रोचक गुप्तचर
भाग- १७ यहाँ पढ़ें
पिछले भाग में आपने पढ़ा: राजकुमारी सुवर्णा के रहस्य का अन्वेषण करने राजकुमार विक्रमादित्य और उनके चतुर मित्र ध्रुवदेव छद्म वेश में चंदनगढ़ की राजधानी सुवर्णपुर पहुँच चुके हैं। दोनों ने अपनी पहचान गुप्त रखने के लिए नए नाम धारण किए हैं। अब आगे...
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दोनों मित्र संध्या काल में सुवर्णपुर पहुँचकर सोबती नदी के तट पर विश्राम करने बैठे। उन्होंने अपने अश्वों को पानी पिलाया और लंबी लगाम से बाँधकर चरने हेतु छोड़ दिया, फिर स्वयं जीनपोश बिछाकर बैठ गए। वे ढलते सूर्य की स्वर्णिम आभा को निहारते हुए वार्तालाप करने लगे।
ध्रुवदेव बोले, "मित्र, बहुत लोगों से सुवर्णपुर की प्रातःकालीन सुंदरता का वर्णन सुना था, अब कल भोर में इसे अपनी आँखों से देखूँगा।"
कुमार ने टोकते हुए कहा, "अवश्य देख लेना! पर अब उस कार्य के विषय में भी तनिक चिंता कीजिए जिसके लिए हम यहाँ आए हैं—अर्थात राजकुमारी का रहस्य!"
ध्रुवदेव ने बनावटी झुँझलाहट दिखाते हुए कहा, "अरे मित्र! तनिक चैन की साँस तो लेने दीजिए। कोसों दूर से घोड़े दौड़ाते सुवर्णपुर तक चले आए हैं, क्या अब भी मन नहीं भरा? अब आ ही गए हैं, तो बिना कार्य सिद्ध किए लौटेंगे नहीं।"
कुमार मंद-मंद मुस्कुराए, "अच्छा-अच्छा, ऐसे डाँटोगे तो मैं अभी रो दूँगा! कहीं मेरे कोमल हृदय को ठेस लग गई तो लेने के देने पड़ जाएँगे।"
ध्रुवदेव ने आँखें नचाते हुए चुटकी ली, "हाय रे! आपकी यह राजकुमारियों सी नज़ाकत! आप क्या राजकुमारी को देखेंगे, वे ही आपको देख लेंगी। खैर, अब आप किसी धर्मशाला में विश्राम कीजिए और मुझे आज्ञा दीजिए। जिस प्रयोजन हेतु इतनी दूर आए हैं, उसमें अब विलंब कैसा!"
कुमार कुछ कहने ही वाले थे कि ध्रुवदेव उन्हें रोककर बोले, "नहीं, आप साथ नहीं चलेंगे। यह पराया राज्य है और हम यहाँ के तौर-तरीकों से अनभिज्ञ हैं। पहले मुझे यहाँ की थाह लेने दीजिए, तभी आगे की योजना सोची जाएगी। यह कार्य मैं अकेले ही बेहतर कर सकता हूँ। तब तक आप विश्राम करें और देखें कि आपका यह मित्र पलक झपकते क्या करिश्मा करता है।"
कुमार समझ गए कि इस समय तर्क करना व्यर्थ है, सो बोले, "ठीक है, जैसी तुम्हारी इच्छा। मार्ग में हमने जो 'शिवधाम' धर्मशाला देखी थी, मैं वहीं जा रहा हूँ। मैं वहाँ 'जीवनदास सिंह' के नाम से ठहरूँगा, और तुम 'मुँहबोला सिंह' बनकर अभी यहीं से निकलो। शीघ्र ही कोई शुभ समाचार लेकर मुझसे उसी धर्मशाला में मिलना।"
ये कहकर कुमार अपने अश्व पर सवार होकर प्रस्थान कर गए।
कुमार के जाने के बाद ध्रुवदेव उर्फ ‘मुँहबोला’ कुछ क्षण वहीं खड़े सोच विचार करते रहे, फिर एक गहरी श्वास ली और अपनी वेशभूषा को थोड़ा और साधारण किया ताकि वे सुदूर प्रदेश से आए एक जिज्ञासु पथिक लगें। वे नगर के सबसे व्यस्त चौराहे की ओर बढ़ गए, जहाँ संध्या के समय पनवाड़ियों और हलवाइयों की दुकानों पर लोगों का जमावड़ा लगा था। मुँहबोला ने देखा कि एक पनवाड़ी की दुकान के बाहर कुछ वृद्धों की टोली बैठी राह किनारे तंबाकू का सेवन कर रही थी।
मुँहबोला बोले, “राम-राम काका! तनिक हमहूँ इहाँ बैठ जाएं?”
एक वृद्ध ने उन्हें ऊपर से नीचे तक निहारा और कहा, “बैठो बिटवा, दूर देस से आए लगते हो... तंबाकू लोगे?”
मुँहबोला ने बड़े भोलेपन के साथ गंभीर मुखमुद्रा बनाई, “धनिबाद काका, हम नसा-पत्ती नहीं करते। ऊ का भवा कि एक बार बचपन मा छुपके तमाकू रगर रहे थे और हमरी महतारी देख लिहन। बस काका, ऊ सोटिए-सोटिए मारीं और हमका सौगंध खियाइन कि अब कबहुँ न खइबे। बस काका, ऊ दिन है और आज का दिन है, कान पकड़ लिए, फिर कबहूँ नाहीं छुए।”
मुँहबोला की इस भोली बात पर सारे बुजुर्ग ठहाका मारकर हँस पड़े।
एक बुजुर्ग बोले, “बउवा, महतारी हईं, गलत करत ना देख सकतिन। न खाओ, ई तमाकू कउनो नीक चीज थोड़े है।”
मुँहबोला ने गंभीरता से सिर हिलाते हुए बात आगे बढ़ाई, “ई नगर बहुत मनभावन है काका, आजै पहुंचे और देखके दिल खुस हो गइल। जेतना सुने रहे, ओसे सुन्नर पाए। बस इहाँ के राजपरिवार की अजीब लीला सुनी... लेकिन विस्वास ना होत है काका।”
एक अन्य बुजुर्ग ने बात काटी, “अरे कहै द भइया, लोग-मनई त कछु कहबै करत हन। हमार राजा देउता हउन। हमन सबे कई पीढ़ी से देखत हईं। अब रही बात परिवार के त कछु समस्या है, पर ई त सभई परिवार मा होत है। ऊ बड़े लोग हन, त समस्या भी बड़ी बाटे।”
मुँहबोला ने एक गहरी श्वास भरी, “त ई सच है कि कुमारी जी पट्टी बान्ह लिहनी है, और केहू के कारण ना जनउनी (बताया)?”
वृद्ध बोला, “बात त सही है। राजा के पता होखी, लेकिन बड़ी बात होई त सभै काहें बतइहन? का पता बात एतना बड़ी होई कि हमन छोट मनई के समझिए म न आई।”
तभी एक अन्य वृद्ध ने अपना ज्ञान साझा किया, “महल मा काम करे वाले बतियावत हन, त हमहूँ सभे सुने कि राजा के गुरु आए रहन, उहै कुमारी के कउनो खास तपसिया करावत हउवन। काहें कि ओही दिन से कुमारी जी पट्टी बान्ही हैं, अउर राजा-रानी जी सभै कुछ पूछै से मना किहे हन।”
एक वृद्ध ने शंका जताई, “अरे, ई सब कहानी है खाली, भला अइसनो कउनो तपसिया होखेले?”
दूसरे ने उसे डाँटा, “काहें ना होखेले? कुलगुरु हउवन, कुछ सोचले होइहन। जब बुद्धि कम होखे त ज्यादा सवाल पूछि-पूछि खोभार (पेचीदा) ना किहल जाला। अगर कछु बिसेस बात न होखत त अइसन होत का? ऊ सब पढ़ा-लिखा, गियानी बुद्धिमान लोग हन, कछु त सोचले-जनले होइहन। अब बकबाद न करिहा।”
मुँहबोला ने सोचा कि काफी कुछ पता चल गया है। इन बुजुर्गों का अनुभव और राय कीमती है, अब बात रोकनी चाहिए वर्ना कहीं ये आपस में ही न झगड़ बैठें। सो वे बोले, “जाए दें काका, बड़े लोग बड़ी बात... कबो सच पता लगबे करी। ई बतावें काका, इहाँ कहूँ कछु बिसेस खाए बदे मिलेला का? तनिक भूख मालुम होय रही।”
एक वृद्ध हँसते हुए बोले, “बिटवा, ऊ जउन पियर (पीला) छप्पर देखत हउवा, ऊ सहिदेव हलवाई की दुकान हउवे। उनकर बनावल लस्सी-जलेबी खा ला, त फिर जिनगी भर न भुलइबा। पेट भरि जाई अलग, और मन खुस हो जाई। जा... जा... नाहीं त खतम हो जाई।”
अब जलेबी का नाम हो और मुँहबोला उर्फ ध्रुवदेव रुक जाएँ, यह तो संभव ही न था। वे बुजुर्गों से विदा लेकर सहिदेव हलवाई की दुकान की ओर चल दिए। वहां भी उन्होंने अपनी युक्ति से कई और महत्वपूर्ण कड़ियाँ जोड़ लीं—जैसे राजकुमारी का बचपन से ही अग्नि के प्रति भय, उनकी सत्रहवीं वर्षगाँठ पर घटी वह अग्निकांड की घटना और उसके ठीक अगले दिन आँखों पर पट्टी का बंधना। जब उन्हें लगा कि उनके तरकश में पर्याप्त जानकारियाँ जमा हो गई हैं और कुमार उनके न लौटने पर चिंतित हो रहे होंगे, तो वे 'शिवधाम' धर्मशाला की ओर चल पड़े। लौटते समय वे एक कुल्हड़ लस्सी और ताजी जलेबियाँ कुमार के लिए भी साथ लेते गए।
'क्रमशः'
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अगले भाग में: 'मुँहबोला' ने अपनी बातों के जाल में सुवर्णपुर के बुजुर्गों को तो फंसा लिया, पर क्या सहिदेव हलवाई की दुकान से मिली कड़ियाँ राजकुमारी के असली सच तक पहुँचा पाएंगी? 'जीवनदास' और 'मुँहबोला' की यह गुप्त खोज उन्हें महल के किन बंद दरवाजों तक ले जाएगी?
जानने के लिए पढ़ते रहिए...
[अगर आपने अभी तक 'सुवर्णा' को पढ़ना शुरू नहीं किया है, तो ये है "राजकुमारी सुवर्णा" के पहले भाग की लिंक। अब ब्लॉग पर ईमेल सबस्क्राइब बटन अवेलेबल है, सो नए एपीसोड्स के अपडेट पाने के लिए सबस्क्राइब करना न भूलें... धन्यवाद...🙏💕]
✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित
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