अफ़वाहों का बाज़ार और हमारी समझदारी:
किसी समय एक जंगल में गधों का एक झुंड रहता था। वे पूरी आज़ादी से रहते, भरपेट खाते-पीते और मौज करते थे।
एक बार एक लोमड़ी को शरारत सूझी। उसने मुँह लटकाकर गधों से कहा— “मैं चिंता के मारे मरी जा रही हूँ और तुम लोग यहाँ मौज कर रहे हो! क्या तुम्हें पता है कि कितना बड़ा संकट सिर पर आ पहुँचा है?”
गधों ने घबराकर पूछा— “दीदी, भला क्या बात हुई? बात तो बताओ!”
लोमड़ी ने फुसफुसाते हुए कहा— "मैंने अपने कानों से सुना और आँखों से देखा है। मछलियों ने एक बहुत बड़ी सेना बना ली है और वे अब तुम्हारे ऊपर चढ़ाई करने वाली हैं। भला उनके सामने तुम्हारा टिक पाना कैसे संभव होगा?”
गधे असमंजस में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि व्यर्थ में जान गँवाने से क्या लाभ? चलो, कहीं और चलते हैं। आनन-फानन में जंगल छोड़कर वे गाँव की ओर भाग निकले।
घबराए हुए गधों को देखकर गाँव के धोबी ने उनका खूब 'सत्कार' किया। उन्हें अपने छप्पर में आश्रय दिया और गले में रस्सी डालकर खूँटे से बाँधते हुए कहा— “डरने की ज़रा भी ज़रूरत नहीं है। मछलियों से मैं निपट लूँगा। तुम मेरे बाड़े में निर्भय होकर रहो, बस बदले में मेरा थोड़ा-सा बोझ ढोना पड़ेगा।”
गधों की घबराहट तो दूर हो गई, पर उसकी कीमत उन्हें बहुत महँगी चुकानी पड़ी।
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मित्रों! ज़ाहिर है यह एक काल्पनिक कहानी है। परंतु आज के समय में भी समाज में ऐसे कई लोग होते हैं जो इन गधों की तरह चालाक लोमड़ी जैसे लोगों की बातों में आकर हाँके जाते हैं और फिर धोबी जैसे किसी धूर्त के जाल में जा फँसते हैं।
आज के हालात और हमारी ज़िम्मेदारी:
दोस्तों! अक्सर देखा जाता है कि लोग मक्कार लोमड़ियों जैसी अफ़वाहों के चक्कर में आकर और काल्पनिक आशंकाओं पर विश्वास करके अनावश्यक भगदड़ मचा देते हैं। ऐसी चालाक लोमड़ियाँ कभी अपने स्वार्थ के लिए, तो कभी महज़ मजे के लिए झूठी-सच्ची समस्या को गढ़ती हैं। समाज में व्यर्थ के डर को बढ़ाकर पेश करने के आनंद के लिए वे इस तरह के भ्रम फैलाती रहती हैं।
उदाहरण के लिए, कुछ समय पहले नमक के महँगे होने की अफ़वाह उड़ी थी और देखते ही देखते लोग 'गधे' बन गए—चार सौ रुपये किलो नमक ऐसे खरीदा गया जैसे वह नमक नहीं, बल्कि 'संजीवनी बूटी' हो।
मैं पूछती हूँ, आख़िर ईश्वर ने हमें बुद्धि और समझ क्या इस तरह ठगे जाने के लिए दी है? हम सभी के पास आँख, कान और अक्ल है, पर ज़रूरत है तो बस उसका सही समय पर इस्तेमाल करने की। अन्यथा गधा बनते देर न लगेगी।
इसलिए किसी भी अफ़वाह पर तत्काल यक़ीन न करें। रुकें, सोचें और संभव हो तो किसी विश्वसनीय व्यक्ति से सलाह लें। जल्दबाजी आपको समझदार नहीं, बल्कि चालाक लोगों का शिकार साबित करती है।
गैस की किल्लत और व्यावहारिक समाधान:
आजकल गैस की किल्लत को लेकर भी ऐसा ही पैनिक फैलाया जा रहा है। समस्या है, बेशक है, पर पैनिक होकर आप समस्या को समाप्त नहीं करते, बल्कि उसे और बढ़ा देते हैं। धैर्य रखें और आसपास मौजूद साधनों का सहारा लें।
जैसे, मेरे परिवार ने कोरोना के समय से ही इंडक्शन चूल्हे का विकल्प अपनाया और धीरे-धीरे घर के बर्तन भी उसी के अनुरूप (Flat Base) कर लिए। आज तवे के अलावा हमारे पास हर चीज़ का बेहतरीन विकल्प मौजूद है।
शांत रहें, समस्या के साथ-साथ समाधान पर भी विचार करें। ज़रूरी नहीं कि समाधान वैसा ही हो जैसा आप चाहते हैं, पर समाधान होता ज़रूर है। बस उसे ढूँढने की सही दृष्टि चाहिए। इसलिए कृपया, न अफ़वाह फैलाएँ और न ही सुनी-सुनाई बातों पर बिना जाँच-पड़ताल किए भरोसा करें।
एक छोटी और मित्रवत सलाह:
दोस्तों, जैसा कि मैंने लेख में ज़िक्र किया, गैस की किल्लत जैसी समस्याओं के बीच इंडक्शन चूल्हा एक बेहतरीन और समझदारी भरा विकल्प हो सकता है। रसोई के काम को आसान और आधुनिक बनाने के लिए आप अपनी ज़रूरत, बजट और समझ के अनुसार एक अच्छा इंडक्शन चूल्हा चुन सकते हैं जो कम बिजली खपत (जैसे 1600W) वाला और भरोसेमंद हो।
अपनी ज़रूरत के अनुसार ही सही फ़ैसला लें। खुश रहें, सुरक्षित रहें!
आपका दिन शुभ हो...🙏
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अगला सुझाव: क्या आपने कभी 'त्रियाचरित' का नाम सुना है? क्या होता है जब एक किसान अपनी पत्नी से इसका अर्थ पूछता है? आज ही पढ़िये ये ग्रामीण लोककथा... 👉 'त्रियाचरित जाने नहि कोई'...😅
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✍️ निःशब्द की कलम से 💕
🖌️ तस्वीर जेमिनी एआई की सहायता से निर्मित...🌷
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