Tuesday, May 12, 2026

"आप किस लेबल से पहचाने जाते हैं?"

आपका लेबल...?

मित्रों! आज आप लोगों को एक छोटी सी कहानी सुनाती हूँ, जो मैंने कहीं पढ़ी थी, कहानी का शीर्षक है... 'इंसान खो गए'....

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"एक दार्शनिक महोदय थे। वो अक्सर वह चिंतन में लीन रहते थे। लेकिन जब बोलते थे, तो बड़ी गहरी बात कहते थे। इससे लोग उनका बहुत मान-सम्मान किया करते थे। लेकिन कभी-कभी उनकी बातें अजीब-सी होती थीं, और मजे की बात ये कि वो स्वयं भी अपनी ही बातों पर अपनी हंसी नहीं रोक पाते थे।

एक दिन लोगों ने देखा कि दार्शनिक महोदय हाथ में भरी दोपहर में जलती लालटेन लिए कहीं जा रहे थे। दोपहर का समय था सो धूप निकली हुई थी। चारों और प्रकाश फैल रहा था। ऐसे में जलती लालटेन हाथ में लेकर चलने में क्या तुक थी?

उस दृश्य को देखकर लोग मारे हंसी से लोट-पोट हो गए। पर दार्शनिक तो गंभीर भाव से आगे बढ़ते जा रहे थे। 

एक आदमी से न रहा गया। उसने दार्शनिक से पूछा... "महोदय! आप दिन में लालटेन लेकर कहां जा रहे हैं?"

दार्शनिक ने उसकी ओर देखा, और बोले.... “कुछ खो गया है उसे खोज रहा हूँ।“

जिज्ञासा में उस आदमी ने पूछा... “क्या खो गया है आपका?”

दार्शनिक ने उसी लहजे में कहा कि... 'इंसान'। मैं उसी की तलाश कर रहा हूँ।“

उस समय तक और भी कई लोग वहां पहुंच गए। दार्शनिक की बात सुनकर एक साथ बोले... “महोदय आप यह क्या कह रहे हैं? क्या हम इंसान नहीं हैं?”

दार्शिनिक बोले... “ नहीं आप इंसान नहीं हैं?”

लोगों ने कहा... “तो हम लोग क्या हैं?”
दार्शनिक ने कहा... “नहीं, तुम सब इंसान नहीं तुममें से कोई व्यापारी है, कोई इंजीनियर, कोई शिक्षक है, कोई हिन्दू, कोई मुस्लिम है। पर अफसोस कि तुममे से कोई भी इंसान नहीं है।' इंसान तो वह होता है, जो सबको समान समझता है, समको प्यार करता है। जरा अपने दिल को टटोलकर देखो मेरी बात में कितनी सच्चाई है।“
लोग लाजवाब हो गए।"

'अज्ञात कथा लेखक के प्रति आभार सहित एवं संपादित'
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दोस्तों!
वर्तमान समय में यह बात अक्षरशः सत्य प्रतीत होती है। कहाँ खो गए हैं इंसान? आज पहचान के नाम पर सबने खुद पर ऐसे 'लेबल' लगा लिए हैं कि उनके पीछे का मनुष्य कहीं ओझल हो गया है।

​बशीर बद्र का यह शेर आज की हकीकत बयान करता है:

​"घरों पे नाम थे, नामों के साथ ओहदे थे,
बहुत तलाश किया, कोई आदमी ना मिला॥"

​सच है न? धर्म, जाति और लिंग से लेकर अमीर-गरीब और काले-गोरे तक—हमने मनुष्यों को इतनी तरह बाँट दिया है कि 'इंसान' कहलाने में अब किसी की दिलचस्पी ही नहीं रही।

​अब दर्द भी वही महसूस होता है जो अपनी पहचान से जुड़ा हो। मनुष्य बनकर मनुष्य की पीड़ा समझने की अब किसी को फुर्सत ही नहीं। विडंबना देखिए, आज हम दूसरों का दर्द बाँटने के बजाय, उन्हें बढ़ाने के तरीके ढूँढते हैं। हर 'पहचान' वाले को लगता है कि उसके दुःख का कारण 'दूसरी पहचान' वाला है। उदाहरण के लिए, स्त्रियों को अपने सारे दुःखों का कारण पुरुष और पुरुषों को अपनी सारी समस्याओं की जड़ स्त्रियाँ दिखती हैं।

​दरअसल, हर कोई अपने दुःख का दोष वहीं तक ढूँढता है जहाँ कोई अन्य मनुष्य अपराधी मिल जाए। उसके बाद शुरू होती है—बदले और सबक की न खत्म होने वाली लड़ाई। जबकि केवल 'पहचान' दोषी नहीं हो सकती। 
जैसे यदि घर गिर जाए, तो दोष ईंटों का नहीं बल्कि उन्हें जोड़ने वाले 'मसाले' का होता है। उसी तरह समाज टूटने लगे तो दोषी धर्म, जाति या लिंग जैसी ऊपरी पहचान नहीं होती, बल्कि समाज को जोड़ने वाले भरोसे, सौहार्द्र, संवेदनशीलता, प्रेम और सहनशीलता जैसे 'मानवीय मसालों' की कमी होती है।

​आज समस्या ही गलत जगह देखी जा रही है, तो समाधान भला कैसे होगा? नतीजा यह कि हाथों में मरहम कम और स्वार्थ व असंवेदनशीलता के 'नश्तर' अधिक दिखने लगे हैं।

​मुझे सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का मार्ग देने वाला हमारा महान देश भी इसी संकीर्णता की चपेट में दिखता है। हमारे पूर्वजों की आत्मा निश्चित ही हमसे निराश होती होगी।

​विभाजन की विडंबना देखिए:
पहले दुनिया बँटी और देश बने, फिर देश प्रदेशों में, प्रदेश गाँवों में, गाँव मुहल्लों में और अंततः मुहल्ले चारदीवारियों में सिमट गए। और अब... अब तो रिश्तों में बँटवारे हो रहे हैं। माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी—हर रूप में संपत्ति, अधिकार और जिम्मेदारियाँ बाँटी जा रही हैं। पहले समाज 'साझेदारी' जोड़ता था, अब 'बँटवारे का हिसाब' करता है।

​दिलचस्प यह है कि यह सारा बँटवारा 'प्रबंधन और सहूलियत' के बहाने शुरू हुआ था, परंतु नीयत स्वार्थ और हिसाब-किताब की भेंट चढ़ गई। अगर देखभाल की सच्ची नीयत होती, तो इंसान बिना किसी सरहद के दूसरे इंसान के प्रति वफादार होता।

​राजनीति का 'ट्रैप':
धर्म, जाति और सामाजिक व्यवस्था आत्मोत्कर्ष के लिए बने थे, पर अब ये एक 'राजनीतिक जाल' (Trap) हैं। वर्तमान राजनीति एक खूँखार और क्रूर 'मकड़ी' की तरह है, जो आपकी सुख-शांति को निगलकर अपना पेट भरना चाहती है। जैसे ही आप इसके फैलाए हुए 'धर्म-जाति' की बहस के जाले में कदम रखते हैं, आप उस विषैली राजनीति के शिकार बन जाते हैं और आपको हर ओर सिर्फ 'विरोधी' नज़र आने लगते हैं।

​अतीत का बोझ:
इस जाल को अतीत की बुरी घटनाओं की राल से चिपचिपा और आकर्षक बनाया जाता है। झूठी-सच्ची कड़वी कहानियाँ सुनाकर आपको इस जाल के करीब लाया जाता है। कुछ लोग अतीत की कड़वाहट को आज के जीवन में 'चुग्गे' (चारे) की तरह इस्तेमाल करते हैं।
ज़रा रुककर सोचिए, अतीत की चुटकी भर सच्चाई का कीचड़ पैरों में लपेटकर घसीटते हुए आप कब तक वर्तमान को मैला करते रहेंगे? आखिर आप भी तो एक हाथ से 'वर्तमान' के रूप में एक 'अतीत' रच रहे हैं और दूसरे हाथ में आपके भविष्य की जिम्मेदारी है।
अगर आप स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं, तो अपनी आने वाली पीढ़ी को इस 'सड़ांध' से बचाइए। समाज की इस उलटी दिशा को सीधा करना आपकी जिम्मेदारी है। अच्छा बनने के लिए 'अच्छे वक्त' का इंतज़ार मत कीजिए; बुरा वक्त ही तो 'अच्छे व्यक्तित्व' को गढ़ता है। समय हमने बिगाड़ा है, तो ठीक भी हमें ही करना होगा।
​मेरे शब्दों में:

​“आइए इक चराग़ उम्मीदों का जलाया जाए,
ठोकरों से नन्हें पाँवों को बचाया जाए।
आँधियों ने जब हार नहीं मानी है तो फिर,
'निःशब्द' रौशन दिलों को बुझने से बचाया जाए॥”
तो मित्रों! कभी ऊपरी पहचान से जुड़े स्वार्थ, कटुता, असहनशीलता के नश्तरों को रखकर कभी प्रेम, सहनशीलता, भरोसे और अपनत्व जैसे मरहम भी लगाकर देखिए, उम्मीद है कुछ तो बदलेगा।

इसी के साथ ये लेख समाप्त करती हूँ और आपके लिए एक सवाल छोड़ती हूँ, आज जब फुर्सत से बैठिएगा तो खुद से एक सवाल कीजिएगा... "आपका लेबल क्या है? आप खुद को किस लेबल से पहचानते हैं?" बस इतना ही।

[मेरी द्विभाषी(हिंदी/English) कविता 'नीम के पत्तों से सहेजी गई यादें/Dried Neem Leaves and Blue Ink यहाँ पढ़ें, साथ में ब्लाग से जुड़े अपडेट्स पाने और ढ़ेरों कहानियां, लेख, कविताएं पढ़ने के लिए ईमेल सबस्क्राइब करना न भूलें।]
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धन्यवाद, आपका दिन शुभ हो...🙏💕

✍️निःशब्द की कलम से...💕
🖌️तस्वीरें जेमिनी, नैनो बनाना के सहयोग से निर्मित...🌷

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