Saturday, June 6, 2026

राजकुमारी सुवर्णा: भाग- २८

पूर्वजन्म के रहस्योद्घाटन का मंच

​पिछले भाग में:
कुसुमा (राजकुमार) की विदाई के बाद चंदनगढ़ में एक रहस्यमयी नाट्य-मंडली का आगमन हुआ। राजकुमारी सुवर्णा की जिज्ञासा और सखियों के हठ पर, महल के प्रांगण में एक विशेष नाटक का आयोजन किया गया। 'ढोली' के भेष में राजकुमार ने मंच पर आकर घोषणा की कि यह नाटक उनके अपने स्वप्नों पर आधारित है।
​मंच पर नाटक का मंचन आरंभ हुआ।

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सर्वप्रथम साधारण वेशभूषा में 'ढोली' बने कुमार मंच पर उपस्थित हुए और नाटक की भूमिका बाँधते हुए बोले, "तो दर्शकगणों! यह नाटक किसी सुनी-सुनाई लोककथा पर नहीं है, बल्कि मेरे उन रहस्यमयी स्वप्नों पर आधारित है जो मुझे अक्सर बेचैन कर देते हैं। यह गौरा-गौरैया के उस आत्मिक बलिदान की गाथा है जिसे मैंने अपनी बंद आँखों से बार-बार देखा है। पहली बार अपने स्वप्नों का नाट्य रूपांतरण किया है और यह हमारी पहली प्रस्तुति है, अतः संभावित भूलों के लिए अग्रिम क्षमा प्रार्थी हूँ। मुझे और मेरी मंडली को विश्वास है कि यह प्रस्तुति आपको रुचिकर, सम्मोहक और आश्चर्यजनक लगेगी और आपके हृदय को स्पर्श करेगी।"
​'गौरा-गौरैया' का नाम और कुमार की 'स्वप्न' वाली बात सुनते ही राजकुमारी स्वर्णप्रभा स्तब्ध रह गईं। उन्हें गहरा विस्मय हुआ कि जो उनके पूर्वजन्म का गुप्त सत्य है, वह इस अजनबी कलाकार के स्वप्नों में कैसे जीवित है? वे अत्यंत उत्सुकता और बेचैनी के साथ नाटक सुनने लगीं।

​ध्रुवदेव 'वृक्ष' का पात्र निभा रहे थे, जो कथा के मध्य में सूत्रधार की भाँति कड़ियाँ जोड़ रहे थे। उनके साथ कुमार ढोली के रूप में बीच-बीच में काव्य पंक्तियाँ सुना रहे थे। इन दोनों के शब्दों के साथ मंडली के अन्य कलाकार यथायोग्य भेषभूषा धारण कर जीवंत अभिनय कर रहे थे। 
ढोली ने अपना संवाद छंद के रूप में आरंभ किया:
​"सुनो-सुनो राजा और रानी! राजकुमारी सुनो कहानी!
है ये कहानी बड़ी पुरानी, मुझे सुनावे मेरी नानी! सुनो कहानी, सुनो कहानी..."
वाद्य-यंत्रों की मधुर ध्वनि गूँज उठी।
तत्पश्चात वृक्ष बने ध्रुवदेव बोले:
​"एक था जंगल बड़ा पुराना, नहीं किसी का आना-जाना।
मेरी टहनी पर बसता था, एक घरौंदा बड़ा सुहाना।
एक था गौरा, इक गौरैया, साथ खे रहे जीवन नइया।
खुशी-खुशी बच्चे पलते थे, दोनों संग दाना चुनते थे।
बालक बड़े भए उड़ जाते, मात-पिता का मन हरसाते।"
तभी ढोली ने सुर मिलाया: "एक रात जाड़े की आई, बड़ी भयंकर थी पछुआई।"
​मंच पर एक कलाकार 'पथिक' के रूप में आया और वृक्ष के नीचे बैठकर ठंड से ठिठुरने का अभिनय करने लगा। 

ध्रुवदेव ने कथा आगे बढ़ाई: "एक पथिक आया दुखियारा, क्षुधा और ठंड का मारा।"
अब गौरा और गौरैया बने पात्रों के मध्य संवाद हुआ:
​गौरैया: "देखो प्रिय, हमारे नीड़ के नीचे एक अतिथि आया है।"
गौरा: "हाँ प्रिये, यह अत्यंत पीड़ित प्रतीत होता है। इसे शीत सता रही है। तुम सूखी लकड़ियाँ जुटाओ, मैं अग्नि का प्रबंध करता हूँ। हम मिलकर इसका कष्ट दूर करेंगे।"
मंच पर कलाकारों ने अग्नि प्रज्वलित करने का दृश्य दर्शाया। उधर, यह देखकर राजकुमारी और कुलगुरु की आँखों से अश्रु धारा बहने लगी, किंतु वे मौन साधे दृश्य देखते रहे।

​गौरैया पुनः बोली: "अग्नि ताप अतिथि हरषाया, पर भोजन बिन है दुखियारा। रात अँधेरी कहाँ हम जाएँ? कैसे अतिथि की क्षुधा मिटाएँ?"

​गौरा बोला: "प्रिये, यह रात्रि बड़ी कठोर है। मेरी बात सुनो, यदि मैं इस अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दूँ, तो इस तुच्छ देह से अतिथि की क्षुधा शांत हो सकती है।"
​गौरैया व्याकुल होकर चिल्लाई: "नहीं... नहीं स्वामी! आपके बिना मैं कैसे जीवित रहूँगी? शेष आयु कैसे कटेगी? इससे श्रेष्ठ है कि मैं स्वयं को अर्पित कर दूँ और अतिथि की क्षुधा मिटाऊँ।"

​मंच पर दोनों के बीच तर्क-वितर्क का मर्मस्पर्शी दृश्य दिखाया गया। वृक्ष बने ध्रुवदेव ने भारी स्वर में कहा: "आज छाँव मेरी रोती है, प्रेमी की आहुति होती है।"
​और अचानक, गौरा बने कलाकार ने प्रतीकात्मक अग्नि में छलांग लगा दी। 

ढोली बने कुमार के शब्द गूँजे: "और इस प्रकार उस रात उस गौरा ने 'अतिथि देवो भव' के आदर्श को चरितार्थ किया और कायरता के स्थान पर त्याग को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिया।"

​वाद्य-यंत्रों का शोर बढ़ा, पर तभी राजकुमारी की महीन किंतु मर्मभेदी चीख गूँज उठी: "बंद करो यह सब... अभी के अभी बंद करो!"
​वे सिसक-सिसक कर रोने लगीं। सखियाँ और महारानी उन्हें सँभालने दौड़ीं। यद्यपि राजा, रानी और कुलगुरु जानते थे कि यह कुमारी के पूर्वजन्म की स्मृति है, किंतु राजकुमारी ने आज तक स्वयं इसे कभी स्वीकार नहीं किया था। वे सब हतप्रभ थे कि अचानक यह रहस्य इस प्रकार नाटक के रूप में सबके सम्मुख कैसे आ गया।

​राजकुमारी को अत्यंत व्यथित और क्रोधित देखकर महारानी उन्हें समझाने लगीं, "यह तो केवल एक नाटक है सुवर्णे! भला इसमें इतना विचलित होने की क्या आवश्यकता है पुत्री? यह तो बस एक काल्पनिक कथा है।"
​राजकुमारी सिसकते हुए बोलीं, "नहीं, नहीं माँ, यह काल्पनिक कथा नहीं है... यह मेरी अपनी कहानी है! यह वही सत्य है जिसे मैं आज तक आप लोगों को सुना न सकी।"

​महाराज ने कुतूहलवश उस 'ढोली' को समीप बुलाया और उससे प्रश्न किया। कुमार ने बड़ी सहजता से दावा किया, "यह मेरे पूर्वजन्म की गाथा है महाराज, मैं ही वह 'गौरा' हूँ।" यह सुनकर राजकुमारी चिढ़ गईं और चिल्लाकर बोलीं, "तुम मिथ्या कह रहे हो! सर्वथा झूठ!"

​वह व्यक्ति अत्यंत विनम्रता से बोला, "क्षमा करें कुमारी, किंतु मैं असत्य नहीं कह रहा। मैं ही वह गौरा था... मैं गौरैया से पूर्व अग्नि में कूद गया था। मुझे नहीं ज्ञात कि मेरे पश्चात वह भी अग्नि को समर्पित हो गई या मुझे विस्मृत कर उसने नया जीवन आरंभ कर लिया।"

​राजकुमारी का क्रोध और बढ़ गया, "चुप रहो तुम! मुझे तुम्हारी एक भी बात पर विश्वास नहीं है।"
​महाराज, महारानी और उपस्थित सभी जन इस विचित्र विवाद एवं घटनाक्रम से चकित थे, केवल कुलगुरु के मुख पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी। चारों ओर कानाफूसी होने लगी। महाराज ने स्थिति की गंभीरता को भाँपते हुए सखियों को निर्देश दिया कि वे राजकुमारी को महल के भीतर ले जाएँ। उन्होंने मंत्री को आदेश दिया कि नाट्य-मंडली के ठहरने की व्यवस्था महल के ही एक सुरक्षित भाग में की जाए, ताकि इस विषय पर उचित निर्णय लिया जा सके।
​'क्रमशः'
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अगले भाग में:
क्या वह 'ढोली' ही सुवर्णा का खोया हुआ 'गौरा' है? राजकुमारी का क्रोध उनके अविश्वास का प्रतीक है या उस डर का कि कहीं कोई उनकी भावनाओं से खेल तो नहीं रहा? कुलगुरु की वह रहस्यमयी मुस्कान किस आने वाले सत्य का संकेत दे रही है?

✍️‘निःशब्द’ की कलम से...🥀
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी  & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित..🌷

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