Saturday, May 9, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- १९

पहली झलक और अज्ञात अनुभूति

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पिछले भाग में आपने पढ़ा: राजकुमार 'जीवनदास' और उनके चतुर मित्र 'मुँहबोला' छद्म वेश में सुवर्णपुर की गलियों से राजकुमारी के रहस्य की कड़ियाँ जुटा रहे हैं। मुँहबोला को ज्ञात हुआ है कि राजकुमारी नित्य भोर में सोबती नदी के तट पर स्थित शिव मंदिर आती हैं। अब आगे...

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    ​उधर कुमार 'शिवधाम' धर्मशाला में अपने छद्म भेष और 'जीवनदास' नाम से एक कक्ष लेकर ठहरे हुए थे। उन्होंने मित्र ध्रुवदेव की प्रतीक्षा में भोजन नहीं किया था। ध्रुवदेव को देर हो गई थी, इसलिए रात के भोजन का समय तो निकल चुका था, किंतु ध्रुवदेव द्वारा लाई गई लस्सी और जलेबी की लाजवाब जोड़ी ने उनकी क्षुधा और प्रतीक्षा, दोनों को तृप्त कर दिया।

​जलेबी का आनंद लेते हुए कुमार ने पूछा, "कहिए मित्र, क्या-क्या गुप्त सूचनाएँ जुटा लाए?"

​ध्रुवदेव मुस्कुराकर बोले, "कुमार! बहुत कुछ! मैंने कहा था न कि आवश्यकता भर का विवरण तो ले ही आऊंगा। अब सुनिए, मैं अपने उदर में लस्सी-जलेबी के साथ-साथ आपके काम की कितनी बातें भरकर लाया हूँ!" फिर ध्रुवदेव ने वृद्धों की चौपाल से लेकर हलवाई की दुकान तक का सारा ब्योरा विस्तार से सुना दिया।

​अंत में वे बोले, "इन सबके अतिरिक्त एक विशेष बात यह पता चली है कि कुमारी नित्य प्रातः सोबती नदी के तट पर स्थित शिव मंदिर में पूजन हेतु आती हैं। वहाँ भक्तों की भीड़ होती है, तो हम उन्हें दूर से देख भी सकते हैं।"

​यह सुनकर कुमार मन ही मन प्रसन्न हुए और बोले, "यह तो उत्तम है! कल हम भी सोबती के तट पर चलेंगे। सुवर्णपुर की वह प्रसिद्ध प्रातःकालीन आभा भी तो देखनी है।"

​ध्रुवदेव ने चुटकी ली, "सुवर्णपुर को तो मैं देखूँगा, आप तो बस कुमारी को ही निहार लेना! मैं उनके सौंदर्य की बड़ी प्रशंसा सुन आया हूँ। चलिए अब विश्राम कीजिए, क्योंकि समय पर सोएंगे, तभी तो भोर में जागेंगे।"

​थोड़ी-बहुत इधर-उधर की बातें करने के बाद दोनों मित्र सोने का प्रयास करने लगे। थके हुए ध्रुवदेव तो लेटते ही निद्रा के आगोश में समा गए, किंतु कुमार देर रात तक जागते रहे।

वे अपनी कल्पना के कैनवास पर राजकुमारी स्वर्णप्रभा की छवि उकेरने का प्रयास कर रहे थे।

प्रातः काल की प्रथम किरण के साथ ध्रुवदेव जागे और कुमार को भी जगाया। दोनों मित्रों ने सोबती के शीतल जल में स्नान किया और शिव मंदिर की ओर प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि कुमारी के आगमन में अभी कुछ समय शेष है, सो उन्होंने जन-साधारण के साथ महादेव का दर्शन-पूजन किया और मंदिर के बाहरी प्रांगण में आ गए।

​वे मंदिर परिसर से आसपास की प्राकृतिक छटा निहारने लगे। मंदिर नगर से कुछ ऊँचाई पर स्थित था, जहाँ से संपूर्ण सुवर्णपुर का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था। स्थानीय लोगों से ज्ञात हुआ कि राजपरिवार इसी देवालय में आराध्य की उपासना करता है और यहाँ अक्सर उत्सवों का आयोजन होता रहता है। मंदिर की भव्यता देखते ही बनती थी; वह विशाल उद्यान और बागों से घिरा हुआ था। आगंतुक साधु-संतों के लिए वहाँ विश्राम कक्ष बने थे और महाराज मानवेन्द्रसिंह की ओर से निरंतर अन्न-सेवा हेतु एक विशाल भोजशाला भी संचालित थी। उस ऊँचाई से ऐसा प्रतीत होता था मानो राजा वहीं से अपनी प्रजा का कुशल-क्षेम देख रहे हों।

सूर्योदय हो चुका था। सूर्य की सुनहरी किरणें सुवर्णपुर पर इस प्रकार बिखर रही थीं, मानो आकाश से स्वर्ण-वर्षा हो रही हो। कुमार ने देखा कि नगरी अत्यंत सुव्यवस्थित और कलात्मक ढंग से बसी है। मार्गों के किनारे छायादार वृक्षों और पुष्पों की कतारें मन मोह रही थीं। वास्तव में, पर्वतों की ओट में बसा सुवर्णपुर ऐसा लगता था मानो पर्वत उसके मुकुट हों।

​मंदिर के ऊंचे चबूतरे पर खड़े दोनों मित्र कभी पर्वत शिखरों को देखते, तो कभी नगरी की स्वर्णिम आभा को। तभी अचानक वातावरण में एक हलचल सी मच गई। 'कुमारी की सवारी आ गई है' का शोर चहुँ ओर गूँजने लगा। ऊँचाई पर होने के कारण कुमार और ध्रुवदेव न केवल भीड़ के धक्के से बच गए, बल्कि उन्हें कुमारी का स्पष्ट दर्शन भी सुलभ था। वे एकाग्र होकर नीचे देखने लगे।

​देखते ही देखते, दो अश्वों वाला रथ मंदिर के द्वार से तनिक पूर्व रुक गया। रथ से पहले दो परिचारिकाएँ उतरीं, फिर उनका सहारा लेकर कुमारी स्वर्णप्रभा बाहर आईं। कुमार ने देखा—आसमानी और पीत वर्ण के रेशमी वस्त्रों में लिपटी कुमारी किसी मलमल में आवेष्टित रत्न सी दमक रही थीं। नख-शिख सौंदर्य की प्रतिमूर्ति राजकुमारी की आँखों पर बंधी वह रेशमी पट्टी देखकर कुमार के हृदय में एक अनजानी वेदना उभर आई, जिसका कारण वे स्वयं भी न समझ सके।

आसपास के जनसमूह में कानाफूसी होने लगी। किसी ने कहा, "आँखों पर पट्टी बाँधकर भला कौन महादेव के दर्शन को आता है?"

तभी अन्य ने उत्तर दिया, "मैंने सुना है कि मंदिर के गर्भगृह में पूजन के क्षणों में वे पट्टी हटा देती हैं, और पूजन समाप्त होते ही पुनः धारण कर लेती हैं।"

कोई अन्य बोला, "जो भी हो, इसका प्रयोजन समझ से परे है।"

​लोगों के मध्य जिज्ञासाओं का ज्वार उमड़ रहा था, जबकि कुछ लोग मौन रहकर श्रद्धा भाव से उन्हें निहारते रहे। कुमारी सखियों के साथ मंदिर के भीतर प्रविष्ट हुईं, पट बंद हुए और कुछ समय पश्चात वे बाहर आकर पुनः रथ में आरूढ़ होकर लौट गईं। कुमार इस बीच मानो किसी अन्य लोक में थे। ध्रुवदेव ने अपने में खोए मित्र के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें कल्पनालोक से यथार्थ में वापस लाए। कुमार को मौन देख ध्रुवदेव ने भी कुछ नहीं कहा, क्योंकि वे स्वयं भी एक विचित्र अनुभूति से गुजर रहे थे। दोनों मित्र शांत भाव से धर्मशाला की ओर लौट आए।

शिव मंदिर से धर्मशाला लौटने तक कुमार अपने आप में ही खोए रहे। ध्रुवदेव निरंतर कुछ न कुछ बोलते रहे, परंतु कुमार की मौनता न टूटी। जब ध्रुवदेव ने देखा कि यह चुप्पी लंबी खिंच रही है, तो वे कुमार को टोकते हुए बोले, "मित्र! आप तो प्रथम दर्शन में ही इतने गहरे डूब गए कि मुझे ही भूल गए? अरे भाई! मैं भी यहीं हूँ, हाड़-मांस का जीता-जागता इंसान!"

​यह सुनकर कुमार धीरे से मुस्कुरा दिए, पर बोले कुछ नहीं। वे पलंग पर निढाल होकर दीवार को एकटक ताकते रहे।

​ध्रुवदेव ने मुँह बिचकाते हुए कहा, "उँह! अब यह क्या बात हुई? प्रतीत होता है कि कुमारी की आँखों की भाँति हमारे कुमार के मुख पर भी पट्टी बंध गई है। बड़ा अनर्थ हुआ! यदि जानता कि आप ऐसे 'मौन-व्रत' धारण कर लेंगे, तो मैं इधर का रुख ही न करता। देखिए जरा, हम यहाँ बड़बड़ाए जा रहे हैं और आप हैं कि मंद-मंद मुस्कुराए जा रहे हैं।"

​जब कुमार की ओर से फिर भी कोई प्रतिक्रिया न मिली, तो ध्रुवदेव झल्लाकर बोले, "ठीक है, आप अपना मौन जारी रखिए, मैं जाकर नगर-भ्रमण करता हूँ। यहाँ दीवारें ताकना मेरे वश की बात नहीं।"

​ध्रुवदेव वहाँ से प्रस्थान कर गए और कुमार तो मानो चाहते ही यही थे कि उन्हें एकांत मिले।

'क्रमशः'

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  अगले भाग में: "आसमानी और पीत वर्ण के वस्त्रों में लिपटी... एक रत्न सी दमकती सुवर्णा!" पहली ही झलक में राजकुमार के हृदय में वह कैसी अनजानी वेदना उठी थी जिसने उन्हें अपने बालसखा के आगे भी मौन कर दिया? क्या रंग लाएगा यह मौन?

​जानने के लिए पढ़ते रहिए...

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