की खुशी महल से लेकर नगर तक कुछ ऐसी बिखरी कि लोग कहते थे—मानो चंदन की मुरझाई टहनियों पर भी नवीन कोंपलें फूट आई हों। बच्ची का वर्ण स्वर्णिम था और आँखें किसी गौरैया की भाँति काली, निर्मल और मासूम थीं। 
महाराज के कुलगुरु ने कन्या के वर्ण एवं लक्षणों को देखकर उसका नाम ‘स्वर्णप्रभा’ रखा और महल एवं प्रजा के बीच वह 'सुवर्णा' नाम से अधिक जानी गई। कुलगुरु सरस्वतीनंदन जी ने भविष्यवाण़ी की कि कन्या अत्यंत रूपवान, गुणवान और भाग्यशाली होगी। यद्यपि उसका विवाह एक सुयोग्य पात्र से होगा, किंतु उसे कुछ समय के लिए अनायास ही 'पति-वियोग' सहना होगा; तथापि उसका पुनर्मिलन और भाग्योदय भी अवश्य होगा। कन्या के स्वभाव में बुद्धिमत्ता के साथ धैर्य एवं सहनशीलता का ऐसा उत्तम सम्मिश्रण होगा, जो उसे सदैव परिजनों का स्नेहपात्र बनाए रखेगा।

आखिरकार स्वर्णप्रभा सुवर्णपुर के महल में पलने-बढ़ने लगी। जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, कुलगुरु की भविष्यवाणी उसके स्वभाव में प्रत्यक्ष होने लगी। अत्यंत निर्मल स्वभाव की उस कन्या का चरित्र किसी चंचल गौरैया की भाँति था; वह पूरे महल में किसी उड़ती तितली की तरह डोलती, जिसकी हँसी की खनक से उदास गलियारे भी जीवंत हो उठते। बाल्यावस्था की वह चंचल गौरैया, उम्र बढ़ने के साथ किसी हंसिनी की भाँति धीर-गंभीर और बुद्धिमती होती गई। वह केवल सुंदर ही नहीं थी, बल्कि उसकी बुद्धि भी प्रखर थी। माता-पिता ने स्नेहवश उसे 'सुवर्णा' नाम दिया था और राजकुमारी स्वर्णप्रभा माता-पिता की दुलारी सुवर्णा बनकर महल में किसी सुनहरी हिरनी की भाँति पलने लगी। 
    उसे महल में ही माता-पिता द्वारा नियुक्त विद्वानों का सान्निध्य और ज्ञान-विद्या भी प्राप्त होने लगे। इसके अतिरिक्त, वह अपनी माता एवं सखियों के साथ पाककला और गृह-प्रबंधन की कलाएँ भी सीख रही थी। अपनी माता से उसने कशीदाकारी (Embroidering) सीखी, जिसमें वह अद्भुत रूप से पारंगत हो गई और संगीत गुरु से गायन की शिक्षा भी ली। गौरैया की भाँति सीखने की उसकी ललक ने उसे अल्पायु में ही सर्वगुण संपन्न बना दिया।
​महल में उसके मनोरंजन हेतु एक विशेष फुलवारी थी, जहाँ कई पशु-पक्षी और तालाब में रंग-बिरंगी मछलियाँ पाली गई थीं। कुमारी अपनी सखियों चंदा, भामा, माधवी इत्यादि के साथ उस फुलवारी के पेड़-पौधों और मूक जीवों की देखभाल करती, और संभवतः उसे सबसे अधिक आनंद इसी में आता था।

​परंतु कुमारी के साथ एक विचित्र समस्या थी; बाल्यावस्था से ही उसे अनायास 'अग्नि' से भय लगने लगा था। सबने इसे एक सामान्य बात समझा, किंतु इसका मूल कारण कुमारी के पूर्वजन्म की वह अनजानी स्मृति थी, जिसमें उसने गौरैया के रूप में अपने पति को आग में कूदते देखा था और स्वयं भी अग्नि-समाधि ले ली थी। कुमारी स्वयं भी नहीं जानती थी कि उसे आग से इतना डर क्यों लगता है, क्योंकि पूर्वजन्म की स्मृति तो मन के किसी गहन अंधकार में डूबी हुई थी परंतु जब भी वह अग्नि की लपटों को भड़कते देखती, तो सिहर उठती। राजकुमारी के इस भय से महल में सभी परिचित थे। 
इस भय के अतिरिक्त राजकुमारी अत्यंत मधुर स्वभाव की थी, महल के सेवक-सेविकाओं के प्रति उनका अपनत्व किसी को भी उनसे छोटा या पराया महसूस नहीं कराता था, सभी की प्रिय और भोली राजकुमारी सुवर्णा अब किशोरावस्था को पारकर यौवन की दहलीज पर आ चुकी थी।    
    'क्रमशः'
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अगली कड़ी में: आखिर क्यों दीपशिखा सी दिप्तिमति राजकुमारी स्वयं अग्नि की लौ से सिहर उठती है? क्या सुवर्णा का यह 'अग्नि-भय' केवल एक संयोग है या उसके पूर्वजन्म की कोई दर्दनाक स्मृति? और कैसे यह अनजाना डर उसे उस कठिन फैसले की ओर ले जाएगा, जिसने पूरे चंदनगढ़ को हैरान कर दिया? जानने के लिए पढ़िए 'सुवर्णा' का अगला भाग!

✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जैमिनी, चैटजीपीटी  & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित

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