कुसुमा की विदाई
पिछले भाग में:
सोबती नदी के तट पर सुवर्णा ने कुसुमा को अपने पूर्वजन्म का वह रहस्य बता दिया, जिसे सुनकर राजकुमार स्तब्ध रह गए। उन्हें अहसास हुआ कि उनके स्वप्न और सुवर्णा की स्मृतियाँ एक ही प्रेम कहानी के दो हिस्से हैं। अब चुनौती यह थी कि कुसुमा के भेष में रहते हुए वे इस सत्य को सिद्ध कैसे करें...।
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ध्रुवदेव कुछ क्षण निशब्द रहकर विचार करने लगे, फिर बोले, "कौशल तो प्रशंसनीय है, किंतु है तो यह भी एक प्रकार का छल ही! खैर, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग भी न था। तो अब आपने भविष्य के लिए क्या योजना बनाई है?"
कुमार बोले, "मैं कुमारी से किसी युक्ति से कुछ समय के लिए अवकाश माँगूँगा। इस अंतराल में तुम और मैं विचार करेंगे कि आगे की रणनीति क्या हो? सब कुछ जानने के पश्चात अब मैं कुमारी का साथ छोड़ना नहीं चाहता, विशेषकर तब, जब मैं स्वयं भी अपने हृदय में उनके प्रति प्रगाढ़ अनुराग अनुभव कर रहा हूँ। प्रश्न केवल यह है कि उन्हें वास्तविकता कैसे समझाई जाए? (एक दीर्घ श्वास लेकर) देखते हैं, विधाता ने हमारे भाग्य में आगे क्या लिखा है।"
कुछ समय तक अन्य विषयों पर चर्चा करने के उपरांत कुमार सावधानीपूर्वक महल लौट आए।
अगले दिन से कुमार (कुसुमा) कुमारी के सम्मुख तनिक शांत और अंतर्मुखी रहने लगे। एक दिन माधवी ने टोक ही दिया, "क्या बात है कुसुमा? आजकल तू बहुत चुप-चुप सी रहती है?"
कुमारी ने भी चिंता जताई, "मैं भी यही पूछने वाली थी सखी! तू स्वस्थ तो है न?"
कुसुमा ने उदास मुख बनाकर कहा, "अरे! आप सब तो व्यर्थ ही व्याकुल हो गईं। मैं पूर्णतः स्वस्थ हूँ, बस इन दिनों माता-पिता की स्मृति बहुत सता रही है। मन करता है कि एक बार उनसे मिल आऊँ। मेरे अकस्मात लुप्त हो जाने से न जाने उन पर क्या बीत रही होगी। एक बार मिलकर सब सत्य बता दूँगी तो उन्हें ढाढस हो जाएगा।"
कुमारी सहृदयता से बोलीं, "तेरी चिंता उचित है। तू कहे तो मैं तेरी यात्रा का समुचित प्रबंध करा दूँ?"
कुसुमा बोली, "आपकी उदारता हेतु बहुत आभार कुमारी जी! किंतु इसकी आवश्यकता नहीं होगी, मैं स्वयं यात्रा करने में सक्षम हूँ। मैं तो बस इस संकोच में थी कि आप मुझे अनुमति देंगी या नहीं। मैं आपकी करुणा की अत्यंत कृतज्ञ हूँ... सच कहूँ तो आपका साथ छोड़कर जाने की इच्छा ही नहीं होती (एक प्रकार से कुमार ने अपने मन की वास्तविक वेदना कह दी थी), किंतु एक बार जाना अनिवार्य प्रतीत होता है।"
कुमारी ने स्नेहपूर्वक कहा, "कृतज्ञता कैसी पगली! तू तो मेरी प्रिय सखी बन चुकी है। और माता-पिता से भेंट के लिए अनुमति की क्या आवश्यकता? अपनों से मिलने की व्याकुलता मैं समझ सकती हूँ। विस्मय है कि यह विचार मुझे पहले क्यों नहीं आया! तू निस्संकोच तैयारी कर और जा... बस एक बार रानी माँ से आज्ञा ले ले।"
माधवी ने भी समर्थन किया, "कुमारी सत्य कह रही हैं कुसुमा! तुझे अवश्य जाना चाहिए। मिलकर शीघ्र लौट आना, हम सब सखियाँ तेरी प्रतीक्षा करेंगी।"
अंततः कुसुमा बने कुमार ने राजकुमारी और महारानी से अनुमति ली और महल से निकलकर, अत्यंत सावधानीपूर्वक अपना भेष बदलकर ध्रुवदेव से जा मिले। अब वे पुनः एक साधारण पथिक के भेष में थे; उन्हें देखकर कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कुछ समय पूर्व तक वे एक स्त्री के रूप में थे।
ध्रुवदेव और कुमार कई दिनों तक गहन मंत्रणा करते रहे। अंततः उन्होंने एक ठोस योजना बनाई और उसे क्रियान्वित करने हेतु आवश्यक सामग्री और साधन जुटाने में संलग्न हो गए।
कुसुमा के प्रस्थान के कुछ दिनों पश्चात, चंदनगढ़ में एक घुमंतू नाटक-मंडली का आगमन हुआ। इस मंडली में लोक-नृत्य और नाट्य कला में निपुण अत्यंत कुशल कलाकार सम्मिलित थे। मंडली का प्रदर्शन इतना मनमोहक था कि उसे देखने हेतु लोगों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती थी। वे रात्रि में नाटक का मंचन करते और जनमानस का मनोरंजन करते थे। स्थान-स्थान पर अपनी कला का प्रदर्शन करती हुई यह मंडली धीरे-धीरे चंदनगढ़ की राजधानी, सुवर्णपुर आ पहुँची।
सुवर्णपुर में भी इस मंडली ने अपनी कलाकारी से खूब वाहवाही बटोरी। कलाकारों का कौशल और व्यवहार इतना शालीन था कि संभ्रांत परिवारों से उन्हें आमंत्रण मिलने लगे। वे बड़ी-बड़ी हवेलियों में जाकर अपनी प्रस्तुति देते और पुरस्कार पाते। धीरे-धीरे मंडली की ख्याति राजमहल के गलियारों तक भी जा पहुँची। महल के कई सेवकों ने उनका प्रदर्शन देखा था और वे आपस में उनकी प्रशंसा करते थकते नहीं थे। कर्मचारियों और नगरवासियों से सुनकर राजकुमारी सुवर्णा की सखियों के बीच भी इस मंडली की चर्चा फैल गई।
सखियों ने राजकुमारी से मंडली की कला देखने का बार-बार अनुरोध किया, किंतु प्रारंभ में राजकुमारी इसे टालती रहीं। जब कुछ सखियों ने स्वयं जाकर नाटक देखा और लौटकर उसका सजीव वर्णन किया, तो राजकुमारी के मन में भी जिज्ञासा उत्पन्न हुई, जिसे सखियों के उत्साह ने और अधिक बढ़ा दिया।
अंततः, सखियों और महारानी के विशेष आग्रह पर राजकुमारी नाटक देखने हेतु सहमत हो गईं। यह निश्चित हुआ कि महल के प्रांगण में मंडली एक विशेष नाटक का मंचन करेगी, जिसे केवल राजपरिवार, गणमान्य नागरिक और सखियाँ ही देखेंगी। संयोगवश कुलगुरु का भी आगमन हो गया था, अतः वे भी दर्शक दीर्घा में उपस्थित रहे। राजकुमारी के लिए एक विशेष ओट (पर्दे) की व्यवस्था की गई, जहाँ से वे अपनी सखियों के साथ नाटक का आनंद ले सकें। साथ ही, मंडली को कह दिया गया कि नाटक का मंचन इस तरह करें कि कुमारी सिर्फ सुनकर भी नाटक का आनंद ले सकें। आश्चर्यजनक रूप से मंडली ने इस चुनौती को स्वीकार भी कर लिया कि वे नाटक के संवादों को दृश्य की तरह पिरोकर सुनने योग्य बना देंगे। खैर, समस्त व्यवस्था पूर्ण होने के पश्चात, मंडली ने अपना कार्यक्रम आरंभ किया।
मंच पर नाटक का मंचन आरंभ हुआ। सर्वप्रथम साधारण वेशभूषा में 'ढोली' बने कुमार मंच पर उपस्थित हुए और नाटक की भूमिका बाँधते हुए बोले..., "चंदनगढ़ के महाराज-महारानी एवं कुमारी को विक्रमकुमार का प्रणाम! सभी उपस्थित गणमान्य जनों को भी हमारा अभिवादन! आप सबको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि यह नाटक किसी सुनी-सुनाई लोककथा पर नहीं, बल्कि मेरे उन रहस्यमयी स्वप्नों पर आधारित है जो मुझे अक्सर बेचैन कर देते हैं। यह गौरा-गौरैया के उस आत्मिक बलिदान की गाथा है जिसे मैंने अपनी बंद आँखों से बार-बार देखा है। आज वही सत्य पहली बार नाटक के रूप में संयोजित करके मैं आप सबके समक्ष प्रस्तुत करने आया हूँ। आशा है कि यह प्रस्तुति आपको रुचिकर, सम्मोहक और आश्चर्यजनक लगेगी और आपके हृदय को स्पर्श करेगी।"
'क्रमशः'
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अगले भाग में:
क्या राजकुमार का यह 'स्वप्न-नाटक' सुवर्णा के हृदय के तारों को झंकृत कर पाएगा? जब मंच पर गौरा-गौरैया का विरह जीवंत होगा, तो क्या राजकुमारी अपनी आँखों की पट्टी खोलकर उस 'ढोली' का चेहरा देखना चाहेंगी?
✍️‘निःशब्द’ की कलम से
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित
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