अंतर्मन की थाह और राजसी निर्णय
पिछले भाग में:
नाटक के मंच पर पूर्वजन्म के सत्य को जीवंत होते देख राजकुमारी सुवर्णा स्वयं को सँभाल न सकीं। उनके विचलित होने और उस अजनबी 'ढोली' के दावे ने राजमहल में हलचल मचा दी। महाराज ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नाट्य-मंडली को महल में ही रुकने का आदेश दिया और सभा विसर्जित कर दी।
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महाराज की आज्ञा से उस समय सभा विसर्जित कर दी गई। मंडली को महल में ही रोक लिया गया। राजा-रानी भली-भाँति समझ चुके थे कि यह बात वायु के वेग के समान पूरे राज्य में फैल जाएगी।
महाराज के सुझाव पर राजकुमारी के मन की थाह लेने और उनके विचारों को जानने हेतु महारानी स्वयं सुवर्णा के कक्ष में पधारीं। उन्हें देखते ही राजकुमारी और उनकी सखियों ने खड़े होकर सादर अभिवादन किया। महारानी के संकेत मात्र से कक्ष को एकांत कर दिया गया और सभी सखियाँ बाहर चली गईं।
महारानी आगे बढ़ीं और राजकुमारी के शीश पर हाथ फेरकर वात्सल्यपूर्ण स्वर में बोलीं, "पुत्री, जो घटित होना था वह हो गया, अतः स्वयं को अपराधबोध या पछतावे की अग्नि में न जलाओ। कदाचित नियति को यही स्वीकार था। हम यहाँ तुम्हें और अधिक व्यथित करने नहीं आए हैं, अपितु मैं और तुम्हारे पिता यह जानना चाहते हैं कि अब तुम्हारी अभिलाषा क्या है? आज जो हुआ, उसे संपूर्ण राज्य में प्रसारित होने से रोकना अब हमारे वश में नहीं है, किंतु हम तुम्हारे जीवन में तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी घटित नहीं होने देंगे। हमें स्पष्ट बताओ पुत्री, क्या तुम्हें पूर्ण विश्वास है कि वह व्यक्ति तुम्हारे पूर्वजन्म का वही साथी हो सकता है?"
कुछ रुककर महारानी ने पुनः आगे बढ़कर स्नेह से कहा, "यदि तुम्हारी यही इच्छा है, तो हम तुम्हारा विवाह उसी के साथ संपन्न कराएंगे, चाहे वह किसी साधारण कुल से ही क्यों न हो। तुम्हें किसी वस्तु का अभाव नहीं होने दिया जाएगा।"
राजकुमारी मौन साधे रहीं, तो महारानी पुनः बोलीं, "बेटी, अब और अधिक मौन न रहो। हम तुम्हारी वास्तविक इच्छा जानना चाहते हैं।"
राजकुमारी ने हिचकते हुए, अत्यंत धीमे स्वर में कहा, "माँ! मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझे तनिक भी आभास नहीं था कि यह सत्य इस प्रकार सबके सम्मुख आ जाएगा। मैं सदैव आपसे यह कहना चाहती थी, किंतु संकोचवश कह न सकी। मैं अपने पूर्वजन्म के स्वामी को आज भी अपना पति स्वीकार करती हूँ। वे पिछले जन्म में भी अत्यंत दयालु और मुझसे अगाध प्रेम करने वाले थे। मेरी इच्छा थी कि यदि आपका और पिताजी का आशीर्वाद प्राप्त हो, तो मेरा उनसे ही विवाह करना उचित और सुखद होगा। किंतु अभी इस व्यक्ति के संबंध में बिना जाँच किए विश्वास नहीं कर पाऊँगी।" यह कहकर कुमारी ने लज्जा एवं संकोच से सिर झुका लिया।
यह सुनकर महारानी कुछ क्षण विचारमग्न रहीं और फिर एक दीर्घ श्वास लेकर खड़ी हुईं। उन्होंने कहा, "पुत्री! मैं इस विषय में महाराज से मंत्रणा करूँगी। तुम निश्चिंत रहो, सब कुछ तुम्हारे अनुकूल ही होगा। किंतु निर्णय से पूर्व हम उस व्यक्ति के विचार भी जानना चाहेंगे; आज की इस उथल-पुथल में हम उनका नाम तक ज्ञात नहीं कर पाए। अभी तुम विश्राम करो और अपना ध्यान रखो। स्मरण रहे, तुम मेरी और अपने पिता की अत्यंत प्रिय एकमात्र संतान हो।"
यह कहकर, राजकुमारी का मस्तक चूमकर महारानी वहाँ से प्रस्थान कर गईं।
राजकुमारी के कक्ष से निकलकर महारानी सीधे महाराज के समीप पहुँचीं और उन्हें पुत्री की इच्छा से अवगत कराया। महारानी की बात सुनकर महाराज कुछ क्षण गहन चिंतन में डूबे रहे, फिर एक दीर्घ श्वास लेकर बोले, "यदि हमारी पुत्री की यही अभिलाषा है, तो ऐसा ही होगा। किंतु निर्णय से पूर्व उस व्यक्ति के विषय में पूर्णतः जान लेना हमारा भी उत्तरदायित्व है। मैं भी कुमारी से सहमत हूँ, हम यूँ ही उस पर विश्वास नहीं कर सकते। यद्यपि यह प्रकरण पूर्वजन्म से संबंधित है, तथापि अपनी संतुष्टि हेतु उससे सूक्ष्म पूछताछ करना अनिवार्य है। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम कुलगुरु देव से परामर्श करें; वे इस रहस्य के विषय में हमसे कहीं अधिक ज्ञाता हैं। वे उस बलिदान के साक्षी भी रहे हैं, और वह त्याग तो उन्हीं के हेतु किया गया था।"
महारानी ने सहमति जताते हुए कहा, "अवश्य महाराज! हमें अविलंब उनसे भेंट करनी चाहिए। सौभाग्य से वे इस समय राजमहल में ही उपस्थित हैं। कदाचित उन्हें यह सब पूर्व से ही ज्ञात था, ठीक वैसे ही जैसे वे जानते थे कि सुवर्णा अपने सत्रहवें जन्मोत्सव पर आँखों पर पट्टी बाँध लेगी और ऐसा करने का कारण क्या होगा। विडंबना देखिए कि हम अब तक उस ढोली का ठीक से नाम तक नहीं जान पाए हैं।"
महाराज ने कहा, "हुंम... हमें उनसे वार्ता करनी ही होगी। मैं भी यही विचार कर रहा था, किंतु प्रतीक्षा थी कि पहले आप सुवर्णा से बात कर लें। मैं चाहता हूँ कि कुलगुरु के साथ संवाद के समय आप भी मेरे साथ रहें, ताकि उस व्यक्ति को समझने में मुझे आपकी दृष्टि का भी सहयोग प्राप्त हो सके। अंततः यह हमारी इकलौती पुत्री के भविष्य का प्रश्न है।"
"अवश्य राजन्! मैं आपके साथ हूँ," महारानी दृढ़ता से बोलीं।
महाराज ने निर्णय सुनाया, "ठीक है, हम अतिथि-भवन में कुलगुरु के कक्ष में चलते हैं और वहीं उस ढोली को बुलाकर उससे वार्ता करेंगे। वहाँ केवल आप, मैं और कुलगुरु ही उपस्थित रहेंगे।" महारानी ने सिर झुकाकर अपनी स्वीकृति दी।
महाराज ने तत्काल सेवक को बुलाकर आदेश दिया, "शीघ्र जाओ और नाट्य-मंडली के उस मुख्य गायक को पूर्ण आदर के साथ अतिथि-भवन में कुलगुरु के कक्ष में लेकर आओ। उसे हमारा संदेश दे देना कि हम उससे एकांत में भेंट करना चाहते हैं, अतः मंडली का अन्य कोई सदस्य साथ नहीं आएगा।"
उधर महल के अतिथि-भवन के एक कक्ष में ठहरी हुई नाट्य-मंडली स्वयं को कैदी की भाँति महसूस कर रही थी और भयभीत थी। वातावरण में व्याप्त भारी चुप्पी को देख ऐसा लगता था मानो हर कोई किसी बड़े संकट की पदचाप सुन रहा हो। तभी अकस्मात, ढोलकिया यानी कुमार के लिए बुलावा लेकर एक प्रहरी वहाँ उपस्थित हुआ।
प्रहरी ने सधे हुए स्वर में कहा, "महाराज ने आपको बुलावा भेजा है। हमारे साथ चलिए, वे आपसे एकांत में वार्ता करना चाहते हैं।"
कुमार के साथ जब ध्रुवदेव भी व्याकुलता में उठ खड़े हुए, तो प्रहरी ने हाथ के संकेत से उन्हें रोकते हुए कड़े शब्दों में कहा, "आप साथ नहीं आ सकते। महाराज का आदेश केवल इनके लिए ही है।"
ध्रुवदेव के माथे पर उभरी चिंता की लकीरों को देख कुमार ने अपनी आँखों की चमक से उन्हें आश्वस्त किया, मानो कह रहे हों कि सब ठीक होगा। इसके बाद वे शांत और गरिमापूर्ण कदमों से प्रहरी के पीछे चल दिए।
'क्रमशः'
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अगले भाग में:
क्या राजकुमार, महाराज और कुलगुरु के तीखे सवालों का सामना कर पाएंगे? क्या कुलगुरु अपनी दिव्य दृष्टि से 'ढोली' के पीछे छिपे 'राजकुमार' को पहचान लेंगे? और सबसे बड़ी बात—क्या महाराज एक साधारण ढोली को अपनी इकलौती संतान सौंपने के लिए तैयार होंगे?
✍️‘निःशब्द’ की कलम से..🥀
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित..🌷
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