कुमार का साहसी कदम
भाग-१९ यहाँ पढ़ें।
पिछले भाग में आपने पढ़ा: सुवर्णपुर की पहाड़ी पर स्थित शिव-मंदिर के पथ पर राजकुमारी सुवर्णा के प्रथम दर्शन ने राजकुमार के हृदय में एक अनजानी वेदना जगा दी है। सुवर्णा के सौंदर्य और उनकी आँखों पर बंधी पट्टी के रहस्य ने कुमार को इतना बेचैन कर दिया है कि उन्होंने अब एक दुस्साहसी निर्णय ले लिया है। अब आगे...
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घंटों बीत गए; ध्रुवदेव नगर की गलियों में भटकते रहे और कुमार के मन में केवल राजकुमारी स्वर्णप्रभा की छवि टहलती रही। उनके मन में बार-बार यही प्रश्न कौंधता—वह पट्टी के पीछे का सत्य क्या है? और पट्टी के बिना कुमारी कैसी दिखती होंगी?
आखिर उनका ध्यान तभी टूटा जब ध्रुवदेव वापस लौटे। ध्रुवदेव ने देखा कि कुमार अब भी उसी अवस्था में पड़े हैं, तो उन्होंने मज़ाक में गुनगुनाना शुरू किया:
🎵"लागी रे लगन गोरी, इक तेरे रूप की...
नगरी में तेरी गोरी, छाँव भी है धूप सी..."🎵
कुमार अचानक चौंके और ध्रुवदेव को घूरकर बोले, "आ गए घुमक्कड़ी करके? यहाँ हमें भूख सता रही है और आप गीत गा रहे हैं!"
ध्रुवदेव ने आँखें फैलाकर व्यंग्य किया, "अरे! आपको भूख भी लगती है? हमें तो लगा कि उनके ख्यालों में आपकी भूख-प्यास सब विदा हो गई होगी। खैर चलिए, आपसे अधिक भूख मुझे लगी है।"
ध्रुवदेव का यह तीर निशाने पर लगा और कुमार मुस्कुरा कर रह गए। भोजन के पश्चात जब दोनों विश्राम करने बैठे, तो कुमार ने पूछा, "अब सुनाइए, कहाँ-कहाँ की धूल छानकर आए हैं?"
ध्रुवदेव बोले, "बस, सुवर्णपुर की गलियों से जान-पहचान बढ़ा रहा था। अब आप अपनी योजना बताइए।"
कुमार गंभीर होकर बोले, "निश्चय यह है कि बिना रहस्य जाने यहाँ से नहीं टलना है। अब तक की सूचनाओं से यही लगता है कि बिना कुमारी के समीप पहुँचे सत्य का पता नहीं चलेगा। मैंने तय किया है कि मैं स्वयं दासी का भेष धरकर अंतःपुर में जाऊँगा। अब आप बताइए कि यह कैसे संभव होगा?"
ध्रुवदेव इस दुस्साहस पर भड़क उठे, "कदापि नहीं! आप जानते भी हैं कि आप क्या कह रहे हैं? सौवीरनगर का राजकुमार सुवर्णपुर के महल में दासी का कार्य करेगा? यदि महाराज को पता चला, तो वे मुझे सीधा और आपको उल्टा लटकाकर फाँसी दे देंगे! हे भगवान, घड़ी भर को अकेला क्या छोड़ा, आपकी तो मति ही मारी गई! यदि इतना ही अनिवार्य है, तो यह जोखिम मैं उठाऊँगा। मैं दासी बनकर महल में पैठ बनाऊँगा और सारा भेद ले आऊँगा।"
कुमार पर ध्रुवदेव के तर्कों का कोई प्रभाव न पड़ा। लंबी बहस के बाद कुमार मौन होकर ध्रुवदेव को एकटक देखने लगे। ध्रुवदेव वह दृष्टि पहचानते थे; वे समझ गए कि कुमार ने जो ठान लिया है, अब उसे ब्रह्मा भी नहीं बदल सकते।
ध्रुवदेव ने कुछ क्षण गहन चिंतन किया और फिर दोनों मित्रों ने मिलकर एक ठोस योजना तैयार की। यह तय हुआ कि सर्वप्रथम ध्रुवदेव एक प्रहरी का भेष धरकर महल में प्रवेश करेंगे और यथासंभव जानकारी जुटाकर लौटेंगे। तत्पश्चात, वे कुमार को दासी के रूप में महल में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। जब कुमार अंतःपुर में तैनात होंगे, तब ध्रुवदेव बाहर रहकर गुप्त रूप से उनकी सहायता के लिए तत्पर रहेंगे।
ध्रुवदेव कुछ समय के लिए बाहर गए और वे सभी आवश्यक सामग्रियाँ ले आए, जिनसे उन दोनों का कायाकल्प किया जा सके। पूरी रात दोनों ने हर संभावित खतरे पर विचार किया ताकि भेद खुलने की रत्ती भर भी गुंजाइश न रहे। अगले दो दिनों तक ध्रुवदेव ने किसी तरह कुमार को धर्मशाला में ही रोके रखा और स्वयं विभिन्न भेष बदलकर महल की गतिविधियों की थाह लेते रहे। दो दिन बाद जब वे लौटे, तो उन्होंने महल की आंतरिक स्थिति का पूरा ब्योरा कुमार के सम्मुख रखा और उनके प्रवेश की सबसे सुगम संभावना भी बताई।
चौथे दिन की अलख सुबह, दोनों मित्र आवश्यक सामग्री लेकर धर्मशाला से निकले।
नगर से दूर एक एकांत स्थान पर ध्रुवदेव ने अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए कुमार को एक 'दुखियारी स्त्री' का भेष धारण कराया। ध्रुवदेव गुप्तचरी की विद्या में निपुण थे और रूप परिवर्तन में उन्हें महारत हासिल थी। उनके स्पर्श और प्रसाधनों के जादू से कुमार अद्भुत रूप से एक स्त्री प्रतीत होने लगे। कुमार ने भी अपनी आवाज को यथासंभव कोमल और स्त्रियों सा बनाकर बोलने का अभ्यास कर लिया। यदि कहीं कोई कमी थी, तो वह कुमार की गठीली कद-काठी में थी, किंतु उसका समाधान भी ध्रुवदेव ने अपनी युक्ति से निकाल लिया।अंततः, पूरी तैयारी के बाद दोनों मित्र राजकुमारी के नित्य आवागमन वाले मार्ग पर एक ओट में छिपकर बैठ गए और सही क्षण की प्रतीक्षा करने लगे।
'क्रमशः'
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अगले भाग में: "विधि का विधान" और "मन का हठ"—क्या कुमार की यह गुप्त पैठ सुवर्णा की पट्टी के पीछे छिपा सत्य उजागर कर पाएगी? सखियों और सेविकाओं के कड़े पहरे के बीच, क्या यह 'नया चेहरा' अपनी जगह बना पाएगा? या पकड़े जाने पर सौवीरनगर के राजकुमार को सुवर्णपुर के कारागार का मुख देखना होगा?
जानने के लिए पढ़ते रहिए...
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