Thursday, May 28, 2026

📖ज़िंदगी इक किताब हो जैसे..✍️

क्या आपकी ज़िंदगी की किताब का कंट्रोल आपके हाथ में है?
मित्रों..!!
​क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि हमारा पूरा जीवन एक किताब की तरह होता है? यहाँ बीतते हुए दिन पन्नों जैसे हैं और गुज़रते वर्ष अध्यायों (Chapters) की तरह। हमारा प्रत्येक कर्म मानो एक लेखनी है और हर एक पल की यादें शब्द बनकर इस पर छपती जा रही हैं। इस किताब के कुछ पन्ने दुख से भारी होते हैं और कुछ खुशियों से चहक रहे होते हैं... कुछ बेहद उत्साह से भरपूर चटक होते हैं, तो कुछ घोर निराशा से फीकी लिखावट वाले भी... किसी पन्ने पर हमारा उत्सव लिखा होता है, तो किसी पर शोक दर्ज होता है। लेकिन शायद आपने कभी अपने दिनों को किताब के पन्नों की तरह नहीं देखा होगा! एक बार ठहरकर सोचिए कि यह पल-पल लिखी जा रही ज़िंदगी सचमुच एक किताब ही हो तो? आखिर किताब का कागज से बनना अनिवार्य तो नहीं, वक्त के पन्नों पर लिखी और साँसों की डोर से बँधी ज़िंदगी भी तो किताब जैसी ही है।

​1. कौन है इस किताब का वास्तविक लेखक?

​वैसे तो हम अपनी ज़िंदगी की किताब का श्रेय विधाता या ईश्वर को दे देते हैं, परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। विधाता तो इस किताब के केवल सह-लेखक (Co-author) हैं, इसके मूल लेखक तो हम स्वयं ही हैं। हम ही वह कलम और स्याही हैं जो प्रत्यक्ष रूप से इसे लिख रहे हैं। हर पल, हर दिन रची जा रही इस अनूठी किताब के लेखक भी हम ही हैं और पाठक भी हम ही हैं।

​इस किताब में दर्ज अधिकतर बातें अकेले हमारी ही लिखी होती हैं, किंतु कभी-कभी कोई और भी 'गेस्ट राइटर' बनकर हमारे जीवन के पन्नों पर कुछ लिख जाता है—जो कभी हमें बेहद पसंद आता है, तो कभी बहुत कचोटता है। यूँ तो अपनी किताब के मुख्य रचयिता हम ही होते हैं, बस कुछ चीज़ें हम अपनी अंतःप्रेरणा से नहीं, बल्कि बाहरी दुनिया के प्रभावों में आकर लिख देते हैं।
​जब ईश्वर हमारे सह-लेखक बनते हैं, तब हमारी पवित्र चेतना हमें सदैव सही मार्ग पर चलने को प्रेरित करती है; और तब हम प्रेम, आनंद, करुणा, संवेदना, सहयोग एवं परोपकार के सुंदर लेख लिखते हैं। परंतु कभी-कभी, अहंकार रूपी अंधकार के बहकावे में आकर—ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ और दुष्टता के वशीभूत होकर—हम कुछ अनुचित कार्य भी कर बैठते हैं, जो हमारा ही एक बदरंग लेख बन जाता है। 
वह श्रेष्ठ लेखन जो हम अपनी अंतरात्मा के मार्गदर्शन में करते हैं, वही वस्तुतः विधाता का लेख है। इसके विपरीत, दुर्भावनाओं से ग्रस्त होकर किया गया कार्य हमारा स्वयं का अज्ञानता भरा लेख है, क्योंकि इसे हम सही-गलत से परे होकर सिर्फ 'मैं' (अहंकार) के वश में लिखते हैं। कभी-कभी परिस्थिति में मानो हमसे जबर्दस्ती के लेख लिखवा देती है जिसे हम भाग्य का लेखन भी कह सकते हैं।

गीता में कर्म पर जिस अधिकार की बात की गई है: "कर्मण्येवाधिकारस्ते" यही हमें हमारे जीवन की किताब का अधिकारिक लेखक भी बनाता है।

​किंतु अंततः यह हमें ही तय करना होता है कि हम अपनी जीवन-पुस्तिका में अपनी पसंद से प्रेम, सद्भाव, आशा और उन्नति जैसे सुंदर, रंगीन अध्याय चाहते हैं या फिर ईर्ष्या, द्वेष, असंतोष और निराशा के काले अक्षर...। क्योंकि इसके पीछे जो कलम और रंगबिरंगी स्याही होती है वह वास्तव में हमारे ही स्वभाव, चरित्र एवं दृष्टिकोण से आती है और जिसका निर्माण अधिकारिक रूप से हम ही करते हैं। नित्य जीवन को लिखते हुए हमें ये भी याद रखिए, हमारे एक हाथ में पेंसिल है और दूसरे में रबर भी!

​2. पेंसिल और रबर... पर कैसे?

​यहाँ आप कहेंगे कि पेंसिल की बात तो समझ आती है, परंतु रबर कैसे? भला ज़िंदगी की किताब में जो एक बार दर्ज हो गया, उसे कोई कैसे मिटा सकता है?
​तो मैं कहूँगी—हाँ, ज़रूर मिटा सकते हैं! बशर्ते अक्षर पक्के होने से पहले ही उन्हें मिटा दिया जाए। इस किताब को लिखने वाली कलम की स्याही और कुछ नहीं, बल्कि 'वक्त' है। एक बार यदि यह वक्त की स्याही सूख गई और सुधार का समय हाथ से फिसल गया, तो फिर मिटाने की हर कोशिश पन्नों को बदरंग तो कर देगी, पर उन दागों को पूरी तरह मिटा नहीं पाएगी। तात्पर्य यह है कि यदि हमसे कोई भूल या गलत लेख लिख जाए, तो क्षमा, सुधार और प्रायश्चित्त के रबर से उसे तुरंत और समय रहते सुधारा या मिटाया जा सकता है।

​किसी विचारक ने बहुत सुंदर बात कही है:

​"ईश्वर के प्रति हुए अपराध की उतनी चिंता मत करो जितनी कि प्राणियों के प्रति हुए अपराध की। क्योंकि ईश्वर तो शाश्वत हैं, उनसे आप कभी भी क्षमा माँग सकते हैं; किंतु यदि कोई प्राणी इस संसार से चला गया, तो शायद आपको उससे क्षमा माँगने और अपना लेख सुधारने का अवसर फिर कभी प्राप्त नहीं होगा।"


​3. क्या जीवन की किताब का लिखा जाना अनिवार्य है? क्या हम 'कोरे' नहीं रह सकते?

​श्रीमद्भगवद्गीता में कहे गए 'अकर्म' के सिद्धांत से निश्चय ही यह संभव है कि हम स्वयं कुछ भी न लिखें। हमारा मन इतना निर्मल-निश्छल हो जाए कि हमारा प्रत्येक कर्म सात्विक हो और ईश्वर को अर्पित हो जाए। किंतु ज़रा ठहरकर स्वयं को टटोलिए—क्या हम आज के समय में ऐसा कर पाने में सक्षम हैं?

​गौर करने वाली बात यह है कि अगर आप स्वयं कुछ भी नहीं लिखना चाहेंगे, तो भी यह 'अदृष्ट' (प्रारब्ध या परिस्थितियाँ) आपसे अनियंत्रित रूप से कुछ न कुछ अवश्य लिखवा देगा। यानी जीवन के पन्नों पर लेखन तो होगा ही होगा... पर तब उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होगा और इसके उत्तरदायी भी हमारे अलावा कोई और नहीं होगा। क्योंकि अपनी किताब पर किसी और की पसंद को छापने की अनुमति देने वाले भी तो हम ही होंगे! इसलिए 'कुछ न लिखने' का विकल्प (अकर्म) बहुत विरले लोगों के लिए ही उपयुक्त है। हम जैसे आमजनों के लिए तो यही एकमात्र उचित मार्ग है कि हम यह सीखें और चुनाव करें कि हमें अपनी किताब में लिखना क्या है।

​4. यादों का उपन्यास और आने वाले कोरे पन्ने
​मित्रों! हम हर पल अच्छी-बुरी यादों के रूप में जो कुछ भी इस किताब में लिखते आए हैं, वे सभी पिछले पन्ने हमारी स्मृतियों में हमेशा के लिए सुरक्षित हैं। अगर हमसे या किसी और से उन पन्नों पर कुछ अनचाहा लिख भी गया है, तो चाहकर भी हम उन्हें फाड़कर जीवन से अलग नहीं कर सकते। लेकिन अगर हम चाहें, तो उन कमज़ोर अध्यायों को वहीं छोड़कर एक बेहद खूबसूरत नई शुरुआत ज़रूर लिख सकते हैं।

यानी, जो हो गया उसे मिटा नहीं सकते परंतु जो होना चाहिए उसे लिखने का नवीन प्रयत्न अवश्य आरंभ कर सकते हैं।

​तो अगर आपसे अतीत में कुछ अच्छा लिखना छूट गया है या आप अपनी पिछली लिखावट से संतुष्ट नहीं हैं, तो आज और इसी पल से उन पिछले पन्नों का मोह छोड़िए और एक नए पन्ने से नई शुरुआत कीजिए। क्योंकि आपकी किताब के अगले पन्ने अभी भी पूरी तरह कोरे हैं... और हर नया पन्ना एक नई, शानदार कहानी के लिए बिल्कुल तैयार बैठा है, बस उसे आपके सकारात्मक लेखन का इंतज़ार है...।
बुरे लेख अतीत की कीचड़ हैं उसे त्याग देना उचित है न कि पैरों में लपेटकर वर्तमान के पन्नों पर घसीटते फिरना।

​आखिर में मेरी दो लाइनें.....

​"ज़िंदगी इक किताब हो जैसे, पन्ना-पन्ना बयान हो जैसे।
शब्द दर शब्द लिख रही हूँ मैं, याद करना हिसाब हो जैसे।"

​आज के लिए इतना ही... आपका दिन मंगलमय हो! 🙏💕

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अगला रिकमंडेशन: "जीवन का यिन-यांग:The Yin-Yang of Life" सत्य अक्सर ब्लैक और व्हाइट के बीच के उस संतुलन में छिपा होता है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। इस लेख में मैंने इसी जीवन दर्शन को शब्दों में पिरोने की कोशिश की है। (लेख हिंदी/English दोनों भाषाओं में उपलब्ध है।)

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​✍️ 'निःशब्द' की कलम से....🌷

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