Saturday, June 6, 2026

🌸सत्य की परिभाषा🌸

मित्रों! आज 'सत्य' के संबंध में आप लोगों से एक पढ़ी हुई कहानी और उस पर अपने विचार साझा करना चाहती हूँ।

​ज्यादातर लोग 'सत्य' का अर्थ किसी घटना या वस्तुस्थिति का ज्यों का त्यों बयान करना मान लेते हैं... यानी वे शाब्दिक ईमानदारी को ही सत्य समझ बैठते हैं; फिर चाहे वह आत्मा के साथ बेईमानी करके ही क्यों न प्राप्त हो, और उसका परिणाम कितना भी दुखदायी क्यों न हो। किंतु इस कहानी में इससे बिल्कुल भिन्न और व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है....👇

​कहानी है...,

सत्य की परिभाषा

​मशहूर दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल एक बार भ्रमण पर निकले हुए थे। जंगल में उन्होंने एक बहुत हारी, थकी, लँगड़ाती और कराहती हुई लोमड़ी को देखा। उसे देखकर साफ़ लग रहा था कि वह किसी बड़ी विपत्ति से बचने के लिए बेहद घबराई हुई है और भाग रही है।

​थोड़ी ही देर में वहाँ सामने से शिकारी आ पहुँचे।

​उन्होंने रसेल से पूछा— "क्या आपने इधर से किसी लोमड़ी को जाते हुए देखा है?"

​रसेल ने कहा— "हाँ।"

​"तो वह किधर गई है?" — शिकारियों ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।

रसेल ने उँगली से इशारा किया और लोमड़ी के जाने की विपरीत दिशा बता दी। इस प्रकार शिकारी भटक गए और उस बेज़ुबान लोमड़ी की जान बच गई।

​बर्ट्रेंड रसेल ने अपने इस संस्मरण का उल्लेख करते हुए अपने दर्शन ग्रन्थ में लिखा है— 'मैं नहीं मानता कि मैंने वहाँ असत्य व्यवहार किया। जिसमें मनुष्य का उद्देश्य ऊँचा और कल्याणकारी हो, वह व्यवहार में कुछ भी क्यों न हो, सत्य ही कहा जाना चाहिए। यदि मैं शिकारियों को लोमड़ी के जाने की सही दिशा बता देता, तो मेरी दृष्टि में वह सत्य दिखाई पड़ने वाला व्यवहार वस्तुतः असत्य ही होता।'

[कहानी ​‘अखण्ड ज्योति, जून-1976 से साभार’]

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​इस कहानी में यह बेहद स्पष्टता से रेखांकित किया गया है कि बोला गया सच सदैव 'सत्य' हो, यह आवश्यक नहीं। 'सच' का दायरा प्रायः वाचिक (बोलने) या प्रमाण प्रस्तुत करने तक सीमित होता है, किंतु 'सत्य' तो सर्वव्यापी है, उससे परे कुछ भी नहीं। देखा जाए तो व्यापक सत्य में 'सच' और 'झूठ' दोनों समाहित होते हैं। या यूँ कहें कि सच और झूठ दोनों ही सत्य के अंग हैं; सत्य इन दोनों के मेल से बनता है और दोनों से कहीं अधिक विस्तृत हो जाता है।

जैसा कि उपरोक्त कहानी में रसेल ने माना है— अगर वह शिकारियों को सच बता देते, तो सच बोलकर भी उन्हें सत्य की अनुभूति नहीं होती; और सच न बताकर उन्होंने जो झूठ बोला, उसे बोलकर भी उन्हें असत्य की प्रतीति नहीं हुई। क्यों? क्योंकि उनकी आत्मा ने स्वीकारा कि उन्होंने एक 'हितकारी सत्य' बोला है, कोई 'अहितकारी सच' नहीं।

​ध्यान देने योग्य बात यह है कि शब्द से अर्थ, अर्थ से भाव और भाव से परिणाम कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है... फिर भला उस शाब्दिक सच को सत्य कैसे कहा जा सकता है, जिसका अर्थ अहितकारी और भाव पूरी तरह असंवेदनशील हो?

​निश्चय ही ऐसा कथित सत्य केवल 'सच' हो सकता है, परंतु 'सत्य' कभी नहीं हो सकता।

​आमतौर पर लोग सच और सत्य को एक ही मान लेते हैं। दरअसल हिंदी और संस्कृत में कई ऐसे शब्द हैं जिन्हें आपस में पर्यायवाची या समानार्थी मान लिया जाता है, किंतु वास्तव में ऐसा है नहीं। हिंदी और संस्कृत का लगभग हर शब्द अपने आप में एक स्वतंत्र और विशिष्ट अर्थ रखता है। आखिर सोचने की बात है कि अगर किसी चीज़ के लिए एक शब्द पहले से मौजूद था, तो फिर दूसरे शब्द की रचना क्यों की गई?

​ऐसा इसलिए, क्योंकि वे बिल्कुल एक ही अर्थ में प्रयुक्त नहीं होते। हाँ, उपयोग की सुगमता की दृष्टि से किंचितकाल के लिए उनके अर्थ को समान मानकर उन्हें आपस में पर्यायवाची कह दिया जाता है। अक्सर मिलते-जुलते अर्थ वाले कई शब्दों की भूमिका वैसी ही होती है, जैसे एक ही व्यक्ति के कई पदनाम (Designations) हों। अर्थात, एक ही व्यक्ति पिता, मामा, बॉस, मैनेजर और पुत्र जैसे कई पदनाम धारण करता है, और हर पद के साथ उसका व्यवहार एवं भूमिका बदल जाती है। व्यक्ति वही है और उसका एक विशिष्ट नाम भी है, किंतु संदर्भ के अनुसार उसके पदनाम बदल जाते हैं।

​उदाहरण के लिए सूर्य के पर्यायवाची लें: सूर्य, दिनकर, आदित्य, प्रभाकर।

  • सूर्य: जो देवताओं या सुरों में प्रधान है, वह सूर्य है।
  • दिनकर: जो अंधकार को मिटाकर 'दिन' का आरंभ करे, वह दिनकर है।
  • आदित्य: जो दिवस के आदि और अंत का मुख्य कारक है, वह आदित्य है।
  • प्रभाकर: 'प्रभा' यानी प्रकाश को फैलाने वाला प्रभाकर है।

​यहाँ 'सूर्य' जिसका मुख्य नाम है, विभिन्न संदर्भों और अर्थों में दिनकर, आदित्य एवं प्रभाकर उसी के विशिष्ट पदनाम हैं। इस प्रकार एक ही सूर्य परिस्थिति के अनुसार कई पदनाम धारण करता है। (अन्य उपयुक्त शब्दों पर फिर कभी विस्तार से बात करेंगे)। इस तरह किसी शब्द के पर्यायवाची के अर्थ या उपयोग हर बार भिन्न हो सकते हैं।

​अब लौटते हैं 'सत्य' और 'सच' पर। हमारे वचन, घटना या कर्म में व्यावहारिक सच्चाई या किसी चीज़ का ज्यों का त्यों वर्णन करना 'सच' कहलाता है। सच का एक स्पष्ट विलोम भी है— 'झूठ'। परंतु सत्य इससे भिन्न है; तात्विक सत्य का कोई विलोम नहीं होता। हाँ, साधारण व्यावहारिक रूप में हम असत्य को सत्य का विलोम मान लेते हैं, किंतु गहराई में ऐसा नहीं है। संभवतः यहाँ कुछ लोग 'मिथ्या' शब्द का ज़िक्र करें, किंतु मैं कहूँगी कि सत्य के संदर्भ में मिथ्या का अर्थ बिल्कुल अलग है। जहाँ सत्य में संसार का अस्तित्व समाहित है, वहीं मिथ्या में सिर्फ वही आता है जिसकी प्रतीति (आभास) तो होती है, किंतु वास्तविकता में उसका कोई वजूद नहीं होता (जैसे मृगमरीचिका)।

​दोस्तों! वास्तव में सत्य न तो कोई कोरा शब्द है, न कोई अर्थ है और न ही कोई तयशुदा सामाजिक व्यवहार; बल्कि यदि सत्य की कोई सबसे सटीक और संक्षिप्त परिभाषा है, तो वह है…

'सत्यम् शिवम् सुंदरम्'…

अर्थात तात्विक रूप से जो भी अपने प्रभाव में सुंदर और अपने परिणाम में 'शिव' (कल्याणकारी) हो, वही सत्य है।

​मेरे विचार से तो सत्य, ज्ञान और ईश्वर परस्पर एक ही हैं या एक जैसे ही हैं, क्योंकि इन तीनों की मूल व्याख्या बिल्कुल समान है…

  • ​तीनों ही परम सुंदर और परम कल्याणकारी हैं।
  • ​तीनों ही सर्वव्यापी एवं समय से परे (कालोपरि) हैं।
  • ​तीनों ही अपरिवर्तनीय और अखंड हैं।
  • ​तीनों को ही पूर्णतः जान लेना, समझ लेना और प्राप्त कर लेना असीम है।
  • ​तीनों से परे कुछ नहीं और इन तीनों का वास्तविक रूप में कोई विलोम नहीं है (असत्य, अज्ञान एवं अंधकार तो सिर्फ प्रकाश या ज्ञान की अनुपस्थिति और अहंकार का फैलाया भ्रम मात्र हैं, विलोम नहीं)।

​इन तीनों के ही बारे में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है:

"जानत तुम्हहि, तुम्हहि होई जाई।"

​इसलिए सत्य के आग्रही को 'सच' का वाचन करते हुए हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि— अगर आप व्यावहारिक रूप से सत्य को केवल वचन ही मानते हैं, तो भी बोलने से पहले उसके परिणाम पर विचार अवश्य करें... क्योंकि अगर उसका परिणाम कल्याणकारी नहीं है, तो आपका वह वचन 'सच' चाहे हो, पर 'सत्य' कभी नहीं हो सकता। इसीलिए सामान्यतः दिल दुखाने वाले, किसी का अशुभ या अहित करने वाले कड़वे सच को बोलने से यथासंभव बचना ही उचित है।

​सत्य पर शास्त्रों का यह श्लोक बेहद उल्लेखनीय है:

"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।

प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः।।"

अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, लेकिन यदि सच कड़वा (अहितकारी) हो तो ऐसा अप्रिय सच मत बोलो। साथ ही, किसी को रिझाने के लिए ऐसा मीठा झूठ भी मत बोलो जो तुम्हारी वाणी को दूषित करके तुम्हें मिथ्यावादी बना दे। यही सनातन धर्म है।

​एक और स्थान पर प्रसिद्ध संत कबीर दास जी ने कहा है:

"साँचे बराबर तप नहीं..."

​यह एक बेहद प्रसिद्ध दोहे का पहला चरण है, जिसे निश्चय ही आप सबने सुना या पढ़ा होगा। दोहे की इस पंक्ति में कहा गया है कि सच बोलना एक महान तपस्या है। परंतु यहाँ 'तपस्या' का वास्तविक अर्थ क्या है? हमने अक्सर देखा है कि कुछ लोग कर्कश, अभद्र और मर्मभेदी कड़वा सच बोलने को अपनी बहुत बड़ी तपस्या या वीरता मान लेते हैं और सब ओर शब्दों का ज़हर उगलते फिरते हैं। पर क्या सचमुच यह तपस्या है? ऐसे कटु वचन बोलने वाले ने भला कौन सी साधना सिद्ध की? क्या बेलगाम वाणी तपस्या है या वाणी का उचित, संयमित और संवेदनशील उपयोग तपस्या है? सोचिएगा अवश्य...😊

अंत में यही कहूँगी कि अगर मेरे पास किसी समय बोलने योग्य सच न हो, तो मैं किसी झूठ या अप्रिय सच की जगह 'मौन' को चुनना पसंद करूँगी। मेरी दृष्टि में यह अकारण या ज़बरदस्ती बोले गए अहितकारी सच से सौ गुना बेहतर चुनाव होगा।

​चलते-चलते, सच बोलने के इसी संदर्भ में अपनी ही लिखी चंद पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रही हूँ:

"क्यूँ न थोड़ा सोच लें... कुछ बोलने से पहले,

शब्दों के खुशनुमा फूल चुन लें... लब खोलने से पहले।

आखिर शब्दों की खिड़की से... हमारी सोच झलकती है साहिब!!

चलो अपनी सोच सँवार लें 'निःशब्द'... इस झरोखे को खोलने से पहले।"


​मित्रों! आज के लिए बस इतना ही...😊

​आपका दिन शुभ और मंगलमय हो...🙏🌷

✍️ 'निःशब्द' की कलम से....💕

🖌️तस्वीरें जेमिनी & कोपिलॉट (एआई) की सहायता से निर्मित🌷

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अगला सुझाव:

​"आप किस लेबल से पहचाने जाते हैं?" आज हम मनुष्यता या रिश्तों की बजाय पहचान के लेबल्स से एक दूसरे की पहचान क्यों करते हैं?

फुर्सत निकाल कर अवश्य पढ़ें, और अंत में दिए गए सवाल का जवाब भी ढ़ूढ़ें, शायद कुछ ऐसा मिल जाए जो खो गया है...🙏💕

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