Monday, May 25, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- २४

पपीहे की विरह-टेर

​पिछले भाग में:
उपवन की शांति सुवर्णा के मधुर गायन से जीवंत हो उठी थी। सखियों के संग बिताए उन पलों ने राजकुमारी के मन को शीतलता दी, किंतु तभी गूँजी पपीहे की एक करुण पुकार ने वातावरण में एक उदासी घोल दी।
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​कुमारी सिर उठाकर पपीहे की आवाज़ बड़े ध्यान से सुनने लगीं। सबकी दृष्टि पपीहे पर जा टिकी। पपीहे की उस करुण टेर पर कुसुमा धीरे से बोली, "लगता है कुमारी जी के मधुर स्वर ने इस अभागे पक्षी को उसका पुराना दुख स्मरण करा दिया है।"
चंदा ने उत्सुकता से पूछा, "कैसा दुख, कुसुमा?"

​कुसुमा बोली, "अरे कुछ नहीं सखी, बस बाल्यावस्था में माँ से सुनी एक पुरानी लोककथा स्मरण हो आई।"

​भामा चहकते हुए बोली, "अरे वाह! कहानी... कुसुमा, हमें भी सुनाओ वह कहानी। बहुत समय बीत गया, कुमारी के मधुर गीतों के आनंद में हम जैसे कहानियों को भूल ही गए थे। अधिक से अधिक कोई पुस्तक पढ़ ली, पर मुख से सुनी कहानी का अपना ही आनंद है। है न सखी?" भामा ने स्नेह से कुमारी का हाथ स्पर्श किया।

​कुमारी बोलीं, "सत्य कह रही हो भामा! आज दीर्घकाल के पश्चात कहानी की चर्चा हुई है। अब तो मेरी भी प्रबल इच्छा है। सुनाओगी न कुसुमा?"

​कुसुमा ने तनिक संकोच से कहा, "अरे क्यों नहीं, अवश्य सुनाऊँगी! आपने पहली बार ऐसा आग्रह किया है, किंतु पता नहीं आप सबको यह लोककथा भाएगी या नहीं? पर पहले ही कह देती हूँ, यदि कहानी पसंद न आए, तो कोई मुझे दंड नहीं देगा! हाँ।" इतना कहकर कुसुमा ने बड़े कौतुक से नजाकत दिखाई।

​चंदा ने हँसते हुए कहा, "अब चाहे जो हो, कहानी तो हम सुनकर ही रहेंगी। कुमारी की ओर से मैं तुम्हें 'अभयदान' देती हूँ कि कहानी कैसी भी हो, हम तुम्हें प्रताड़ित नहीं करेंगी!" यह सुनकर सब खिलखिला उठीं और एक स्वर में बोलीं, "हाँ, हम सब तुम्हें वचन देती हैं।"
​कुसुमा ने मुस्कुराते हुए कहा, "अच्छा, अच्छा... धैर्य रखिए... सुनाती हूँ।"
​"यह कहानी मेरी माँ मुझे बाल्यावस्था में सुनाया करती थीं... राजकुमारी जी, यह एक अत्यंत प्राचीन लोककथा है। एक गाँव में 'पपीहा' नाम की एक अत्यंत भोली और रूपवती कन्या रहती थी। माता-पिता ने उसे बड़े लाड़-प्यार से पाला था, और वह संसार के छल-कपट से सर्वथा अनभिज्ञ थी।
​उसी गाँव का एक युवक उसे मन ही मन चाहता था और उससे विवाह का स्वप्न देखता था। किंतु पपीहा उसके कुटिल मंतव्य से अनजान, उसे 'काका' कहकर पुकारती थी और गाँव के अन्य परिजनों की भाँति उस पर अटूट विश्वास करती थी। जब पपीहा विवाह योग्य हुई, तो उसके पिता ने उसका पाणिग्रहण दूसरे गाँव के एक अत्यंत सरल और सज्जन युवक से कर दिया।
​पपीहा के ससुराल वाले बड़े सहृदय थे और वह अपने गृहस्थ जीवन में अत्यंत सुखी थी। 
एक दिन, वही पुराना प्रेमी—जिसे पपीहा 'काका' मानती थी—उसके ससुराल पहुँचा। पपीहा ने उसे आत्मीयता से पुकारा और उसका भावभीना सत्कार किया। उसके पति और ससुराल पक्ष वाले अन्य संबंधियों ने भी उसे पपीहा के मायके का स्वजन समझकर पूरा सम्मान दिया।

​किंतु उस 'काका' के हृदय में विष भरा था। वह अब भी पपीहा को पाने की लालसा रखता था। उसने सोचा कि यदि पपीहा का पति मार्ग से हट जाए, तो वह उसे पा सकेगा। अपने इस जघन्य विचार को पूर्ण करने हेतु उसने पपीहा के पति से प्रगाढ़ मित्रता का स्वांग रचा और उसे निकट के एक मेले में चलने का निमंत्रण दिया। निष्कपट पति उसके साथ चल दिया। लेकिन उस धूर्त के मन में तो पाप था, सो मार्ग में एक निर्जन स्थान पाकर उस घातक ने पपीहा के पति की हत्या कर दी और शव को झाड़ियों में छिपा दिया।

​जब वह अपराधी अकेला लौटा, तो पपीहा का अंतर्मन किसी अनहोनी की आशंका से भयभीत हो उठा। उसने व्याकुल होकर पूछा, 'काका! मेरे स्वामी कहाँ हैं? वे भी तो आपके साथ गए थे, फिर आप अकेले क्यों आए?' तभी उसकी दृष्टि उस व्यक्ति के वस्त्रों पर लगे रक्त के छींटों पर पड़ी। पपीहा का हृदय डूबने लगा। उसका संदेह अब दारुण भय में बदल चुका था। वह विक्षिप्त सी होकर उस हत्यारे का दामन पकड़कर विलाप करने लगी और बस एक ही रट लगाने लगी— 'काका हो, पी कहाँ? काका हो, पी कहाँ?' (काका! मेरे प्रियतम कहाँ हैं?)
​अपने स्वामी के वियोग और उस घोर विश्वासघात के आघात को वह सुकोमल युवती सह न सकी। 'पी-कहाँ... पी-कहाँ' पुकारते हुए उसने वहीं अपने प्राण त्याग दिए। कहते हैं, उसी क्षण उसकी आत्मा ने एक पक्षी का रूप धारण कर लिया। वही पक्षी आज भी वन-वन भटककर अपने प्रिय की खोज में वही पुरानी विरह-टेर लगाता है— 'काका हो, पी-कहाँ... काका हो, पी-कहाँ!'"

​इतना कहकर कुसुमा मौन हो गई। उपवन में पपीहे की वही करुण ध्वनि गूँज रही थी… 'काका हो, पी कहाँ? काका हो, पी कहाँ?’ कुमारी समेत सभी सखियाँ स्तब्ध होकर उस विलाप को सुन रही थीं, मानो उस दुखिया पपीहा के दर्द में स्वयं को एकाकार कर रही हों।

​उस स्तब्धता को भंग करते हुए कुसुमा धीरे से बोली, "राजकुमारी जी! संसार में अपनों का बिछोह और विश्वासघात ही सबसे बड़ा संताप है।"

​चंदा ने लंबी श्वास लेते हुए कहा, "सत्य कहती हो कुसुमा बहन! तुम्हारी इस करुण कथा ने तो हमें एक भिन्न ही लोक में पहुँचा दिया। अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी सुनाई तुमने।" फिर वह कुमारी की ओर मुखातिब होकर बोली, "सखी! अब हमें प्रासाद की ओर प्रस्थान करना चाहिए। संध्या ढलने को है; आपके मधुर गान और कुसुमा की इस मर्मस्पर्शी लोककथा ने तो आज की सांझ को अविस्मरणीय ही बना दिया है।"
​माधवी भी बोली, "सचमुच कुसुमा बहन ने ऐसी मर्मस्पर्शी कहानी सुनाई है कि आज देर तक मन में पपीहा की गूँज उठेगी, है न भामा?"

​भामा और कुमारी सहित सभी सखियों ने सहमति जताई और देर होती जानकर उपवन से महल की ओर चल पड़ीं।
'क्रमशः'
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​अगले भाग में:
कुसुमा द्वारा सुनाई गई इस कहानी ने राजकुमारी के मन में कई अनसुलझे प्रश्न छोड़ दिए हैं। क्या यह कहानी केवल एक लोककथा थी, या कुसुमा इसके माध्यम से राजकुमारी को कुछ महसूस कराना चाहती थी?
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[अगला सुझाव: मेरी लिखी कविता 🍂सूखे नीम के पत्ते और नीली स्याही/Dried Neem Leaves and Blue Ink🍂 यहाँ पढ़ें, कविता दो भाषाओं हिन्दी/English में उपलब्ध है।]
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✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी  & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित

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