Thursday, April 30, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- १६

ऋषि का रहस्योद्घाटन​

पिछले भाग में आपने पढ़ा: राजकुमारी सुवर्णा की आँखों पर बंधी पट्टी ने पूरे राजमहल को चिंता में डाल दिया है। महाराज और महारानी व्याकुल हैं, किंतु वे कुमारी से खुलकर कुछ पूछ भी नहीं पाए कि तभी कुलगुरु आचार्य सरस्वतीनंदन का बुलावा आ जाता है। क्या यह बुलावा संयोग है? कुलगुरु का कोई दिव्य प्रभाव? अब आगे... (भाग: १५)
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राज-दम्पति अतिथि-भवन पहुँचे और देखा कि कक्ष में पूर्ण एकांत था। कुलगुरु वातायन (खिड़की) के निकट खड़े बाहर देख रहे थे, उनकी मुख-मुद्रा अत्यधिक गंभीर थी। राजा-रानी ने कुलगुरु को सविनय प्रणाम किया। कुलगुरु ने दोनों हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया और धीर-गंभीर चाल से आसन की ओर बढ़ चले।
​कुलगुरु एक वयोवृद्ध विद्वान थे, जिनका नाम था— ‘श्री सरस्वतीनंदन आचार्य’। आचार्यश्री का वर्ण साँवला था; वे लंबी सफेद दाढ़ी रखते थे और सदैव श्वेत वस्त्र धारण करते थे। उनकी गहरी और दृष्टिपूर्ण आँखें उनके व्यक्तित्व को एक विशिष्ट गरिमा प्रदान करती थीं। पूर्व में उनके गुरु इस राजपरिवार के कुलगुरु थे, किंतु मृत्यु पूर्व उन्होंने यह दायित्व आचार्यश्री को सौंप दिया था और उन्हें निष्ठापूर्वक इसके निर्वहन की प्रेरणा दी थी। इसके पीछे एक गुप्त कारण भी था, जिससे राजपरिवार अब तक अनभिज्ञ था, किंतु शायद अब वह समय आ गया था कि रहस्य से पर्दा उठे।

​आसन पर बैठते हुए कुलगुरु ने राज-दम्पति को भी बैठने का संकेत किया। उनके बैठ जाने पर वे धीर-गंभीर स्वर में बोले, “सब कुशल तो है न राजन्? महल में कुछ हलचल प्रतीत होती है!”

​राजा ने हाथ जोड़कर आदरपूर्वक कहा, “आपकी कृपा है, श्रद्धेय! आज यह हलचल कुमारी के एक आकस्मिक निर्णय को लेकर मची है, हम वहीं से आ रहे हैं।”
​कुलगुरु शांत भाव से बोले, “कुमारी ने आँखों पर पट्टी बाँध ली है, इसलिए चिंतित हो?”

​राजा विस्मित होकर बोले, “आदरणीय को भी सूचना मिल गई! हम अभी तक इसका कारण ज्ञात नहीं कर पाए हैं। महारानी को सखियों ने बताया कि कुमारी किसी को कुछ नहीं बता रही और पूछने पर उन्हें सौगंध देकर रोक दिया है। आपकी अनुमति हो तो उसे यहीं बुलाएँ? वह बचपन से ही आपको अपने हृदय की बात बताती रही है। हमें आभास होता है कि हमसे अधिक आप पर उसका विश्वास और अटल श्रद्धा है, इसलिए...”

​कुलगुरु ने हाथ उठाकर महाराज को बीच में ही रोका और बोले, “इसकी आवश्यकता नहीं है राजन्! यही कुमारी के लिए 'विधि का विधान' है... आप दोनों चिंतित न हों।”
रानी की आँखें भर आईं। वे किंचित संकोच के साथ हाथ जोड़कर बोलीं, “गुरुदेव! आपका कथन अवश्य ही सत्य होगा, किंतु मैं एक माता हूँ। जब से उसकी आँखों पर वह पट्टी देखी है, हृदय बैठा जा रहा है। अकारण ही मेरी बच्ची ने यह कैसा अंधकारमय मार्ग चुन लिया है? और ऐसे में उसका भविष्य...!” रानी सिसक पड़ीं और महाराज की आँखें भी नम हो गईं।
​कुलगुरु मौन रहे। कुछ क्षण निशब्द बीत गए। जब रानी थोड़ी संयत हुईं, तो क्षमा माँगते हुए बोलीं, “क्षमा करें गुरुदेव! एक रानी का मन तो आप पर पूर्ण विश्वास और श्रद्धा रखता है, किंतु माँ का हृदय किसी आश्वासन पर ठहर नहीं पा रहा।”

​कुलगुरु ने तनिक मधुर मुस्कान के साथ कहा, “किंतु पुत्री, अभी तो मैंने कोई आश्वासन दिया ही कहाँ है?”

​महाराज बोले, “गुरुदेव, आपने कहा कि ‘कुमारी के लिए यही विधि का विधान है’, इसका क्या अर्थ है? क्या आप जानते थे कि ऐसा कुछ होने वाला है?” यह सुनकर रानी भी चौंक उठीं और कुलगुरु की ओर विस्मय और प्रश्नवाचक दृष्टि से देखने लगीं।

​कुलगुरु ने एक गहरी श्वास ली और कहना प्रारंभ किया, “हाँ राजन्! मैं जानता था और मेरे गुरु भी जानते थे। किंतु समय से पूर्व कुछ भी कहना उचित न था। चलिए, मैं आपको एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, इसे ध्यान से श्रवण करें...”
​“किसी समय एक सघन वन में, एक विशाल वृक्ष पर पक्षियों का एक जोड़ा रहता था। एक ठिठुरती शीत ऋतु की रात्रि में, एक थका-हारा पथिक उसी वृक्ष के नीचे आ ठहरा। वह थर-थर काँप रहा था। वृक्ष पर रहने वाले उन परिंदों ने उसे अपना अतिथि स्वीकार किया और अपनी नन्हीं सामर्थ्य से उसके लिए अलाव की व्यवस्था की। जब उन्हें भान हुआ कि उनका अतिथि भूखा है और रात्रि के उस सघन अंधकार में वे उसके लिए भोजन नहीं जुटा सकते, तब एक कठोर निर्णय लेकर उन दोनों ने स्वयं को उस अलाव की अग्नि में झोंक दिया, ताकि पथिक उनके देह को क्षुधा शांत करने हेतु उपयोग कर सके।” (यह सुनकर रानी ने सहमकर मुख पर हाथ रख लिया)।
​कुलगुरु आगे बोले, “उस रात्रि उन पक्षियों ने आत्म-बलिदान देकर उस पथिक के प्राणों की रक्षा की। किंतु वह पथिक रात भर यही सोचता रहा कि उन पक्षियों ने ऐसा आत्मघाती कदम क्यों उठाया? वह प्रश्न उसे सदैव कचोटता रहता। उसने अनेक साधु-संतों और तपस्वियों से इसका उत्तर माँगा, परंतु उसे कहीं से भी संतोषजनक उत्तर न मिला। अंततः वह हमारे पूज्य गुरुदेव स्वर्गीय नित्यानंद महाराज जी की शरण में पहुँचा। गुरुदेव ने उसे उन पक्षियों का मर्म समझाया और बताया कि उस रात वास्तव में क्या घटित हुआ था...” (इसके पश्चात कुलगुरु ने गौरा-गौरैया की वह संपूर्ण कथा विस्तार से सुनाई)।

कथा सुनाकर गुरुदेव कुछ क्षणों के लिए मौन हो गए और सिर झुकाकर गहन चिंतन में डूब गए। राज-दम्पति भी अवाक् थे। कुछ पल पश्चात जब कुलगुरु ने सिर उठाया, तो उनकी आँखों में अश्रु तैर रहे थे। राजा-रानी यह देखकर दंग रह गए। इससे पूर्व कि वे कुछ कहते, गुरुदेव ने स्वयं को संभाल लिया। अब उनकी आँखों में आँसू नहीं, बल्कि वही चिर-परिचित गंभीरता थी। वे धीर स्वर में बोले, “जानते हो राजन्, वह पथिक मैं ही था! तब मैं ऐसा नहीं था... मैं एक साधारण युवक था जिसे किसी बात की परवाह न थी, किंतु उन पक्षियों के निस्वार्थ बलिदान ने मेरा जीवन-दर्शन ही बदल दिया। गुरुदेव के मुख से जब मैंने वही गाथा सुनी, तो मुझे आभास हुआ जैसे वे स्वयं वहां उपस्थित थे। उसी क्षण मेरे भीतर का सारा संसार-राग नष्ट हो गया और मैं विरक्त हो उठा।”

​कुलगुरु ने पुनः एक गहरी श्वास ली और मंद मुस्कान के साथ बोले, “तुम्हें यह जानकर अत्यधिक विस्मय होगा कि वह पुण्यात्मा गौरैया ही तुम्हारी पुत्री के रूप में जन्मी है। तुम्हें स्मरण होगा, मैंने पूर्व में ही उसकी अग्नि-भय के संबंध में संकेत दिया था कि इसका गहरा नाता उसके पूर्वजन्म से है।” यह बताते हुए कुलगुरु की मुस्कान और भी गहरी हो गई। राजा-रानी हतप्रभ होकर कभी गुरुदेव को, तो कभी एक-दूसरे को देख रहे थे।  
    'क्रमशः'
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    अगले भाग में: "वह पथिक मैं ही था!"—कुलगुरु के इस स्वीकारोक्ति ने राजा-रानी के पैरों तले ज़मीन खिसका दी है। एक गौरैया का आत्म-बलिदान और एक पथिक का सन्यास—कैसे जुड़ी है सुवर्णा की नियति कुलगुरु के अतीत से? क्या माता-पिता अपनी पुत्री के इस 'अलौकिक' सत्य को स्वीकार कर पाएंगे? रहस्य की परतें अभी और खुलनी बाकी हैं...
​सुवर्णा का अगला रोमांचक अंक पढ़ना न भूलें!
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क्या आप सुवर्णा की इस यात्रा से नए जुड़े हैं?
अगर आपने अभी तक इस शानदार गाथा की शुरुआत नहीं की है, तो यहीं से शुरू करें और पहले ही एपिसोड से इसके रहस्य का अनुभव करें:
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✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जैमिनी, चैटजीपीटी  & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित

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