Friday, May 15, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- २१

कुसुमा का आगमन 

​पिछले भाग में:
चंदनगढ़ के राजमहल की दीवारें अभेद्य थीं, पर छद्म वेश और चातुर्य के आगे पत्थर की दीवारें भी रास्ता दे देती हैं। आँखों पर पट्टी बाँधे सुवर्णा जहाँ अपनी नियति से लड़ रही थीं, वहीं नियति एक अनोखे रूप में उनके द्वार तक पहुँच चुकी थी।
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​आज नित्य की भाँति कुमारी मंदिर से लौट रही थीं, तभी नगर के एक निर्जन स्थान पर रथ के मार्ग में अकस्मात एक स्त्री (भेषधारी कुमार) आ गिरी। श्रेष्ठ नस्ल के अश्व मार्ग में किसी को गिरा देख हिनहिनाकर रुक गए। राजकुमारी की सखी चंदा ने रथ का पर्दा हटाकर पूछा, "सुभद्र जी! क्या हुआ? रथ क्यों रुक गया?"

​सारथी सुभद्र ने उत्तर दिया, "बिटिया! मार्ग में अचानक एक स्त्री आ गई है। बड़ी दयनीय अवस्था में जान पड़ती है और निरंतर विलाप कर रही है।"

​तभी करुण रुदन की ध्वनि गूँजी, जिसे सुनकर कुमारी का कोमल हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने अपनी सखियों से कहा, "जाओ, उसे सांत्वना देकर मेरे पास ले आओ।" दोनों सखियाँ—चंदा और माधवी—रथ से उतरकर उस स्त्री (जो स्वयं कुमार विक्रमादित्य थे) के समीप पहुँचीं। सुभद्र भी उसे चुप कराने का प्रयास कर रहे थे, किंतु वह स्त्री सिसकियाँ भरे जा रही थी। यह देख चंदा आगे बढ़ी और उसके कंधे पर हाथ रखकर सहृदयता से बोली, "बहन, शांत हो जाओ! कौन हो तुम? और तुम्हें ऐसा क्या दुख है? इस प्रकार मार्ग के मध्य विलाप क्यों कर रही हो? हमें बताओ, कदाचित हम तुम्हारी सहायता कर सकें।"

​वह स्त्री (कुमार) सिसकते हुए बोली, "मेरी सहायता कोई नहीं कर सकता... मेरा तो मर जाना ही उचित है! मुझे क्षमा करें, मैं भ्रमवश आपके मार्ग में आ गई। शोक के कारण मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था, इसलिए गिर पड़ी। मैं अभी हट जाती हूँ, आप प्रस्थान करें।" इतना कहकर वह उठी और मार्ग के किनारे जाकर बैठ गई।
​तभी रथ का पर्दा पुनः हटा और कुमारी ने संकेत से माधवी को अपने पास बुलाया। उन्होंने आदेश दिया कि उस स्त्री को रथ पर चढ़ा लिया जाए। माधवी समझ गई कि कुमारी के महल पहुँचने में विलंब हो रहा है और इस प्रकार बीच राह में तमाशा खड़ा करना उचित नहीं। वह उस स्त्री के पास पहुँची और कोमलता से बोली, "बहन, भयभीत न हो। यह राजकुमारी जी का रथ है। वे तुम्हें अपने साथ महल चलने का निमंत्रण दे रही हैं। उचित यही है कि तुम उनकी आज्ञा मान लो। आओ, हमारे साथ चलो... डरो मत।" अंततः चंदा और माधवी ने सहानुभूतिपूर्वक उसे चुप कराया और सहारा देकर रथ पर बिठा लिया।

​मार्ग में कुमारी की इच्छा जानकर माधवी ने उस दुखिया स्त्री से पूछा, "बहन, हमारी राजकुमारी यह जानना चाहती हैं कि तुम कौन हो? और तुम्हारा परिचय क्या है? तुम्हें ऐसा क्या संताप है जो तुम इस भाँति विलाप कर रही हो?"

​स्त्री बने कुमार ने रुआँसे स्वर में कहा, "क्या कहूँ सखी! मैं एक अभागन हूँ। माता-पिता ने बड़े लाड़-चाव से मेरा नाम 'कुसुमा' रखा था और बड़े अरमानों के साथ विवाह कर मुझे विदा किया था। मेरे पति ने विवाह से पूर्व मुझे देखा नहीं था, और जब मैं ससुराल पहुँची, तो मुझे देखते ही उन्होंने मुँह फेर लिया। उन्हें किसी अत्यंत सुकुमार और कोमल काया वाली स्त्री की कामना थी, और मेरा शरीर तो आप देख ही रही हैं... मैं तनिक ऊँची और सुदृढ़ कद-काठी की हूँ। इसी बात पर उन्होंने मुझे त्याग दिया और मैं वापस अपने मायके न जा सकूँ, इसलिए मुझे यहाँ लाकर छोड़ गए।"

कुसुमा (कुमार) कुछ देर सुबकती रही, फिर सबके ढांढस बँधाने पर आगे बोली, "पति से अपमानित होकर अब दर-दर भटक रही हूँ। माता-पिता के पास जाकर उन्हें और दुखी नहीं करना चाहती। अब या तो यह प्राण त्याग दूँगी या किसी भले घर में सेवा-टहल करके जीवन व्यतीत कर लूँगी। पर चाहे जो हो जाए, उस द्वार पर कभी लौटकर नहीं जाऊँगी जहाँ मेरा अपमान हुआ है। बस, यही सब सोचकर अपने भाग्य पर रो रही थी कि अनजाने में आपके रथ के सम्मुख आ गई। मुझे क्षमा कर दें... मुझ असहाय को यदि कहीं शरण मिल जाए, तो मैं जी-जान से सेवा करूँगी। बस दो जून की रोटी और तन ढकने को वस्त्र मिल जाएँ, तो मेरा जीवन सँवर जाएगा।" इतना कहकर वह फिर सिसकने लगी।

​इसी वार्तालाप के मध्य रथ राजमहल के भीतर प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार कुमार विक्रमादित्य स्त्री भेष में सफलतापूर्वक महल के भीतर पहुँच गए।

​महल पहुँचकर राजकुमारी नित्य की भाँति माता-पिता को प्रणाम करने उनके कक्ष की ओर बढ़ीं। 'कुसुमा' को कक्ष के बाहर ही प्रतीक्षा करने को कह दिया गया। कुमारी ने माता को नमन किया और पूछा, "माँ! क्या पिताजी आज पुनः किसी आवश्यक कार्यवश बाहर चले गए हैं?"

​महारानी ने उत्तर दिया, "हाँ पुत्री! राजकाज और कर्तव्य उन्हें विश्राम नहीं लेने देते। उनकी ओर से मैं ही तुम्हें शुभाशीष देती हूँ। वे कहकर गए हैं कि संध्या काल में तुमसे भेंट अवश्य करेंगे।"

​फिर कुमारी ने संक्षेप में मार्ग की घटना सुनाई और माता की अनुमति लेकर 'कुसुमा' को कक्ष के भीतर बुलाया। महारानी ने कुसुमा को अपलक निहारा और प्रश्न किया, "पुत्री! तुम दिखने में तो असुंदर नहीं हो, फिर ऐसा व्यवहार क्यों? तथापि, कुमारी ने जो कुछ बताया है, उसमें तुमने अपने मायके या ससुराल का कोई परिचय नहीं दिया। तुम कहाँ से आई हो?"
​कुसुमा (कुमार) ने विनम्रता से सिर झुकाकर कहा, "क्षमा करें रानी माँ! मैं अभागन तो हूँ, पर अपने माता-पिता का नाम उजागर कर उन्हें और अधिक अपमानित नहीं करूँगी। और न ही उस व्यक्ति का पता दूँगी जिसका मुख अब मैं स्वप्न में भी नहीं देखना चाहती। आप ही न्याय करें माता! यदि विधाता ने मुझे ऐसी कद-काठी दी है, तो इसमें मेरा क्या दोष? क्या इसी कारण मुझे पशु की भाँति मार्ग पर फेंक दिया जाना उचित था?"

​सिसकते हुए उसने आगे कहा, "बचपन से ही सब मुझ पर उपहास करते आए हैं... पर अब और नहीं। ईश्वर ने मुझे सामर्थ्य और हाथ-पाँव दिए हैं, मैं अपना पेट स्वयं पाल सकती हूँ। मैं कठिन परिश्रम से नहीं डरती। सच तो यह है कि आज आप और राजकुमारी जैसी दयालु आत्माओं को देखकर मेरा साहस लौट आया है। पहले तो प्राण त्यागने का विचार था, पर अब लगता है कि क्यों न अपना शेष जीवन आपकी सेवा में समर्पित कर दूँ। यदि आप एक अवसर दें, तो मैं अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दूँगी। संभवतः इसी सेवा से मेरा जीवन सार्थक हो जाए।" इतना कहकर कुसुमा मौन हो गई।

​महारानी कुसुमा के तर्कों से निरुत्तर हो गईं। कुछ क्षण विचार कर वे बोलीं, "पुत्री! कुमारी की इच्छा है कि तुम्हें उनकी सेवा में नियुक्त किया जाए। यद्यपि हम अजनबियों को कुमारी के समीप नहीं आने देते, पर तुम्हारी स्थिति देख हम तुम्हें यह अवसर दे रहे हैं। तुम कुमारी की आज्ञा का पालन करोगी और अपनी निष्ठा सिद्ध करोगी। अब तुम्हारी समस्त आवश्यकताओं का उत्तरदायित्व हमारा है। तुम अन्य सखियों के साथ रह सकती हो। अब जाओ, चंदा तुम्हें शेष मर्यादाएँ समझा देगी।"

​महारानी ने संकेत से सबको विदा किया, किंतु कुमारी की चतुर और विश्वसनीय सखी 'भामा' को वहीं रुकने का निर्देश दिया। सबके जाने के बाद महारानी चिंतित स्वर में बोलीं, "भामा! यह स्त्री जो कोई भी हो, तुम्हें इसकी सूक्ष्मता से परीक्षा लेनी होगी। बातों से तो यह सुशिक्षित और कुलीन लगती है, और कदाचित अपनी देह-यष्टि के कारण जगत के उपहास की सताई हुई है। अन्य सखियों को सावधान कर देना कि कोई इसकी हँसी न उड़ाए। हमें इसे और दुखी नहीं करना है। अब जाओ और कुमारी का विशेष ध्यान रखो... आँखों पर पट्टी बाँधकर उन्होंने स्वयं को असहाय बना लिया है, अतः तुम्हारा उत्तरदायित्व और बढ़ गया है।"
​भामा ने दृढ़ता से कहा, "आप निश्चिंत रहें रानी माँ! मैं कुमारी की परछाईं बनकर रहूँगी और इस नई दासी कुसुमा पर भी मेरी पैनी दृष्टि रहेगी।" अनुमति पाकर भामा भी वहाँ से प्रस्थान कर गई।
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अगले भाग में:
कुसुमा ने महल में पैठ तो बना ली, पर क्या वह 'भामा' की पारखी नज़रों से बच पाएगा? एक तरफ सुवर्णा का अटूट संकल्प और दूसरी तरफ कुसुमा के वेश में छिपे राजकुमार की खोज—क्या यह नया चेहरा राजमहल के रहस्यों को सुलझाएगा या स्वयं ही किसी नई मुसीबत में फँस जाएगा?
'क्रमशः'
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