वर्षों की प्रतिक्षा
पिछले भाग में आपने पढ़ा: कुलगुरु ने सुवर्णा के पूर्वजन्म का वह सत्य उजागर कर दिया जिसने राजा-रानी को झकझोर दिया। राजकुमारी ने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है और संकल्प लिया है कि वे केवल अपने पूर्वजन्म के पति को ही देखेंगी। माता-पिता व्याकुल हैं, किंतु कुलगुरु इसे 'विधि का विधान' बताते हैं। अब आगे...
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कुछ क्षणों के मौन के पश्चात गुरुदेव पुनः बोले, “तुम्हारी कन्या को आज रात्रि स्वप्न में अपने पूर्वजन्म और उस जन्म के जीवनसाथी का स्मरण हो आया है। इसीलिए उसने महादेव को साक्षी मानकर अपने पूर्व-पति की प्रतीक्षा में अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली है। तुम दोनों को यही समझाने के लिए मैं कल से यहाँ रुका हुआ हूँ। उसकी परीक्षा कठिन है और वह बिना तुम्हारी सहायता के आगे नहीं बढ़ सकती। अतः मैं कहता हूँ—चिंता छोड़ो और उसकी सहायता करो।”
रानी व्याकुल होकर बोलीं, “किंतु गुरुदेव, उसका पति कौन होगा और वह कब आएगा? मेरी बच्ची भला ऐसे कब तक रहेगी?”
कुलगुरु ने सांत्वना देते हुए कहा, “धैर्य रखो पुत्री, और ईश्वर पर विश्वास भी। अब सब शुभ ही होगा। सुख और दुख का पहरा तो बदलता ही रहता है। भरोसा परिस्थितियों पर नहीं, अपनों पर और स्वयं पर करना चाहिए। तुम्हारी पुत्री हर परिस्थिति का सामना करने में सक्षम है, और फिर तुम भी तो उसके साथ हो।”
गुरुदेव की बात से रानी को किंचित आश्वासन मिला। महाराज मानवेन्द्रसिंह बोले, “आपकी आज्ञा और पुत्री का निर्णय हमें स्वीकारना ही होगा। कुमारी सदैव से हठी है, किंतु हम उसे समझाएँ भी नहीं, यह कैसे संभव है गुरुदेव!”
गुरुदेव बोले, “मैंने यह कब कहा कि कुछ न कहो? अवश्य समझाओ। पुत्री के ऐसे हठ पर माता-पिता का चिंतित होना स्वाभाविक है, किंतु अत्यधिक दबाव उसके मन पर तनाव उत्पन्न करेगा। अब कुमारी को बुलाओ, मैं स्वयं भी उसे समझाने का प्रयत्न करूँगा। यद्यपि होगा वही जो विधि का विधान है, तथापि प्रयत्न करना हमारा अनिवार्य धर्म है।”
महाराज ने संकेत से प्रहरी को बुलाया और कुमारी को सादर ले आने का आदेश दिया। प्रहरी तुरंत प्रस्थान कर गया।
कुछ समय तक कुलगुरु राज-दम्पति को इस नवीन परिस्थिति के प्रति धैर्य धारण करना समझाते रहे, तभी कुमारी के आगमन की आहट हुई। कुमारी ने लाल किनारी वाले श्वेत वस्त्र धारण कर रखे थे।
उनका हाथ थामे चंदा और पीछे अन्य सखियाँ भी कुलगुरु के दर्शन हेतु साथ आई थीं। कुमारी सहित सभी ने कुलगुरु को सविनय प्रणाम किया। फिर गुरुजी के संकेत पर, कुमारी को वहीं छोड़कर सखियाँ कक्ष से बाहर चली गईं।
गुरुदेव ने अनजान बनते हुए कुमारी से आँखों पर पट्टी बाँधने का कारण पूछा। उत्तर में कुमारी मौन रहीं और सिर झुका लिया। कुलगुरु ने उन्हें समझाया कि यह निर्णय जीवन में कितनी जटिलताएँ बढ़ाएगा और उनके माता-पिता को इससे कितना कष्ट होगा। कुमारी को अब तक भान हो चुका था कि यह मार्ग सरल नहीं है, और उनके पास किसी को देने के लिए कोई तार्किक उत्तर भी नहीं था। वे अपनी विवशता पर सिसक पड़ीं। पुत्री को रोता देख राजा-रानी ने घबराकर उसे हृदय से लगा लिया और सांत्वना दी।
महाराज भावुक होकर बोले, “पुत्री! तुमने जिस भी कारण से यह निर्णय किया है, हम इसमें तुम्हारे साथ हैं। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि अब तुमसे कोई इसका कारण नहीं पूछेगा। मैं चंदा, भामा और अन्य सखियों के माता-पिता से बात कर उनकी सहमति ले लूँगा, ताकि वे बारी-बारी से तुम्हारे साथ महल में रहकर तुम्हारी सहायता कर सकें। अब तुम शोक त्याग दो और अपने संकल्प के निर्वहन का प्रयत्न करो। मुझे बस इतना बता दो—क्या तुमने यह निर्णय आजीवन के लिए लिया है, या हम पुनः कभी तुम्हारी कजरारी आँखों में अपने लिए स्नेह छलकता देख सकेंगे?”
पिता के इस प्रश्न पर कुमारी भावुक होकर उनसे लिपट गईं और बोलीं, “पिताजी! मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं पुनः आपके, पूज्य गुरुदेव के और माताजी के दर्शन करूँगी... और सब कुछ पूर्ववत हो जाएगा। मुझे बस थोड़ा समय दें।” यह कहते हुए कुमारी ने गुरुदेव की ओर हाथ जोड़ लिए। गुरुदेव ने उठकर उनके सिर पर आशीष का हाथ रखा और बोले, “ऐसा ही होगा पुत्री! वह शुभ समय शीघ्र आए, यही मेरा आशीर्वाद है।”
तत्पश्चात, कुमारी को सखियों के साथ उनके भवन भेज दिया गया। राजा-रानी कुछ समय तक कुलगुरु से वार्ता करते रहे, फिर गुरुदेव ने अपने आश्रम प्रस्थान करने की इच्छा व्यक्त की। संध्या तक कुलगुरु महल से विदा हो गए। इधर, राजकुमारी स्वर्णप्रभा का जीवन अब पूर्णतः परिवर्तित हो चुका था।
कुछ समय तक माता-पिता ने राजकुमारी को समझाने का भरसक प्रयास किया, किंतु उन्होंने अपनी आँखों से पट्टी हटाना स्वीकार नहीं किया। अंततः, सबने विवश होकर उन्हें समझाना छोड़ दिया और इस आशा में समय व्यतीत करने लगे कि संभवतः किसी दिन राजकुमारी स्वयं ही इस बंधन को मुक्त कर देंगी। राजपरिवार और प्रजा ने भी धीरे-धीरे राजकुमारी के उस अनुपम मुख को आँखों पर बँधी पट्टी के साथ ही स्वीकार कर लिया।
राजकुमारी के माता-पिता और प्रिय सखियाँ नित्य प्रातःकाल इस आशा के साथ उनके कक्ष की ओर बढ़ते कि शायद आज उनकी प्रिय राजकुमारी की सुंदर आँखों से वह पर्दा हट गया होगा, किंतु उनकी यह आशा प्रतिदिन खंडित हो जाती। राजकुमारी बार-बार की पूछताछ से क्रोधित या दुखी न हों, इसलिए सभी ने प्रश्न करना छोड़ दिया; किंतु सबके मन में जिज्ञासा और निराशा की जड़ें गहरी होती गईं।
शीघ्र ही राजकुमारी के संबंध में यह चर्चा राज्य की सीमाओं को लाँघकर दूर-दूर तक फैल गई। लोग हतप्रभ थे कि इतनी रूपवती, बुद्धिमती और सबकी प्रिय राजकुमारी ने आखिर ऐसा आत्मघाती निर्णय क्यों लिया? वर्ष बीतते गए और संपूर्ण चंदनगढ़ सहित पड़ोसी राज्यों में भी स्वर्णप्रभा के अद्भुत सौंदर्य और उनकी आँखों पर बँधी उस रहस्यमयी पट्टी की चर्चाएँ होने लगीं। चूँकि वास्तविक सत्य से कोई परिचित नहीं था, इसलिए तरह-तरह के अनुमान और अफवाहें इस चर्चा का मुख्य विषय बन गईं।
यही अफवाहें उड़ते-उड़ते एक दिन सौवीरनगर तक जा पहुँचीं। जैसा कि हमने पूर्व में पढ़ा, यह कौतूहल राजकुमार विक्रमादित्य और उनके मित्र ध्रुवदेव के कानों तक भी पहुँचा। उनके मन में दो ही प्रश्न थे— ‘राजकुमारी स्वर्णप्रभा दिखती कैसी है?’ और ‘उसकी आँखों पर पट्टी क्यों है?’ इसी सत्य का अन्वेषण करने हेतु उन्होंने दृढ़ निश्चय किया।
कर्णसिंह के माध्यम से महाराज सुकर्मादित्य का अनुमति-पत्र पाकर, कुमार और ध्रुवदेव कुछ समय तक सौवीरनगर और चंदनगढ़ के सीमावर्ती वनों में आखेट कर वन्य पशुओं के उत्पात पर नियंत्रण करते रहे। जब प्रजा की समस्या का निवारण हो गया, तो वे अपने संकल्प पर आगे बढ़े। वे छद्म वेश धारण कर और स्वयं को पूर्णतः गुप्त रखते हुए चंदनगढ़ की सीमाओं में प्रविष्ट हुए और बिना समय गँवाए सीधे राजधानी सुवर्णपुर पहुँच गए।
'क्रमशः'
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अगले भाग में: वर्ष बीत गए, पर सुवर्णा की आँखों से वह पट्टी नहीं हटी! चन्दनगढ़ की सीमाओं को लाँघकर यह रहस्य अब पड़ोसी राज्य सौवीरनगर पहुँच चुका है। क्या राजकुमार विक्रमादित्य और उनके मित्र ध्रुवदेव इस रहस्यमयी पट्टी का सच जान पाएंगे? सुवर्णपुर की गलियों में छद्म वेश में पहुँचे इन अजनबियों का अगला कदम क्या होगा? क्या नवीन कौतुक दिखाएगा चंदनगढ़ की राजधानी स्वर्णपुर पहुँचे राजकुमार का कौतुहल?
जानने के लिए पढ़ते रहिए...
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[क्या आप सुवर्णा की इस यात्रा से नए जुड़े हैं?
अगर आपने अभी तक इस शानदार गाथा की शुरुआत नहीं की है, तो यहीं से शुरू करें और पहले ही एपिसोड से इसके रहस्य का अनुभव करें:
✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जैमिनी, चैटजीपीटी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित
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