स्नेह का आतिथ्य
पिछले भाग में: आपने पढ़ा कि एक साधारण ग्रामीण महिला के मुख से अनजाने में निकले 'राजकुमारी स्वर्णप्रभा' के नाम ने कुमार विक्रमादित्य के मन में हलचल पैदा कर दी। जिज्ञासावश कुमार और ध्रुवदेव उस ग्रामीण परिवार के अतिथि बने, ताकि उस रहस्यमयी राजकुमारी और उनकी आँखों पर बँधी पट्टी के बारे में कुछ और जान सकें। अब आगे...
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बालिका के बुलावे पर कुमार और ध्रुवदेव, किसान के साथ भोजन के लिए बैठे। किसान की पत्नी ने बड़ी आत्मीयता और तत्परता से ताजी रोटियाँ बना-बनाकर उन्हें इतने प्रेम से खिलाया, मानो वे सचमुच उसके अपने भाई हों। उस सीमित संसाधनों वाले दंपत्ति ने अपने अगाध प्रेम और अपनत्व से भोजन की हर कमी को मानो मीलों दूर भगा दिया था।
कुमार के भ्रमण के दौरान घटी सुखद घटनाओं में यह भोजन भी एक अमूल्य संस्मरण बन गया। वे भोजन का स्वाद केवल जिह्वा से नहीं, बल्कि हृदय से ग्रहण कर रहे थे। वे सोच रहे थे कि संभवतः प्रजा का यही निस्वार्थ प्रेम वह असली संपत्ति है, जिसकी रक्षा के लिए राजपरिवार को सदैव तत्पर रहना चाहिए। कुमार मन ही मन मुस्कुरा रहे थे कि यह परिवार यह जानता भी नहीं कि वे स्वयं अपने राजकुमार को भोजन करा रहे हैं।
भोजन के दौरान कुमार के संकेत पर ध्रुवदेव ने पुनः विषय छेड़ा, "भाई मानसिंह! आपने यह नहीं बताया कि राजकुमारी ने अचानक आँखों पर पट्टी क्यों बाँध ली? मेरी समझ में नहीं आ रहा कि ऐसा क्या हुआ होगा जो उन्हें यह कठिन कदम उठाना पड़ा। मैंने सुना है कि चंदनगढ़ अत्यंत सुंदर एवं संपन्न राज्य है। तीन ओर पहाड़ियों से घिरा और सोबती नदी के तट पर बसा वहाँ की राजधानी 'सुवर्णपुर' का सौंदर्य अद्भुत है। कभी जाने का अवसर तो मिला नहीं, पर प्रशंसा बहुत सुनी है।"
मानसिंह उत्साह से बोला, "मित्र! आपकी बात सोलह आने सच है। आपको शायद यह भी ज्ञात होगा कि सुवर्णपुर का नाम 'सुवर्णपुर' इसीलिए पड़ा क्योंकि प्रातः सूर्योदय के समय पहाड़ की चोटियों पर जमी बर्फ सुनहरी होकर चमकती है। उस आभा से पूरा नगर स्वर्ण के समान दमक उठता है। आहा! क्या दिव्य दृश्य होता है! मैंने स्वयं अपनी आँखों से वह छटा देखी है और मैं उसे कभी भूल नहीं सकता। अवसर मिले तो आप भी जाकर अवश्य देखिएगा।"
ध्रुवदेव ने कहा, "अवश्य-अवश्य! पर ऐसी सुंदर नगरी की राजकुमारी का आँखों पर पट्टी बाँधना अब भी गले नहीं उतर रहा।"
मानसिंह स्वर धीमा कर बोला, "अब क्या कहें मित्रों! वास्तविक कारण तो विधाता जानें या वहाँ का राजपरिवार, किंतु अफवाहों का बाजार गर्म है। मेरी एक मुँहबोली बहन उसी राज्य में ब्याही है। पिछले दिनों जब मैं उसके देवर के विवाह में गया था, तभी सुना कि सुकुमारी राजकुमारी स्वर्णप्रभा ने कुछ वर्ष पूर्व अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। कहते हैं कि उन्होंने किसी को कोई कारण नहीं बताया और पूछने पर वे कुपित हो जाती हैं। संभव है कि राजपरिवार सत्य जानता हो, पर किसी कारणवश उसे गुप्त रखा गया हो। अब राजपरिवार की बातें हैं... बड़े लोग, बड़ी बातें!"
कुमार ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा, "अर्थात, सत्य या तो कोई नहीं जानता या फिर केवल राजपरिवार तक ही सीमित है।"
तभी मानसिंह की पत्नी तपाक से बोली, "भैया! परिवार वाले तो जानते ही होंगे, बस छिपा रहे होंगे। मैं तो यह सोच रही थी कि ऐसे में कुमारी का विवाह कैसे होगा? भला आँखों पर पट्टी बाँधी कन्या से कौन विवाह करेगा? सुना है बड़ी सुंदर और गुणवान हैं—बिल्कुल अपने नाम के अनुरूप, सोने जैसा दमकता रंग और कजरारे नैन! पर न जाने आँखें रहते हुए भी अंधा बनना क्यों चुन लिया? विधाता ही जानें क्या सच है। लो, अब यह खीर तो खाओ! पहली बार आए हो, संकोच मत करो।"
यह कहकर वह स्नेह से हँस पड़ी और कुमार भी मुस्कुरा दिए।
वह भोली ग्रामीण महिला बातें करते हुए बड़े प्रेम से उन्हें खिलाती रही और तृप्त होने के बाद ही उन्हें उठने दिया। दंपत्ति के अत्यधिक आग्रह पर कुमार और ध्रुवदेव ने वहाँ थोड़ा विश्राम किया और फिर विदा ली।
विदाई के समय वह स्त्री भावुक हो गई, मानो अपने सगे भाइयों को विदा कर रही हो। कुमार ने स्नेहवश अपनी माला और कुछ मुद्राएं भेंट करनी चाही, तो किसान और उसकी पत्नी ने सविनय मना कर दिया। किंतु जब कुमार ने हठ किया और यह कहा कि 'यह उनकी ओर से अपनी भांजी के लिए उपहार है', तब उन्होंने वे वस्तुएं स्वीकार कर लीं।
दोनों मित्र वहाँ से विदा लेकर घोड़ों पर सवार होकर आगे बढ़ गए। काफी देर तक तीव्र गति से चलने के बाद उन्होंने घोड़ों की चाल धीमी की और परस्पर संवाद करने लगे।
ध्रुवदेव ने पूछा, "क्या बात है मित्र! किस गहरी सोच में डूबे हो?"
कुमार बोले, "तुम तो जानते ही हो मित्र, मेरे जिज्ञासु स्वभाव को! अब राजकुमारी स्वर्णप्रभा का सच जाने बिना मैं चैन से रुक नहीं सकता।"
ध्रुवदेव खिलखिलाकर हँस पड़े और फिर हँसी रोककर बोले, "कुमार! आप चैन से रुके ही कहाँ हैं? मैं तो तभी समझ गया था जब आपने उस बालिका की माँ से प्रश्न किया था। परंतु यह तो सोचिए कि महाराज से इसकी अनुमति कैसे लेंगे? वे आपको ऐसे किसी अज्ञात कार्य के लिए चंदनगढ़ जाने की आज्ञा कदापि नहीं देंगे। मेरे विचार में आपको अब महल लौट जाना चाहिए और आपकी ओर से मैं राजकुमारी का सत्य पता लगाकर आता हूँ। महाराज के आखिरी पत्र में आपकी वापसी का आदेश था, अतः अब लौटना ही उचित है।"
कुमार दृढ़ता से बोले, "ऐसा मत कहो मित्र! अब मुझसे यों लौटा न जाएगा। मुझमें न केवल राजकुमारी का रहस्य जानने की, बल्कि चंदनगढ़ और उसकी राजधानी सुवर्णपुर देखने की भी तीव्र इच्छा जाग उठी है। इसके लिए तो मुझे स्वयं ही जाना होगा और तुम्हें मेरी सहायता करनी ही होगी। रही बात पिताश्री महाराज की, तो तुम भी कुछ उपाय सोचो कि उनसे अनुमति कैसे प्राप्त की जाए।"
ध्रुवदेव समझ गए कि अब कुमार का 'राजहठ' जाग चुका है और वे रुकने वाले नहीं। अब तक तो वे अपने ही राज्य की सीमा में थे, मगर अब मामला राज्य से बाहर जाने का था, अतः वे मौन होकर विचार करने लगे। कुमार भी गहन चिंतन में खोए रहे और दोनों के घोड़े धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर चलकर, रात्रि विश्राम हेतु वे एक धर्मशाला में रुके और वहाँ बैठकर योजना बनाने लगे कि चंदनगढ़ पहुँचने की अभिलाषा कैसे पूरी की जाए।
'क्रमशः'
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अगले भाग में: दोस्तों! इधर महाराज का उनके लिए वापसी का आदेश है तो दूसरी ओर स्वर्णप्रभा को लेकर बढ़ती जिज्ञासा। कुमार और ध्रुवदेव महाराज की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहेंगे परंतु राजकुमारी का रहस्य जाने बिना चैन भी नहीं है, तो कैसे रास्ता निकालेंगे हमारे दोनों चतुर नायक? कैसे बनेगी उनकी आगामी योजना? जानने के लिए 'सुवर्णा' के इस सफर का अगला रोमांचक अध्याय पढ़ना न भूलें!
अगला भाग यहाँ पढ़ें:
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