"मौन दृष्टि, मुखर हृदय"
पिछले भाग में:
राजकुमारी सुवर्णा और उनकी सखियों के बीच बढ़ती आत्मीयता ने महल के वातावरण को खुशगवार बना दिया है। कुसुमा के रूप में आए राजकुमार धीरे-धीरे सुवर्णा के स्वभाव और उनकी दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
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एक दिन संध्याकाल में कुमारी की इच्छा हुई कि अपनी सखियों के साथ, महल के भीतर अपने लिए आरक्षित निजी उपवन में विहार किया जाए।
चंदा ने तत्काल आगे बढ़कर कुमारी का हाथ थाम लिया और बोली, "कहो, सखी!" (महल के एकांत में कुमारी ने सखियों को निर्देश दे रखा था कि वे उन्हें 'राजकुमारी' जैसे औपचारिक संबोधनों के स्थान पर 'सखी' कहकर ही पुकारें। इससे उन्हें आत्मीयता का अनुभव होता था और सखियाँ भी उनकी प्रसन्नता हेतु ऐसा ही करती थीं।)
कुमारी ने चंदा का हाथ थामे हुए कहा, "सखी! कक्ष में कुछ घुटन सी अनुभव हो रही है, मन कर रहा है कि कुछ समय खुले आकाश के नीचे बिताऊँ। तुम किसी के द्वारा माँ को संदेश भिजवा दो कि हम सब उपवन की ओर जा रही हैं।"
चंदा ने भामा की ओर देखा, जो तुरंत जाकर एक प्रहरी सेविका को यह सूचना दे आई। चंदा कुमारी से बोली, "सखी, आपका विचार उत्तम है। चलिए, इस समय शीतल और मंद पछुवाँ पवन चल रही है, जो मन को बड़ी शांति देगी।"
इधर कुसुमा भी चहकते हुए बोली, "और सखी! आजकल उपवन में रातरानी और हरश्रृंगार की सुगंध ऐसी बिखरी है कि क्या कहूँ! मैं तो जब भी वहाँ जाती हूँ, मदहोश हो जाती हूँ।"
सभी सखियाँ उपवन की ओर चल पड़ीं। सबको कुमारी की आँखों पर बँधी पट्टी का भान था, अतः वे अत्यंत सावधानीपूर्वक उन्हें लेकर आगे बढ़ रही थीं। चलते-चलते भामा उत्साह में बोल पड़ी, "कुसुमा बहन सत्य कह रही है। उपवन में न केवल पुष्प खिले हैं, बल्कि तुम्हारी प्रिय हिरनी 'मुनिया' ने एक शावक को जन्म दिया है। उसकी अठखेलियाँ इतनी मनमोहक हैं कि देखोगी तो... ओ!" (अकस्मात भामा को कुमारी की पट्टी का स्मरण हुआ और उसने लज्जावश दाँतों तले उँगली दबा ली।)
चंदा ने उसे तिरछी नज़रों से घूरा और माधवी ने उसकी पीठ पर हल्की सी धौल जमा दी।
अब सब उपवन में पहुँच चुकी थीं। वह स्थान सचमुच प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण था। पुष्पों और लताओं को बड़ी सुघड़ता से सजाया गया था। इस उपवन का उत्तरदायित्व कुमारी की सखी 'पुष्पा' पर था, जो एक कुशल माली की पुत्री और कुमारी की प्रिय सखी थी।
उपवन के मध्य एक सुंदर सरोवर था, जिसमें रंग-बिरंगी मछलियाँ क्रीड़ा कर रही थीं। यह सरोवर सिंचाई के साथ-साथ वहाँ के पशु-पक्षियों की प्यास बुझाने का भी मुख्य स्रोत था। सरोवर के चारों ओर सीढ़ियाँ बनी थीं और वह आम, चंदन एवं पीपल जैसे सघन वृक्षों की शीतल छाया से ढका रहता था। इसी कारण उसका जल सदैव शीतल रहता और उससे टकराकर आने वाली वायु भी चंदन की शीतलता लिए होती थी। सरोवर के निकट पीपल के वृक्ष के चारों ओर एक कलात्मक चबूतरा बना था और चंदन के वृक्षों के समीप संगमरमर की नक्काशीदार आसंदियाँ (कुर्सियाँ) थीं। कुमारी अपनी सखियों के साथ वहीं विश्राम करने रुकीं।
चंदा ने कुमारी से आसन पर बैठने का आग्रह किया, किंतु कुमारी मृदु स्वर में बोलीं, "नहीं सखी! आज तो हम यहीं हरी घास पर बैठेंगे। देखो, यह कितनी कोमल है। पुष्पा बहन की ममतामयी मेहनत मेरे पाँवों को बहुत सुखद लग रही है।"
इतना कहकर कुमारी वहीं मखमल सी घास पर बैठ गईं और सभी सखियाँ उन्हें घेरकर बैठ गईं। कुमारी ने पुनः कहा, "तुम सब मानती हो कि मैं देख नहीं सकती, किंतु मैं स्पर्श तो कर सकती हूँ, सुगंध तो ले सकती हूँ और सुन भी तो सकती हूँ। इस उपवन की दूब, वायु में घुली यह भीनी महक, पक्षियों का यह हर्षित कलरव... और फिर तुम सब भी तो मुझे बताते रहते हो कि हमारी सखी पुष्पा ने इस उपवन को कितना अलौकिक रूप दिया है।"
पुष्पा तनिक लजाते हुए बोली, "सखी! आप तो मेरी इतनी प्रशंसा कर रही हैं कि मैं स्वयं को आम के वृक्ष पर चढ़ा हुआ अनुभव कर रही हूँ, पर मैं अभी चढ़ूँगी नहीं, क्योंकि अभी उन पर एक भी आम नहीं लगा है।" उसकी चपलता पर सभी खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
चंदा ने चर्चा का रुख मोड़ते हुए कहा, "सखी! आज तो हम सब आपका मधुर गान सुनना चाहती हैं। सुनाओगी न?"
कुसुमा ने विस्मय से पूछा, "क्या हमारी सखी गाती भी हैं?"
एक अन्य सखी कामिनी ने चुटकी ली, "क्यों कुसुमा, क्या तुम नहीं गातीं?"
कुसुमा ने बनावटी उदासी से मुँह लटकाकर कहा, "अरे बहन! विधाता ने काया की भाँति स्वर भी तो वैसा ही दिया है।"
कुमारी ने सांत्वना देते हुए कहा, "सखी! तुम व्यर्थ ही मन छोटा करती हो। तुम तो थोड़े ही दिनों में हम सबकी ऐसी प्रिय सखी बन गई हो, जैसा हमने स्वप्न में भी न सोचा था।"
कुसुमा ने तनिक गर्व से कहा, "वह तो है! ऐसा तो मैंने भी नहीं सोचा था। मैं तो बस जीवन निर्वाह की आस लेकर यहाँ आई थी, पर आपकी छोटी-छोटी सेवा में जो सुख मिला, वैसा तो पिता के घर में भी न था। पर हाँ, मुझसे गाने का हठ मत करना, अन्यथा यदि मैंने उत्साह में आकर गाने को मुँह खोला तो उपवन के सारे पक्षी भयभीत होकर उड़ जाएंगे, फिर मुझे दोष मत देना हाँ!"
कुसुमा की इस विनोदपूर्ण बात पर सब हँसकर लोटपोट हो गईं। जब हँसी थमी, तो चंदा ने कुमारी का हाथ थामकर पुनः आग्रह किया, "सखी, अब कुछ सुनाओ भी, बहुत समय बीत गया है।"
कुमारी ने मंद स्वर में गुनगुनाना आरंभ किया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो समस्त उपवन उस राग में तन्मय होकर लीन हो गया हो। चंदा ने भी अपना स्वर मिलाया और धीरे-धीरे अन्य सखियों के सम्मिलित गान ने एक अद्भुत समाँ बाँध दिया। कुछ क्षणों तक वहाँ पूर्ण स्तब्धता छा गई। कुसुमा बने कुमार तो जैसे अपनी सुध-बुध खोकर उस अमृतवाणी को पी रहे थे। गीत समाप्त हुआ, पर सन्नाटा बना रहा।
तभी वृक्ष पर बैठे एक पपीहे ने 'पी-कहाँ, पी-कहाँ' की तीव्र पुकार से उस शांति को भंग किया। सुवर्णा के मधुर गीत पर सबने मुस्कुराते हुए तालियों से अपनी प्रसन्नता व्यक्त की।
'क्रमशः'
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अगले भाग में:
क्या सुवर्णा का यह सुरीला गान राजकुमार के हृदय में छिपे प्रेम को और गहरा कर देगा? और क्या उपवन की इस शांति के पीछे कोई नई चुनौती दस्तक देने वाली है? जानने के लिए पढ़िए अगला एपिसोड!
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[अगला सुझाव: मेरी लिखी कविता अनकहे शब्द और खुश्बुओं का मौन | Unspoken Words and the Silence of Fragrance यहाँ पढ़ें, कविता दो भाषाओं हिन्दी/English में उपलब्ध है।]
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✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित
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