विश्वास की कसौटी
पिछले भाग में:
कुसुमा की मर्मस्पर्शी लोककथा ने राजकुमारी के हृदय को झकझोर दिया था। उपवन की उस संगीतमय शाम के बाद, सुवर्णा और कुसुमा के बीच एक अनकही आत्मीयता पनपने लगी थी, जो धीरे-धीरे अटूट विश्वास में बदल रही थी।
अब तक कुमारी, कुसुमा के विचारों, व्यवहार और उसके निश्छल स्वभाव से अत्यधिक प्रभावित हो चुकी थीं। यद्यपि वे स्वयं भी इस रहस्य को नहीं समझ पा रही थीं कि कुसुमा का साथ उन्हें अचानक इतना प्रिय और विश्वसनीय क्यों लगने लगा है, किंतु इस बढ़ती आत्मीयता ने कुसुमा रूपी कुमार को कुमारी का मन जीतने का स्वर्णिम अवसर दे दिया।
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चंदनगढ़ के प्रासाद से सोबती नदी अधिक दूर न थी। महल से नदी तट तक एक पूर्णतः सुरक्षित और आरक्षित मार्ग बना था, जिससे राजपरिवार की स्त्रियाँ निर्भय होकर स्नान हेतु जा सकती थीं। उस क्षेत्र में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था।
ग्रीष्म ऋतु का एक दिन था, जब कुमारी अपनी सखियों के साथ सोबती नदी पर स्नान हेतु गईं। कुसुमा ने सदैव की भाँति कोई युक्ति बनाई और सबसे पृथक हो गई; वह तभी लौटी जब शेष सभी सखियाँ स्नान आदि से निवृत्त हो चुकी थीं। ज्येष्ठ की तपती दुपहरिया के बावजूद नदी तट के सघन वृक्षों की कुंज में सुखद शीतलता व्याप्त थी।
सभी सखियाँ वृक्षों की घनी छाया में नदी की सीढ़ियों पर विश्राम कर रही थीं, तभी चंदा ने आग्रह किया, "सखी! अब हमें वापस लौटना चाहिए। बहुत विलंब हो गया है और महल में अभी कई आवश्यक कार्य शेष हैं।"
कुमारी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "चंदा! तुम अन्य सखियों को लेकर महल लौट जाओ, मैं अभी यहीं रुकना चाहती हूँ। मेरे साथ कुसुमा रहेगी; उसकी उपस्थिति में मुझे किसी प्रकार का भय नहीं है।"
चंदा तनिक झिझकी, तो कुसुमा आत्मविश्वास से बोली, "चिंता मत करो चंदा! मेरे रहते कुमारी पूर्णतः सुरक्षित रहेंगी। यह देखो, मैं सदैव की भाँति अपनी कटार साथ लाई हूँ।" (उसने अपनी कमर में छिपी सूक्ष्म कटार की झलक दिखाई)। "यदि कुमारी पर कोई संकट आया, तो मैं शत्रु के प्राण लेने में क्षण भर का विलंब नहीं करूँगी। मेरी युद्ध कला से तो तुम परिचित ही हो... बस तुम प्रहरियों को उचित दूरी पर घेरा बनाने का निर्देश दे दो, शेष दायित्व मुझ पर छोड़ दो।"
कुमारी की स्पष्ट सहमति और कुसुमा का दृढ़ संकल्प देखकर चंदा ने सुरक्षा की व्यवस्था की और भारी मन से वहाँ से प्रस्थान कर गई।
यह प्रथम अवसर नहीं था जब कुमारी, कुसुमा के साथ एकांत में थीं; किंतु आज अस्वस्थता के कारण भामा भी उनके पीछे न आ सकी थी, और चतुर कुमार को यह भली-भाँति ज्ञात था।
सखियों के प्रस्थान के पश्चात कुमारी, कुसुमा का हाथ थामे एक प्रस्तर की शिला पर जा बैठीं। कुछ क्षणों की निःशब्दता के बाद, जब कुमारी को एकाकीपन का आभास हुआ, तो उन्होंने हाथ फैलाकर टटोलते हुए पुकारा, "कुसुमा... कुसुमा! तू कहाँ है?"
कुसुमा ने तत्काल उत्तर दिया, "मैं यहीं हूँ कुमारी जी! घबराइये नहीं, मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली।"
कुमारी ने पूछा, "आज तू इतनी मौन क्यों है कुसुमा?"
कुसुमा बोली, "कुछ नहीं कुमारी जी, मैं तो बस इसलिए चुप थी कि कदाचित आप एकांत का आनंद लेना चाहती हों। सो मैं भी अपने भाग्य पर विचार करने लगी। आप बताइए, क्या आपको किसी वस्तु की आवश्यकता है?"
कुमारी ने एक लंबी श्वास भरी, "आवश्यकता तो कुछ नहीं... बस आज मन कुछ अशांत और विचित्र सा हो रहा है।"
कुसुमा ने अवसर देखते हुए कहा, "वह तो स्वाभाविक है। देखिए, कितना सुहावना मौसम है और यह स्थान भी कितना मनोरम है! किंतु क्षमा कीजिएगा, आपकी आँखों की यह पट्टी आपको इस समस्त सौंदर्य से वंचित कर देती है। यदि मैं आपकी स्थान पर होती, तो अपनी आँखों पर कभी पट्टी न बाँधती... कदापि नहीं!"
कुमारी के अधरों पर एक रहस्यमयी मुस्कान दौड़ गई। वे बोलीं, "तुझे मेरी इस पट्टी के रहस्य का क्या बोध? बिना जाने ही बस प्रलाप किए जा रही है।"
कुसुमा ने बनावटी रोष दिखाते हुए कहा, "मुझे जानना भी नहीं है! मैं तो बस इतना जानती हूँ कि किसी भी कारणवश मैं स्वयं को इस सुरम्य संसार को देखने से वंचित नहीं करती। मैं तो यह सोचती हूँ कि आपकी करुणा ने मुझे नया जीवन दिया, किंतु आपने आज तक मुझे देखा तक नहीं!"
कुमारी खिलखिलाकर हँस पड़ीं, "कुसुमा... मेरी भोली कुसुमा! तू रुष्ट मत हो, मैं मन की आँखों से तेरा स्वरूप देख लेती हूँ। अच्छा, एक बात बता, क्या तुझे अपने माता-पिता की स्मृति नहीं आती?"
कुसुमा ने उत्तर दिया, "आती तो है, किंतु आप सबके सान्निध्य में मैं सब विस्मृत कर देती हूँ।" फिर कुछ क्षण शांत रहकर वह बोली, "कुमारी जी, यदि आप अन्यथा न लें तो एक प्रश्न पूछूँ?"
कुमारी मुस्कुराते हुए बोलीं, "यही न, कि इस पट्टी का कारण क्या है?"
कुसुमा ने बात घुमाते हुए कहा, "नहीं, बस इतना बता दीजिए कि क्या कभी आप इस मुई पट्टी को अपने सुंदर मुख से हटाएँगी?"
कुमारी कुछ देर मौन रहीं, तो कुसुमा ने भी अपनी वाणी को विराम दिया। उस गहन सन्नाटे को तोड़ते हुए अंततः कुमारी स्वयं ही बोलीं, "कुसुमा, क्या तू सच में यह नहीं जानना चाहती कि मैंने अपनी आँखों पर यह पट्टी क्यों बाँधी है?"
कुसुमा ने अत्यंत सहजता से कहा, "जिज्ञासा तो सबको है, सो मुझे भी है। किंतु जो भेद आपने अपनी बाल्यावस्था की सखियों को नहीं बताया, वह मुझ जैसी नवागंतुक को क्यों बतायेंगी? बस यही सोचकर मैं नहीं पूछती। और दूसरा कारण यह भी है कि मैं आपका मन नहीं दुखाना चाहती। आपने निश्चित ही किसी तुच्छ कारण से इतना कठोर निर्णय नहीं लिया होगा। बस, कभी-कभी आपको देखकर मन में यही विचार आ जाते हैं।"
कुमारी ने एक लंबी श्वास भरी और अत्यंत कोमल स्वर में कहा, "कुसुमा! मैं अक्सर यह भेद बताने से डरती हूँ कि कोई मुझे समझेगा नहीं... किंतु आज तुझसे सब कह देने का मन हो रहा है। क्या तू वचन देती है कि यह रहस्य सदा तेरे और मेरे मध्य ही सुरक्षित रहेगा?"
कुसुमा ने राजकुमारी का हाथ अपने हाथों में थामकर बड़े अर्थपूर्ण ढंग से कहा, "कुसुमा आपको वचन देती है कुमारी जी! आपका यह भेद 'कुसुमा' कभी किसी से न कहेगी।"
'क्रमशः'
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अगले भाग में:
क्या सुवर्णा अपनी आँखों पर बँधी उस पट्टी का वह रहस्य खोल देंगी जिसे सभी जानना चाहते हैं? क्या कुमार अपने वचन का मान रखेंगे? (उम्मीद है, पाठक कुमार के वचन को ध्यान से पढ़ेंगे..😅)
✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित
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