Saturday, April 25, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- १४

पिछले जीवन की गूँज...🥀


पिछले भाग में आपने पढ़ा: राजकुमारी स्वर्णप्रभा, जिन्हें स्नेह से सब 'सुवर्णा' कहते थे, उनके सत्रहवें जन्मोत्सव की खुशियाँ एक छोटी सी दुर्घटना से सहम गईं। ढलती रात की उस अग्नि ने सुवर्णा के भीतर पूर्वजन्म की सोई हुई अनुभूतियों को जगा दिया। 

अब आगे...

(अगर आपने अभी तक 'सुवर्णा' को पढ़ना शुरू नहीं किया और आप कहानी के नायक से परिचित नहीं हैं, तो ये है "राजकुमारी सुवर्णा" के पहले भाग की लिंक: )

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    रानीमाँ भी कुछ देर बाद कुमारी को सोने का निर्देश देकर अपने कक्ष की ओर चली गईं। एकांत होते ही कुमारी बिस्तर पर लेटकर दिनभर की स्मृतियों को संजोने लगी। फिर जैसे ही उन्होंने करवट बदली, उनकी दृष्टि कक्ष के उस कोने पर पड़ी जहाँ कुछ देर पहले आग की लपटें उठी थीं। 

    अचानक उन्हें एक विचित्र भय की अनुभूति हुई और वे उठकर बैठ गईं। मन हुआ कि किसी को पुकारें, परंतु फिर सोचा कि दिनभर की थकान के बाद सभी विश्राम कर रहे होंगे। अतः उन्होंने स्वयं उठकर जल पिया और पुनः लेट गईं, किंतु उस जले हुए पर्दे की ओर से अपना मुँह फेर लिया। कुछ देर प्रातःकाल के मंदिर के दृश्यों और महादेव का स्मरण किया, तो मन को किंचित शांति मिली। थकान अधिक थी, इसलिए शीघ्र ही वे गहरी निद्रा में मग्न हो गईं।

    ​नींद में उन्होंने स्वयं को एक घने और भयावह वन में पाया। चारों ओर सघन अंधकार था। तभी उन्हें एक हृदयविदारक चीख सुनाई दी— "नहीं! ऐसा मत करो!" फिर किसी के क्रंदन की ध्वनि आई। वे घबराकर चारों ओर देखने लगीं, पर कुछ दिखाई न दिया; यहाँ तक कि यह भी आभास न हुआ कि स्वर किस दिशा से आ रहा है। उन्होंने पुकारने की चेष्टा की— "सुनो! कोई है? क्या तुम्हें सहायता चाहिए?" किंतु उनके मुख से स्वर न फूटा, मानो शब्द कंठ में ही घुटकर रह गए हों।

​तभी पुनः आवाज़ आई— "नहीं! मैं तुम्हारे बिना नहीं रहूँगी... मैं भी इसी अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दूँगी... आह! हम फिर मिलेंगे... अवश्य मिलेंगे!" फिर एक चीख गूँजी और एकाएक 'भक्क' से चारों ओर अग्नि की लपटें धधक उठीं। राजकुमारी उस आग के घेरे में चीखना चाहती थीं, किंतु ऐसा प्रतीत हुआ मानो कंठ अवरुद्ध हो गया है। तभी सहसा उनकी आँख खुल गई। वे पसीने से तर-बतर थीं, श्वास की गति तीव्र थी और हृदय ज़ोरों से धड़क रहा था। उन्होंने व्याकुल होकर चारों ओर देखा।

​"यह क्या? मैं तो अपने ही कक्ष में हूँ... तो क्या वह स्वप्न था? आह! कितना पीड़ादायी स्वप्न! वे शब्द... वह चीख... सब अनजाने होकर भी सुने हुए से लगे, जैसे मेरे अपने ही भीतर कहीं गूँज रहे हों। क्या वह मैं ही थी? और वह कौन था, जिसके लिए उसने... या शायद मैंने प्राण दिए? यह सब क्या रहस्य है?"

​कुमारी देर तक करवटें बदलती रहीं और अंततः थकान ने उन्हें पुनः निद्रा की गोद में सुला दिया। और उनके बंद नेत्रों के समक्ष स्मृतियों का चित्रपट फिर से चल पड़ा... उन्होंने स्वयं को एक गौरैया के रूप में वृक्ष पर बैठे देखा। मानो छवियों की कोई प्राचीन पुस्तक खुल गई हो... दो किलोल करते पक्षी और उनके शावक... फिर एक पथिक का आगमन और अचानक 'गौरा' का धधकती अग्नि में कूद जाना!

    कुमारी की आँखें पुनः खुल गईं। कक्ष में चंदन की मंद सुगंध के साथ घुली जले हुए पर्दे की गंध मानो उनकी स्मृतियों के झीने पर्दे को और भी पारदर्शी बना रही थी। इस बार उन्हें सब स्मरण हो आया, किस प्रकार वे पूर्वजन्म में एक गौरैय्या थी और अपने पति गौरे के साथ सुखी जीवन जी रही थी, फिर एक भयानक सर्दी की रात्रि एक पथिक उनके जीवन में आया और उसके आतिथ्य में उन दोनों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। 

कुमारी देर तक स्वयं को वही गौरैया अनुभव कर अश्रु बहाती रहीं। फिर सहसा उन्हें यथार्थ का भान हुआ और वे स्वयं से संवाद करने लगीं, "यह क्या? मैं तो मनुष्य हूँ... और मैं उसके लिए रो रही हूँ जिसे इस जन्म में जानती तक नहीं! क्या वह भी मेरी ही भाँति कहीं जन्मा होगा?" (कुमारी बिस्तर से उठकर व्याकुलता में कक्ष में इधर-उधर टहलने लगीं)।

​"पूर्वजन्म में उसका स्वभाव अब भी मेरी स्मृतियों में अंकित है—सदैव परोपकार हेतु तत्पर और मुझसे वह अनन्य प्रेम! किंतु अपने कर्तव्य के लिए उस निष्ठुर ने क्षण भर में मुझे त्याग दिया... नहीं, मुझे नहीं त्यागा, बल्कि कर्तव्य को प्रेम से श्रेष्ठ माना। और मैंने? 

मैंने भी तो प्रेम हेतु अपना कर्तव्य निभाया। पर क्या वह अपने इस जन्म में भी वैसा ही होगा? साहसी, दयालु, कर्तव्यनिष्ठ और... और मुझसे प्रेम करने वाला?" (क्षण भर को कुमारी अपनी ही सोच पर लजा गईं)। "अवश्य वह वैसा ही होगा, आखिर मैं भी तो वैसी ही हूँ। पर मैं उसे ढूँढूँ कैसे? मुझे अपने पूर्वजन्म के अनुराग का पूर्ण स्मरण है, अब किसी अन्य से विवाह करना मेरे लिए असंभव है। विवाह तो मैं केवल उन्हीं से करूँगी अन्यथा कुमारी ही रहूँगी। 

क्या मैं माताजी को सब बता दूँ? वे पिताजी से कहकर मेरी सहायता कर सकती हैं... नहीं, मुझे लज्जा आएगी। और वे ढूँढेंगे भी कैसे? बात पूर्वजन्म की है, यदि खोजने का प्रयास किया तो कई छद्म 'गौरे' विवाह हेतु चले आएँगे।" (कुमारी अपनी ही कल्पना पर मुस्कुरा दीं, फिर पुनः गंभीर हो गईं)।

​"कुछ भी हो," (आँखें मूँदकर और शून्य में हाथ जोड़कर) "हे देवाधिदेव महादेव! इन आँखों से अब मैं केवल अपने उस पति को ही देखूँ। मेरा पाणिग्रहण उन्हीं पूर्वजन्म के स्वामी के साथ हो। मैंने आज तक जो भी आपकी अर्चना की है, उसका मुझे यही फल देना प्रभु! मेरी सेवा सफल करना, शिवशंभु...!"

​तभी जाने कुमारी के मन में क्या प्रेरणा हुई कि वे उठीं और वस्त्रागार से एक रेशमी वस्त्र निकालकर अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। पट्टी बाँधते ही उन्हें न जाने कैसी मानसिक शांति और सांत्वना मिली। वे पुनः शैय्या पर जाकर सो गईं। उसके बाद कोई दुःस्वप्न नहीं आया और वे सकुशल प्रातः काल जागीं।

'क्रमशः'

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इस एपीसोड को इंग्लिश में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

हिंदी में भाग-१५ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

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​अगले भाग में: प्रेम जो जन्मों की सीमा लांघ आया है! क्या सुवर्णा का यह कठिन संकल्प उसे उस अनजान प्रेमी से मिलाएगा जिसके लिए उसने कभी अग्नि को गले लगाया था? स्मृतियों का कोहरा तो छँट गया, पर क्या आँखों पर बंधी यह पट्टी सुवर्णा को उसके जन्मों पुराने प्रेम तक पहुँचा पाएगी?

​जानने के लिए सुवर्णा के आगामी अंक पढ़ें...

✍️'निःशब्द' की कलम से...🥀

🖌️तस्वीरें जैमिनी & चैटजीपीटी की सहायता से निर्मित

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