Sunday, May 31, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- २६

पूर्वजन्म की स्मृति और प्रतिज्ञा

​पिछले भाग में:
सोबती नदी के शांत तट पर, सुवर्णा और कुसुमा एकांत में थे। कुसुमा के स्नेहपूर्ण आग्रह और अटूट विश्वास ने अंततः राजकुमारी के हृदय के कपाट खोल दिए। सुवर्णा ने वह रहस्य बताने का निर्णय लिया, जिसे उन्होंने वर्षों से अपने भीतर संजोकर रखा था....।

🥀°°°°🥀°°°°🥀°°°°🥀°°°°🥀
​कुमारी ने हृदय का बोझ हल्का करते हुए कहना आरंभ किया, "आज तुझ पर विश्वास कर रही हूँ, कुसुमा! वास्तव में, यह रहस्य मेरे पूर्वजन्म से संबंधित है।"

कुसुमा बने कुमार अत्यंत एकाग्रता से सुनने लगे। कुमारी ने आगे कहा, "अपने सत्रहवें जन्मोत्सव की रात्रि मुझे स्वप्न में अपने पूर्वजन्म का बोध हुआ। मैं पूर्वजन्म में एक गौरैया थी और एक वृक्ष पर अपने प्रियतम गौरे के साथ सुखपूर्वक रहती थी। हम अपने संसार में बहुत सुखी थे, किंतु फिर एक दिन..." (वियोग की व्यथा का पूर्ण वृत्तांत, पाठक अगर भूल गए हैं तो राजकुमारी सुवर्णा का पहला भाग पढ़ें)।
​कथा पूर्ण कर कुमारी ने सजल नेत्रों से कहा, "बस कुसुमा, जब मेरी निद्रा भंग हुई, मैंने स्वयं के भीतर एक विचित्र परिवर्तन अनुभव किया। मेरी आत्मा इस संसार को पुनः देखने की इच्छुक न रही। मैं इस जगत को केवल अपने उसी पूर्वजन्म के स्वामी के साथ ही देखना चाहती हूँ। किंतु भला यह सत्य मैं किसी को कैसे समझाती? इसी कारण यह सब हुआ और मैंने आँखों पर पट्टी बाँध ली।" इतना कहकर कुमारी मौन हो गईं।(कुमारी के स्वप्न और पट्टी बाँधने के वृत्तांत को दुबारा पढ़ने के लिए भाग-१४)
​इधर कुसुमा बने कुमार की स्थिति अकथनीय थी। उनके मस्तिष्क में वे धुंधले चित्र कौंधने लगे जो उन्हें अक्सर स्वप्न में दिखाई देते थे—वे सदैव गौरैया के उस जोड़े को देखते थे, जिसमें से एक अग्नि की भेंट चढ़ जाता था और उस दृश्य को देख कुमार भयंकर उलझन के साथ जाग जाते थे। कुमार विस्मय और करुणा से कुमारी को निहारते रहे, उनकी आँखें भर आईं। उन्हें साक्षात प्रतीति हुई कि वे दोनों ही उस जन्म के बिछड़े हुए परिंदे हैं।

​जब कुसुमा काफी देर तक कुछ न बोली, तो कुमारी ने टोका, "कुसुमा! क्या हुआ? तू कुछ कहती क्यों नहीं?"

​कुसुमा ने रुँधे हुए गले से कहा, "क्या कहूँ कुमारी जी! आपकी कथा ने मेरे हृदय को स्पर्श कर लिया है। मेरी ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आपका आपके पूर्वजन्म के पति से शीघ्र मिलन हो।"

​कुमारी ने एक ठंडी आह भरी, "काश ऐसा ही हो! न जाने वे कहाँ होंगे और उन्हें यह सब स्मरण भी होगा या नहीं।"
​कुमारी पुनः मौन हो गई। कुछ देर के सन्नाटे के बाद कुसुमा ने संयत होकर कहा, "कुमारी जी, जो प्रेम आपको अपने होने की अनुभूति करा सकता है वह अवश्य ही आपके पूर्वजन्म के पति को भी आपके निकट ले आएगा। लेकिन सखी! अगर आपके पूर्वजन्म के पति आपसे मिले तो आप उन्हें पहचानेंगी कैसे? और वे कैसे सिद्ध करेंगे कि वे ही आपके पूर्वजन्म के पति हैं? मुझे तो सोचकर ही उलझन हो रही है कि आप और वे कैसे पुनः मिलेंगे।"

​कुमारी बोलीं, "ये उलझन तो मुझे भी है कुसुमा! मैं नहीं जानती कि ये सब कैसे संभव होगा? किंतु मुझे पूर्ण विश्वास है कि ये अवश्य होगा। मेरा निर्मल मन मुझे सांत्वना देता है कि हमारे पूर्वजन्म का प्रेम मरा नहीं है और जैसे मेरा हृदय प्रतीक्षा कर रहा है, किसी का हृदय अवश्य मुझे ढूँढ रहा होगा। और कभी-कभी तो मुझे लगता है कि वह समय शीघ्र ही आएगा जब मैं पुनः अपने पति के संग संसार देखूँगी। और हाँ तुझे भी।" कहकर कुमारी धीरे से हँसी।

​कुसुमा बने कुमार उन्हें अपलक देख रहे थे और अनायास उनके मुख पर भी मुस्कान आ गई। कुमारी की तसल्ली के लिए अक्सर साथ रहने वाले को उनका हाथ थामे रहना होता था और इस समय अनायास ही वे दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे थे।

​कुछ क्षण बाद अँधेरा फैलता देख कुसुमा बने कुमार ने गहरी साँस ली और धीरे से बोले, "कुमारी जी, अँधेरा हो रहा है हमें अब महल की ओर प्रस्थान करना चाहिए। सब हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"

​कुमारी भी उठ खड़ी हुईं और कुसुमा का हाथ थामे-थामे कहा, "चलो सखी! पर अपना वचन याद रखना।"
​कुसुमा ने पुनः उसी रहस्यमयी दृढ़ता से दोहराया, "अवश्य कुमारी जी! 'कुसुमा' अपना वचन कभी नहीं तोड़ेगी।"

​तत्पश्चात कुमारी, कुसुमा का हाथ थामकर महल की ओर लौट चलीं। महल लौटकर जब कुमारी अपनी अन्य सखियों से घिर गईं, तब कुसुमा बने कुमार उनकी अनुमति लेकर अपने निर्धारित कक्ष में चले आए। वहाँ पहुँचकर कुमार दीर्घकाल तक विचारों के द्वंद्व में उलझे रहे।

​यह जानकर कि कुमारी के साथ उनका संबंध इस जन्म का नहीं बल्कि पूर्वजन्म का है, कुमार के हृदय में एक अपूर्व प्रसन्नता का संचार हो रहा था। जब उन्होंने अपने अंतर्मन को टटोला, तो उन्हें आभास हुआ कि अनजाने में ही सही, वे भी कुमारी के प्रति अनुराग रखने लगे हैं। अब यक्ष प्रश्न यह था कि ऐसा क्या किया जाए जिससे उन्हें कुमारी का आजीवन सान्निध्य प्राप्त हो? वे कुमारी से विवाह तो करना चाहते थे, किंतु कुमारी को इसके लिए तैयार कैसे करें? कुमारी का अटूट प्रण था कि वे केवल अपने पूर्वजन्म के स्वामी को ही स्वीकार करेंगी, और इसके लिए कुमार को स्वयं को वह 'गौरा' सिद्ध करना था। अंततः, गहन चिंतन के पश्चात उन्होंने आज रात ध्रुवदेव से भेंट करने का निर्णय लिया।

​शेष दिन किसी प्रकार व्यतीत कर, रात्रि के अंधकार में कुमार महल के एक प्रहरी का भेष धरकर, सबकी दृष्टि से बचते हुए नियत स्थान पर ध्रुवदेव से मिले। कुमार को सुरक्षित देखकर ध्रुवदेव अत्यंत हर्षित हुए। दोनों मित्र आलिंगनबद्ध हुए और साथ बैठकर वार्तालाप करने लगे।

​ध्रुवदेव ने कुमार की असामान्य चुप्पी को भाँप लिया और बोले, "क्या बात है मित्र! आप कुछ चिंतित प्रतीत हो रहे हैं? क्या कोई विशेष घटना घटी है?"
कुमार ने गंभीर स्वर में कहा, "हाँ मित्र! मुझे कुमारी की आँखों की पट्टी का रहस्य ज्ञात हो गया है।"

​यह सुनते ही ध्रुवदेव का मुखमंडल चमक उठा, "अद्भुत! यह तो अत्यंत हर्ष का विषय है। अंततः आप सफल रहे! किंतु आप इतने गंभीर क्यों हैं? क्या मैं जान सकता हूँ कि वह रहस्य क्या है?"

​कुमार, ध्रुवदेव पर अटूट विश्वास करते थे, अतः उन्होंने संक्षेप में समस्त वृत्तांत सुना दिया। ध्रुवदेव विस्मय से बोले, "किंतु कुमार! यह सब मुझे बताकर क्या आपने कुमारी को दिया अपना वचन भंग नहीं कर दिया?"

​कुमार के अधरों पर एक चतुर मुस्कान उभर आई, वे बोले, "मित्र! तुमने मेरे शब्दों पर ध्यान नहीं दिया। मैंने वचन देते समय कहा था— 'कुसुमा आपको वचन देती है कुमारी जी, कि आपका भेद कुसुमा कभी किसी से न कहेगी।' समझे?"
'क्रमशः'
🥀°°°°🥀°°°°🥀°°°°🥀°°°°🥀

​अगले भाग में:
राजकुमार विक्रमादित्य ने अपनी चतुराई से वचन की मर्यादा भी रख ली और रहस्य भी साझा कर दिया। किंतु अब सबसे बड़ी चुनौती शेष है—वे स्वयं को सुवर्णा का वही पूर्वजन्म का 'गौरा' कैसे सिद्ध करेंगे? क्या ध्रुवदेव के पास कोई ऐसी योजना है जो दो जन्मों के इन बिछड़े हुए प्रेमियों को मिला सके?


✍️‘निःशब्द’ की कलम से..🥀
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी  & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित

No comments:

Post a Comment

🌷It Does Make a Difference🌷