स्वतंत्रता की सीमा: अधिकार और अनुशासन का द्वंद्व
आज़ादी का आकर्षण और यथार्थ:
आज के दौर में ‘स्वतंत्रता’, ‘आजादी’ या ‘Freedom’—ये शब्द हर आयु वर्ग के व्यक्ति को मंत्रमुग्ध किए हुए हैं। विडंबना यह है कि आज हर व्यक्ति को हर नियम और हर मर्यादा से मुक्ति चाहिए। इस प्रवृत्ति का गहरा असर हमारी भाषा, वेशभूषा और व्यवहार—यानी जीवन के हर आयाम में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। दुर्भाग्यवश, इसके दुष्प्रभाव भी समाज में चारों ओर व्याप्त हैं।
अक्सर स्थिति यह होती है कि तनिक भी रोक-टोक हुई नहीं कि ‘स्वतंत्रता के हनन’ का शोर मचने लगता है। व्यक्ति हो या संगठन, स्वतंत्रता के नाम पर वास्तव में आज सबको ‘स्वेच्छाचारिता’ (Licentiousness) चाहिए। कभी ‘इच्छा की स्वतंत्रता’ का मुखौटा, तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की आड़।
निरंकुश स्वतंत्रता का भ्रम:
आश्चर्य तो इस बात पर है कि इन तथाकथित स्वतंत्रता-प्रेमियों पर अपनी व्यक्तिगत आजादी का जुनून इस कदर हावी है कि उन्हें इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं कि उनकी स्वतंत्रता कब दूसरे व्यक्ति की समस्या, घुटन या पीड़ा का कारण बन रही है। उनकी ‘आजादी’ इतनी निरंकुश हो चुकी है कि वे इस पर विचार करना भी आवश्यक नहीं समझते।
इन ‘स्वतंत्रता-सैलानियों’ का तर्क बड़ा विचित्र है—उनका मानना है कि यदि किसी को उनकी स्वतंत्रता से असुविधा हो रही है, तो यह उस व्यक्ति की अपनी वैचारिक संकीर्णता है। जो उनकी उच्छृंखलता (Unruliness) का स्वागत नहीं कर पा रहा, वह उनकी नज़र में ‘पिछड़ा’, ‘रूढ़िवादी’ या ‘संकुचित सोच’ वाला है। अब इन ‘क्रांतिकारियों’ ने मानो यह उत्तरदायित्व ओढ़ लिया है कि वे अपनी स्वच्छंदता की लहर में दूसरों की पसंद, मान्यता और सोच को उखाड़ फेंकें। वे अपनी ‘नियमविहीन आज़ादी’ के मोह में यह भूल जाते हैं कि यदि उन्हें नियम तोड़ने की आज़ादी चाहिए, तो किसी दूसरे व्यक्ति को अपने नियमों के पालन की भी उतनी ही आज़ादी है।
वास्तव में, आज अधिकांश लोग स्वतंत्रता का अर्थ ‘नियम-विहीन स्वेच्छाचारी जीवन’ समझने लगे हैं—एक ऐसा जीवन जो केवल व्यक्तिगत स्वार्थ और मनमर्जी पर आधारित हो, जिसे कुतर्कों की चाशनी में डुबोकर ‘उचित’ सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। किंतु यथार्थ यही है कि ऐसी निरंकुश स्वतंत्रता न तो व्यावहारिक रूप से संभव है और न ही सामाजिक रूप से उचित।
स्वतंत्रता का विकृत रूप: रील, अश्लीलता और उच्छृंखलता
आजकल ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का सबसे भयावह रूप सोशल मीडिया के ‘रील कल्चर’ में देखने को मिलता है। आज़ादी के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अश्लील हरकतें करना और ‘कंटेंट’ बनाने के लिए किसी भी हद तक गिर जाना और अनावश्यक रूप से अपनी या दूसरों की जान खतरे में डालना अब सामान्य होता जा रहा है। इन तथाकथित ‘क्रिएटर्स’ को इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं है कि उनके आसपास बच्चे, बुजुर्ग या वे स्त्री-पुरुष भी मौजूद हैं जो आज भी मर्यादा और संस्कारों को महत्व देते हैं।
प्रश्न यह उठता है कि इनकी ‘स्वतंत्रता’ ने इन्हें यह अधिकार कैसे दे दिया कि ये दूसरों की भावनाओं, उनकी निजता और सार्वजनिक लज्जा (Public Decency) का सरेआम उल्लंघन करें? क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ समाज को खतरनाक स्टंटबाज़ी और उद्दंड कार्यों के लिए उकसाना है?
स्वतंत्र का वास्तविक अर्थ है― स्व+तंत्र, अर्थात स्वयं के बनाए नियमों या अनुशासन में जीना... न कि मनमर्जी या उच्छृंखलता से व्यवहार करना। विडंबना देखिए, आज ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ ‘नग्नता’ और ‘अशिष्टता’ से जोड़ दिया गया है। ‘स्व-तंत्रता’ शब्द में ‘स्व’ (स्वयं) तो बहुत हावी है, किंतु ‘तंत्र’ (नियम/प्रणाली) का पूरी तरह लोप हो चुका है। जहाँ ‘तंत्र’ यानी अनुशासन नहीं होता, वहाँ स्वतंत्रता केवल एक ‘जंगली स्वच्छंदता’ बनकर रह जाती है। यदि आपकी आज़ादी दूसरों के सम्मान और सुरक्षा को चोट पहुँचाती है, तो वह अधिकार नहीं, बल्कि एक सामाजिक अपराध है।
स्वतंत्रता की लक्ष्मण रेखा: छड़ी और नाक का किस्सा
नियम वे अदृश्य सीमाएँ हैं जो यह निर्धारित करती हैं कि एक व्यक्ति की आज़ादी दूसरे की आज़ादी से कब और कहाँ टकरा रही है। आखिर कहाँ पर जाकर व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त होनी चाहिए? इस संदर्भ में वर्षों पहले पढ़ा एक दिलचस्प किस्सा याद आता है…
एक सज्जन सड़क पर अपनी छड़ी हवा में गोल-गोल घुमाते हुए मगन होकर चले जा रहे थे। तभी उनके पीछे चल रहे एक अन्य राहगीर को उस छड़ी से असुविधा होने लगी। चोट लगने के डर से पीछे वाले सज्जन ने विनम्रतापूर्वक उन्हें टोका— “महाशय, आपके छड़ी घुमाने से दूसरों को चोट लग सकती है, कृपया थोड़ा संभलकर चलें।”
परंतु आगे वाले सज्जन अहंकार से भर गए और बोले— “मैं एक आज़ाद देश का आज़ाद और सम्मानित नागरिक हूँ। यह सरकारी सड़क है और मैं यहाँ अपनी छड़ी जैसे चाहूँ वैसे घुमा सकता हूँ। आप मुझे रोकने वाले कौन होते हैं? यह मेरी स्वतंत्रता का हनन है!”
पीछे चल रहे सज्जन ने उन्हें बहुत समझाया, पर वे अपनी लापरवाही पर अड़े रहे। अंततः, जब समझाने के सारे प्रयास विफल हो गए, तो पीछे वाले व्यक्ति ने बड़ी शांति से कहा— “महोदय, आप निःसंदेह एक आज़ाद नागरिक हैं और आपको अपनी छड़ी घुमाने का पूरा अधिकार है, परंतु याद रखिये… आपकी आज़ादी की सीमा वहीं समाप्त हो जाती है, जहाँ से मेरी नाक की सीमा प्रारंभ होती है!”
निष्कर्ष: अति सर्वत्र वर्जयेत्
वास्तव में, स्वतंत्रता की यही एकमात्र व्यावहारिक परिभाषा है। आज़ादी असीम नहीं हो सकती। हमारे विद्वानों ने भी कहा है— “अति सर्वत्र वर्जयेत्” (किसी भी चीज़ की अति वर्जित है)। यदि आपकी आज़ादी दूसरों की भावनाओं, निजता या सम्मान की लक्ष्मण रेखा को लांघती है, तो वह ‘स्वतंत्रता’ नहीं, अपितु आपकी स्वार्थ से भरी ‘उच्छृंखलता’ है।
स्वतंत्रता कभी ‘असभ्यता’ का पर्याय नहीं हो सकती; वह तो सबके कल्याण (Collective Well-being) की भावना में निहित है। एक की स्वतंत्रता का दूसरे के अधिकार क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश होते ही वह ‘अधिकार’ से ‘अपराध’ में बदल जाती है।
याद रखिये, स्वयं ‘स्वतंत्रता’ भी सदैव ‘स्वतंत्र’ नहीं रह सकती—उसे भी अनुशासन की परिधि में रहना पड़ता है। आप स्वतंत्र अवश्य हैं, किंतु सिर्फ आप ही स्वतंत्र नहीं हैं। मेरी स्वतंत्रता मेरा ‘अधिकार’ है, लेकिन केवल मेरी ही स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, यह मेरा ‘दुराग्रह’ होगा। स्वतंत्रता किससे? कैसी? और कितनी? इन सवालों का जवाब केवल एक ही है—स्वतंत्रता असीम नहीं हो सकती, उसे सामाजिक उत्तरदायित्व के मोड़ पर रुकना ही पड़ता है।
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["आप किस लेबल से पहचाने जाते हैं?" — यह सिर्फ एक लेख नहीं बल्कि एक आईना है, जिसमें हमें किसी और को नहीं अपितु खुद को देखना है।👀
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