Monday, April 27, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- १५

अटल संकल्प
पिछले भाग में आपने पढ़ा: पूर्वजन्म की स्मृतियों ने सुवर्णा के हृदय में अपने पूर्वजन्म के पति के प्रति अनन्य प्रेम जगा दिया। महादेव को साक्षी मानकर उसने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और संकल्प लिया कि अब वो केवल अपने उस पूर्वजन्म के पति को ही देखेगी। अब आगे...
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    प्रातः जागने पर इस नवीन अवस्था में कुमारी को नित्य कर्म भी अत्यंत कठिन प्रतीत हुए, किंतु वे धुन की पक्की थीं। उन्होंने मन में ठान लिया था कि अब इसी प्रकार रहना है।

​जैसे ही कक्ष में सखियों और सेविकाओं का आगमन हुआ, वे भौचक्की रह गईं। रात्रि तक तो सब ठीक था, फिर अचानक आँखों पर यह पट्टी क्यों?
​चंदा घबराकर बोली, "हे प्रभु! सखी, आपकी आँखों को क्या हुआ? क्या कोई चोट लग गई? जल्दी जाओ, कोई वैद्यराज जी को बुला लाओ!" चंदा की पुकार पर इससे पहले कि कोई सखी कक्ष से बाहर निकलती, कुमारी का गंभीर स्वर गूँजा, "रुको! कोई वैद्यराज के पास नहीं जाएगा। और सखियों, तुम सब घबराओ नहीं, मेरी आँखों को कुछ नहीं हुआ है।"

​कुमारी के गंभीर और अधिकारपूर्ण लहजे को सुनकर सखियाँ ठिठक गईं।
​चंदा की आँखें भर आईं और भर्राई हुई आवाज़ में बोली, "क्या हुआ सखी? क्या हमारी कल की भूल से इतनी रुष्ट हो गई हो कि अब हमारा मुख भी नहीं देखोगी?"
​कुमारी ने झट से टटोलकर उसका हाथ थामा और उसे ढांढस बँधाते हुए बोलीं, "सखी, ऐसा कभी नहीं हो सकता। पर मुझसे यह भी न पूछो कि मैंने ऐसा क्यों किया है... मैं इसका कारण नहीं बता सकती। तुम सबको मेरी सौगंध है, मुझ पर यह भेद बताने या पट्टी उतारने के लिए दबाव न डालना!"

​सखियाँ हतप्रभ रह गईं। कुमारी ने आगे कहा, "अब तनिक स्नान और श्रृंगार में मेरी सहायता कर दो।" चंदा, माधवी, पुष्पा, कामिनी आदि सभी सखियाँ तुरंत उनकी सहायता में जुट गईं।

​अब कुमारी तो देख नहीं सकती थीं, इसी का लाभ उठाकर भामा धीरे से वहाँ से खिसक गई। कक्ष से निकलते ही वह तीर की तरह रानीमाँ के कक्ष की ओर भागी। वहाँ उन्हें न पाकर वह पाकशाला (रसोई) की ओर दौड़ी, क्योंकि महारानी महाराज और कुमारी का भोजन स्वयं बनाती थीं और अन्य व्यवस्था भी अपनी देखरेख में कराती थीं। भामा को पूर्ण विश्वास था कि वे वहीं मिलेंगी।

भामा ने पाकशाला की ओर जाती रानीमाँ को देखा, वहीं दूसरी ओर भामा के दौड़ने की धमक सुनकर रानीमाँ भी रुककर उसे देखने लगीं। भामा ने पास पहुँचकर हाँफते हुए पुकारा, “रानीमाँ!”
​महारानी रत्नगर्भा मुस्कुराकर बोलीं, “अरी बावली! तू ऐसे क्यों भागती रहती है, कब सुधरेगी? अरे... अरे, यह क्या? तू रो क्यों रही है? हमारी सुवर्णा ठीक तो है?”

​भामा साँसें संभालते और आँखें पोंछते हुए बोली, “रानीमाँ, जल्दी चलिए! न जाने कुमारी को क्या सूझी है... उन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है और हमारे बार-बार कहने पर भी उसे नहीं खोल रहीं।”

​इतना सुनते ही रानीमाँ व्याकुल होकर कुमारी के कक्ष की ओर चल दीं। वहाँ पहुँचीं तो सफाई कर रही सेविका फुलवा ने सूचना दी कि कुमारी और उनकी सखियाँ स्नानगृह जा चुकी हैं। रानी की दृष्टि कक्ष के उस कोने पर पड़ी जो कल रात झुलस गया था। उन्होंने फुलवा से कहा, “फुलवा, कक्ष का यह जला हुआ कोना तत्काल साफ करवाओ। कल रात हो गई थी और कुमारी को असुविधा न हो, इसलिए मैंने इसे ऐसे छोड़ दिया था, पर यह अब तक साफ क्यों नहीं हुआ?” फुलवा के इशारे पर एक अन्य सेविका सफाई में जुट गई।

​रानीमाँ कुमारी के पलंग पर बैठकर उनकी प्रतीक्षा करने लगीं, किंतु कुमारी से पूर्व महाराज वहाँ आ पहुँचे। किसी ने उन्हें भी सूचना दे दी थी कि भामा के कहने पर रानीमाँ अचानक कुमारी के कक्ष की ओर गई हैं। सेविकाओं के माध्यम से यह बात पलक झपकते पूरे महल में फैल चुकी थी कि कुमारी ने आँखों पर पट्टी बाँध ली है। महाराज रानी से कुछ पूछते, उससे पहले ही दूसरे द्वार से चंदा का हाथ थामे कुमारी ने प्रवेश किया। लाल किनारे वाले श्वेत वस्त्रों में कुमारी किसी हंसिनी के समान लग रही थीं, किंतु उनकी आँखों पर पट्टी देख महारानी ने हृदय पर हाथ रख लिया। महाराज ने झट आगे बढ़कर स्वयं कुमारी का हाथ थाम लिया और पुत्री को गले लगाकर बोले, “यह क्या हुआ मेरी लाड़ली! क्या तुम्हारी आँखों में कोई कष्ट है? मैं अभी वैद्यराज को बुलाता हूँ।”
​कुमारी बोलीं, “नहीं पिताजी! मेरी आँखों को कुछ नहीं हुआ है और वैद्यराज की कोई आवश्यकता नहीं है। आप उन्हें कष्ट न दें।”
​“लेकिन बेटी, ऐसा क्यों? यह अचानक आँखों पर पट्टी क्यों?” महाराज आगे कुछ न बोल सके, बस भावुक हो गए। पूरा कक्ष भावनाओं के बोझ से भारी हो उठा था।
तभी एक सेविका ने आकर सूचना दी, “महाराज एवं महारानी की जय हो! अतिथि-भवन से संदेश आया है कि कुलगुरु श्री सरस्वतीनंदन आचार्य जी आपसे तत्काल भेंट करना चाहते हैं। वे महारानी और कुमारी से भी मिलने के इच्छुक हैं।”
महाराज महारानी की ओर देखकर बोले, “कल उत्सव के पश्चात मैंने उन्हें अतिथि-भवन में ही ठहराया था। चलिए, पहले उनसे भेंट कर लें। चंदा, तुम हमारे बुलावे के बाद कुमारी को ले आना। (रानी से) चलिए, उन्हें अधिक प्रतीक्षा कराना उचित नहीं है।”

​रानी ने अपने आँसू पोंछे और सिर हिलाकर सहमत होते हुए बोलीं, “चलिए।”    
    'क्रमशः'

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[क्या आप सुवर्णा की इस यात्रा में नए हैं?
अगर आपने अभी तक इस शानदार गाथा की शुरुआत नहीं की है, तो यहीं से शुरू करें और पहले ही एपिसोड से इसके रहस्य का अनुभव करें:

👉 ['राजकुमारी सुवर्णा' - एपिसोड 1]
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​अगले भाग में: पूरे महल में सुवर्णा की आँखों पर बंधी पट्टी को लेकर हाहाकार मच गया है। माता-पिता व्याकुल हैं और सखियाँ हतप्रभ! ऐसे में कुलगुरु आचार्य सरस्वतीनंदन का अचानक आगमन क्या किसी बड़े रहस्य की ओर संकेत है? क्या वे सुवर्णा के इस कठिन संकल्प का सत्य समझ पाएंगे?
​जानने के लिए सुवर्णा के आगामी अंक पढ़ें...

✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जैमिनी, चैटजीपीटी  & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित

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