महल में पैठ और विश्वास
पिछले भाग में:
विश्वास एक ऐसा कच्चा धागा है जिसे जीतना जितना कठिन है, उसे बनाए रखना उससे भी कहीं अधिक। चंदनगढ़ के महल में 'कुसुमा' का प्रवेश तो हो गया था, लेकिन भामा जैसी चतुर सखियों की पैनी नज़रों के बीच अपनी पहचान छिपाए रखना राजकुमार के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था।
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अपने तीव्र बोध से कुमार ने भामा की गुप्त निगरानी को भाँप लिया था, जो कि स्वाभाविक ही था। अतः वे भामा से सतर्क रहते हुए महल के अन्य सदस्यों का विश्वास जीतने में जुट गए।
कुसुमा बने कुमार ने राजकुमारी की सखियों के कार्यों में इस प्रकार हाथ बँटाया, मानो वे जन्मों से यही सेवा करते आए हों। इस प्रक्रिया में वे उन कार्य भी सीख गए, जिनका उन्हें पूर्व में कोई अनुभव न था।
अपनी सुरक्षा और गोपनीयता हेतु कुमार नदी के एकांत तट पर सबसे पृथक स्नान करते और किसी को भी अपनी काया देखने का अवसर न देते। उनका तर्क यही था कि उनकी सुदृढ़ बनावट का सब उपहास करेंगे, जिससे उन्हें लज्जा आती है। महारानी के स्पष्ट आदेश के कारण किसी ने उन पर दबाव भी नहीं डाला।
इसके अतिरिक्त, कुसुमा बने कुमार ने अत्यंत संयम बरतते हुए कभी भी कुमारी के वस्त्र बदलने जैसे नितांत निजी कार्यों में सहायता नहीं की। वे नहीं चाहते थे कि अनजाने में भी वे कुमारी को किसी अनुचित अवस्था में देखें; और ऐसे संकटपूर्ण क्षणों में बहाने बनाने की तो उन्होंने जैसे 'पूरी पुस्तक' ही कंठस्थ कर रखी थी।
जैसे-जैसे दिन बीते, कुमार महल के वातावरण में पूरी तरह रच-बस गए। उनके बलिष्ठ शरीर के कारण वे सखियों की उन कठिन कार्यों में भी सहायता कर देते, जिन्हें करने में वे स्वयं को असहाय पाती थीं।
इसका शुभ परिणाम यह हुआ कि सखियाँ अब निसंकोच उनसे सहायता लेने लगीं। भामा के माध्यम से जब ये समाचार महारानी तक पहुँचे, तो वे भी कुछ निश्चिंत हुईं। तथापि, उन्होंने भामा को कुसुमा की छाया बने रहने का निर्देश दे रखा था। कुमार को इससे असुविधा तो होती, पर उन्होंने इसकी चिंता नहीं की। अब तक कुमार को कुमारी के बचपन से जुड़ी लगभग हर घटना ज्ञात हो चुकी थी, सिवाय उस पट्टी के रहस्य के। अब यह स्पष्ट था कि यह भेद केवल महाराज, महारानी, कुलगुरु और स्वयं कुमारी के मध्य ही सुरक्षित है।
अब कुमार ने राजकुमारी का पूर्ण विश्वास जीतने का प्रयास तीव्र कर दिया। वे छाया की भाँति कुमारी के निकट रहते। आँखों पर पट्टी होने के कारण जब भी कुमारी स्वयं को किंचित भी असहाय अनुभव करतीं, कुसुमा तत्काल वहाँ उपस्थित हो जाती। मानो कुमारी के मन की हर इच्छा उन्हें स्वतः ज्ञात हो जाती थी, यद्यपि इस रहस्यमयी अंतर्ज्ञान का कारण वे स्वयं भी नहीं जानते थे। धीरे-धीरे वे कुमारी के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गए। कुमारी जहाँ भी जातीं, कुसुमा उनके साथ होती।
अब कुमारी उनसे पहले से अधिक आत्मीयता से बातें करने लगी थीं। कई बार जब अनजाने में कुमारी का हाथ कुसुमा को स्पर्श करता, तो उन्हें एक विचित्र सी सिहरन और अनुभूतियाँ होतीं, किंतु वे इसे अपने मन का भ्रम मानकर अनदेखा कर देतीं।
दिन-प्रतिदिन कुमार चंदनगढ़ के राजमहल और राजकुमारी की सखियों के मध्य पूरी तरह रच-बस गए। इस बीच, ध्रुवदेव गुप्त रूप से उनकी टोह लेते रहते और अवसर पाकर भेष बदलकर उनसे भेंट भी कर लेते।
एक दिन जब वे गोपनीय रूप से मिले, तो चुटकी लेते हुए बोले, "कुमार! यह स्वांग कब तक चलेगा? हमें स्वदेश भी लौटना है... कहीं आप अपना राज-पाट भूलकर जीवनभर दासी बने रहने का तो नहीं सोच रहे हैं?"
कुमार उनकी बात हँसकर टाल गए; और प्रायः हर भेंट में यही होता था। सबसे विस्मयकारी बात तो यह थी कि ये समस्त घटनाएँ गुप्तचर कर्णसिंह के माध्यम से सौवीरनगर में महाराज सुकर्मादित्य तक पहुँच रही थीं, किंतु वे भी मौन थे। संभवतः उस पट्टी के रहस्य को जानने की उत्कंठा अब सबको समान रूप से थी।
इन दिनों कुसुमा, कुमारी की सखियों में अग्रणी रहने लगी थी। उसे एक सुदृढ़ कद-काठी की निडर स्त्री मानकर सब निसंकोच अपने साथ रखती थीं, क्योंकि उसकी उपस्थिति से सबको बड़ी सहायता मिलती थी।
जब भी कोई श्रमसाध्य या भारी कार्य आता, कुसुमा स्वयं आगे बढ़कर हँसते हुए कहती, "अरे बहनों! यह कार्य तो मुझे ही करने दो। विधाता ने मुझे ऐसी बलिष्ठ देह इसीलिए तो दी है, अन्यथा मेरा अन्न-जल ग्रहण करना तो व्यर्थ ही हो जाएगा!"
उसकी बात सुनकर सब मुस्कुरा देतीं और सहर्ष उसकी सहायता स्वीकार कर लेतीं। धीरे-धीरे सखियों के साथ-साथ राजकुमारी और महारानी को भी यह विश्वास होने लगा कि कुसुमा एक अत्यंत निडर और हँसमुख स्त्री है, बस उसके अभागे पति ने उसकी कदर नहीं की। इसी कारण सबके मन में उसके प्रति सहानुभूति और प्रगाढ़ हो गई।
'क्रमशः'
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अगले भाग में पढ़ें:
कुसुमा ने सबके दिलों में जगह तो बना ली, पर क्या सुवर्णा के मन में उठने वाली वह 'विचित्र सिहरन' किसी बड़े तूफान का संकेत है? क्या कुमार की यह 'अंतर्ज्ञान' वाली शक्ति उन्हें उस रहस्यमयी पट्टी के सत्य तक पहुँचा पाएगी, या फिर भामा की पैनी नज़र सब कुछ तहस-नहस कर देगी?
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