सत्य का उद्घाटन एवं मौन स्वीकृति
पिछले भाग में:
राजकुमारी सुवर्णा की इच्छा जानने के बाद, महाराज ने नाट्य-मंडली के मुख्य गायक 'ढोली' को कुलगुरु के कक्ष में एकांत वार्ता के लिए बुलवाया। पूरा राजमहल इस रहस्यमयी मुलाकात के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा था।
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प्रहरी को नाट्यमंडली के ढोली को लाने का आदेश देकर राजा-रानी कुलुगुरू के कक्ष में पहुंचे और उन्हें प्रणाम करके बैठ गए। महाराज ने रानी द्वारा कुमारी सुवर्णा से हुई बातचीत संक्षेप में बता दी।
महाराज बोले, "मुझे आश्चर्य है तो इस बात का कि अगर उस रात के बलिदान के फलस्वरूप गौरैया राजकुमारी के रूप में जन्मी तो गौरा ने साधारण परिवार में कैसे जन्म लिया? आप क्या कहते हैं गुरुदेव!"
कुलुगुरू, "तुम्हारा आश्चर्य उचित है राजन्! लेकिन सृष्टि जबतक स्वयं अपने रहस्य न खोले उसके संकल्पों को ज्यों का त्यों स्वीकार करके जीवन का प्रहसन चलने देना चाहिए। तुम्हें चिंता नहीं करनी चाहिए, शिवशंभु ने सब पहले ही रच दिया है।"
राजा बोले, "चिंता कुछ भी नहीं है, गुरुदेव आपका आशीर्वाद और महादेव की कृपा है तो सब अच्छा ही होगा और वह युवक यदि उच्च चरित्र का है तो धन की समस्या नहीं है क्योंकि कुमारी हमारी एकमात्र कन्या है तो सोचना भी क्या? अगर आप निश्चिंत हैं तो मैं भी।"
महाराज की बात पर रानी ने भी गुरुदेव को प्रणाम कर अपनी स्वीकृति दी और गुरुदेव ने हाथ उठाकर दोनों को आशीर्वाद दिया।
इतने में प्रहरी के साथ कुमार ने कक्ष में प्रवेश किया, जहाँ दिव्य सुगंध और शांति का वास था। जैसे ही प्रहरी ने कुमार को राजा-रानी एवं कुलगुरु का परिचय दिया, कुमार ने पूर्ण विनम्रता के साथ झुककर उनका अभिवादन किया और निर्भय होकर एक ओर खड़े हो गए।
राजा और रानी उसे किसी पारखी की दृष्टि से बड़ी सूक्ष्मता से निहार रहे थे। वह युवक शारीरिक रूप से स्वस्थ, सुंदर और बलिष्ठ तो था ही, पर उससे भी अधिक उसकी आँखों में एक अद्भुत तेज और चाल-चलन में जन्मजात राजसी बड़प्पन झलक रहा था, जो ढोली के साधारण वस्त्रों के पीछे छुप नहीं पा रहा था।
महाराज ने अपनी राजसी गरिमा को बनाए रखते हुए बातचीत आरंभ की, "युवक! तुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ से आए हो और इस नाटक मंडली का हिस्सा कैसे बने? हम चाहते हैं कि तुम अपने विषय में हमें विस्तार से और सत्य बताओ।"
कुमार ने बिना किसी हिचकिचाहट के, अत्यंत सधे हुए और स्पष्ट स्वर में उत्तर दिया, "जैसी महाराज की आज्ञा! राजन्, मेरा नाम विक्रमकुमार है। मैं सौवीरनगर का निवासी हूँ। इसके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई विशेष परिचय नहीं है, इसीलिए मैं इस नाटक मंडली के साथ भ्रमण करता रहता हूँ। न तो मेरा कोई स्थाई ठिकाना है और न ही मैं यहाँ किसी अन्य को जानता हूँ।"
महाराज ने अपनी पैनी दृष्टि कुमार पर गड़ाते हुए पूछा, "युवक! तुमने आज जिस नाटक का मंचन किया है, क्या वह कहानी सचमुच तुम्हारे स्वप्नों में आती रहती है?"
विक्रमकुमार ने पूरी निष्ठा से उत्तर दिया, "शिवशंकर झूठ न बुलवाएँ, राजन्! बाल्यकाल से ही मैं यह कहानी स्वप्न में देखता आया हूँ, किंतु इसका मंचन आज पहली बार किया है।" यह कहते हुए ढोली के वेश में छिपे उस राजकुमार ने आदरपूर्वक अपना मस्तक झुका लिया।
महाराज के स्वर में जिज्ञासा बढ़ी, "तो फिर पहले कभी इसका मंचन क्यों नहीं किया?"
कुमार ने एक लंबी श्वास ली और व्यथा भरे स्वर में कहा, "राजन्! अपने हृदय की पीड़ा और स्वप्नों की बात हर किसी से नहीं कही जाती। आज आप जैसे महानुभावों के समक्ष साहस किया भी, तो देखिए... मैं कैदी बना खड़ा हूँ। इसीलिए क्षमा माँगता हूँ, महाराज! यदि मेरी वजह से किसी को कोई कष्ट पहुँचा हो, तो वह केवल अनजाने में हुई एक चूक थी। मुझे रत्ती भर भी आभास नहीं था कि मेरी यह निजी कहानी किसी और को भी ज्ञात होगी।"
महाराज ने सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, "संभवतः अब तक तुम यह तो समझ ही गए होगे कि तुम्हारे पूर्वजन्म की वह पत्नी, अब हमारी पुत्री के रूप में जन्मी है।"
कुमार ने सिर झुकाए हुए ही अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़े और कहा, "जी महाराज! अनुमान तो हो रहा है, किंतु मुझ जैसा साधारण व्यक्ति ऐसी महान बात मानने का दुस्साहस कैसे कर सकता है?"
तभी कुलगुरु, जो अब तक शांत थे, एक रहस्यमयी और अर्थपूर्ण मुस्कान के साथ बोले, "कुमारी का दृढ़ प्रण था कि जो उनकी आँखों पर बँधी पट्टी का रहस्य बता देगा, वे उसी से विवाह करेंगी। किंतु युवक, तुम तो एक साधारण ढोली मात्र हो!"
विक्रमकुमार ने तत्काल उत्तर दिया, "क्षमा करें महाराज! मैं एक साधारण युवक हूँ और एक राजकुमारी से विवाह का स्वप्न देखने की धृष्टता भी नहीं कर सकता। यदि आप दोनों की अनुमति हो, तो मैं अपनी निर्धन मंडली के साथ इसी क्षण यहाँ से बहुत दूर चला जाऊँगा और इस विषय में जीवन भर किसी से कुछ नहीं कहूँगा।"
महाराज के स्वर में तनिक क्रोध और आश्चर्य मिश्रित था, "क्या तुम्हें अब भी यह समझ नहीं आया कि कुमारी ने यह पट्टी तुम्हारे ही आगमन की प्रतीक्षा में बाँधी है?"
कुमार निरुत्तर रहे, उनके पास कहने को कुछ शेष न था।
महाराज ने पास रखी स्वर्ण घंटी बजाकर सेवक भीमक को बुलाया और आदेश दिया, "भीमक! जाओ और राजकुमारी को यहाँ लेकर आओ। उनसे कहना कि वे अकेले ही आएँगी; उनकी सखियाँ उन्हें द्वार तक छोड़कर बाहर ही प्रतीक्षा करेंगी।"
कुछ क्षणों तक कक्ष में एक भारी सन्नाटा छाया रहा, जिसे राजकुमारी के आभूषणों और पाजेब की मधुर खनक ने तोड़ा। रानी ने वात्सल्य के साथ आगे बढ़कर अपनी पट्टी बँधी पुत्री का हाथ थामा और उन्हें प्रेमपूर्वक अपने समीप खड़ी कर लिया।
रानी ने वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा, "पुत्री! यहाँ कुलगुरु महाराज, तुम्हारे पिता महाराज और वह युवक उपस्थित है जिसने आज अपने स्वप्न का नाट्य-मंचन किया है। इसने अपना नाम विक्रमकुमार बताया है और इसका कहना है कि यह नाटक इसके उन स्वप्नों पर आधारित है जो इसे बाल्यकाल से आते रहे हैं। अपनी सत्यता के लिए इसने महादेव की शपथ भी ली है। हमारा अनुरोध है कि यदि तुम्हें उचित लगे, तो अब तुम अपनी आँखों की यह पट्टी हटा दो और स्वयं सब देख-समझकर अपना निर्णय लो। हम तुम्हारे जीवन का कोई भी निर्णय तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कदापि नहीं करना चाहते।"
कुमारी ने हाथ जोड़कर कुलगुरु को प्रणाम किया और माँ के साथ खड़ी हो गईं।
फिर महाराज ने युवक विक्रमकुमार से कहा, "यदि आप दोनों एक ही कहानी सुना रहे हैं, तो यह निर्णय कैसे हो कि सत्य कौन कह रहा है? पुत्री, यदि आप इन्हें झूठा सिद्ध करना चाहती हैं, तो इनसे कुछ ऐसा प्रश्न पूछिए जिसका उत्तर केवल वही दे सके जो आपके साथ उस अद्भुत घटना का साक्षी था।"
राजकुमारी कुछ क्षण विचारमग्न रहीं, फिर उन्होंने महारानी के कान में धीरे से कुछ कहा और उस व्यक्ति की ओर मुड़कर बोलीं, "यदि तुम सत्य कह रहे हो, तो बताओ कि उस पथिक के आने से पूर्व हम कितने वर्षों से साथ थे?"
वह व्यक्ति मंद-मंद मुस्कुराया और बोला, "हम सात वर्षों से साथ थे। पिछले मौसमों में हमारे तीन शावक (बच्चे) थे, जिनमें से एक की मृत्यु हो गई थी और शेष दो ने अपना पृथक संसार बसा लिया था। इसीलिए उस समय नीड़ (घोंसले) में केवल हम दोनों ही शेष थे।"
राजकुमारी संकोच के साथ हतप्रभ रह गईं और महारानी विस्मित रह गईं; उन्होंने संकेत से महाराज और कुलगुरु को अचलकुमार के उत्तर के सही होने की पुष्टि की। राजकुमारी ने अभी-अभी उन्हें 'सात वर्ष' वाली बात बताई थी। अब सभी उत्सुकता से राजकुमारी की ओर देखने लगे। उस व्यक्ति ने तो पूछे गए प्रश्न से कहीं अधिक विस्तार से उत्तर दे दिया था।
राजकुमारी मौन हो गईं, उन्होंने अपनी आँखों से पट्टी उतार दी और उनकी दृष्टि भूमि पर टिकी थी। महारानी ने बढ़कर उन्हें सँभाला। राजकुमारी के मौन और महारानी के संकेत ने सब स्पष्ट कर दिया था।
'क्रमशः'
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अगले भाग में:
पट्टी खुलने के बाद जब सुवर्णा की पहली दृष्टि 'विक्रमकुमार' पर पड़ेगी, तो क्या वे उन्हें पहचान पाएँगी? क्या वे एक साधारण ढोली को अपने पूर्वजन्म के स्वामी के रूप में स्वीकार कर पाएँगी? और राजकुमार अपनी पहचान छिपाने का यह खेल कब तक जारी रखेंगे?
✍️‘निःशब्द’ की कलम से...🥀
🖌️तस्वीरें जेमिनी, चैटजीपीटी & कोपिलॉट की सहायता से निर्मित..🌷
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